नई दिल्ली: कई साल पुरानी अवैध कॉलोनियों और पुराने निर्माणों पर बुलडोजर चलाने या उन्हें राहत देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख साफ कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए अवैध बस्तियों और पुराने निर्माणों पर कार्रवाई के लिए देशभर में एक जैसी नीति बनाने से इनकार कर दिया है।
सु्प्रीम कोर्ट ने कहा कि हर राज्य में जमीन, निर्माण और वहां रहने वाले लोगों की स्थिति अलग हो सकती है, इसलिए पूरे देश के लिए एक ही नीति बनाना ठीक नहीं होगा।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस मुद्दे पर अपनी मौजूदा नीति की समीक्षा करने या जरूरत के हिसाब से नई नीति बनाने पर फैसला लेने को कहा है।
यानी कोर्ट ने यह नहीं कहा कि पुरानी अवैध बस्तियों या निर्माणों पर कार्रवाई नहीं हो सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी पुरानी अवैध बस्ती को सिर्फ इसलिए राहत नहीं मिलेगी कि वह कई साल से मौजूद है, लेकिन कार्रवाई करते समय सरकार को कानूनी प्रक्रिया और सुप्रीम कोर्ट के पहले से तय सुरक्षा नियमों का पालन करना होगा।
कोर्ट की निगरानी में समिति की मांग
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने यह याचिका आई थी।
इसमें देशभर में लंबे समय से मौजूद अवैध निर्माण और बस्तियों को नियमित करने या हटाने के लिए एक समान नीति बनाने की मांग की गई थी।
याचिका दाखिल करने वाली संस्था सेंटर फॉर लॉ एंड गुड गवर्नेंस ने इसके लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक विशेषज्ञ समिति बनाने की मांग भी की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।
लेकिन कोर्ट ने यह मांग स्वीकार नहीं की और कहा कि ऐसे मामले मुख्य रूप से सरकार की नीति से जुड़े हैं।
अलग-अलग राज्यों में जमीन, निर्माण और वहां रहने वाले लोगों की स्थिति अलग हो सकती है, इसलिए हर राज्य के लिए एक ही नीति तय करना सही नहीं होगा।
30-40 साल बाद कार्रवाई पर सवाल
याचिका में कहा गया था कि कई राज्यों में ऐसी बस्तियां और निर्माण दशकों से मौजूद हैं।
कई जगह सरकार और स्थानीय निकाय इन संपत्तियों से टैक्स लेते रहे हैं।
लोगों को बिजली-पानी के कनेक्शन भी दिए गए और कुछ जगहों पर जमीन या संपत्ति को नियमित करने की योजनाएं भी लाई गईं।
याचिकाकर्ता का कहना था कि दूसरी तरफ कुछ राज्यों में 30, 40 या 50 साल पुरानी बस्तियों और निर्माणों को अचानक अवैध बताकर तोड़ने की कार्रवाई शुरू कर दी जाती है।
दलील दी गई कि ऐसी कार्रवाई से प्रभावित परिवारों के पास रहने की कोई दूसरी जगह नहीं होती। खासकर गरीब परिवार, महिलाएं और बच्चे सीधे प्रभावित होते हैं।
याचिका में कहा गया कि किसी निर्माण को गिराना बहुत बड़ा कदम है और एक बार कार्रवाई होने के बाद उसे वापस करना आसान नहीं होता।
इसलिए जमीन और निर्माण से जुड़े नियम लागू करते समय वहां रहने वाले लोगों के घर, रोजी-रोटी और सम्मान का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
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बुलडोजर कार्रवाई पर पहले से हैं नियम
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनधिकृत निर्माण गिराने को लेकर वह पहले ही जरूरी दिशा-निर्देश जारी कर चुका है।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि ऐसी कार्रवाई के मामलों में पहले से ही सुरक्षा के नियम मौजूद हैं।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने लोगों को अचानक उनके घर या कब्जे से हटाए जाने से बचाने के लिए जरूरी सुरक्षा दी है।
यहां तक कि पूरी तरह अनधिकृत कब्जे के मामले में भी आम तौर पर कार्रवाई से पहले कम से कम 15 दिन का नोटिस देने का निर्देश है।
यानी अगर सरकार या स्थानीय निकाय किसी निर्माण को अवैध मानकर हटाना चाहते हैं, तो वे सीधे बुलडोजर नहीं चला सकते। पहले तय कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
हर मामले में हालात अलग
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि हर अवैध निर्माण को एक नजर से नहीं देखा जा सकता।
कुछ निर्माण ऐसे हो सकते हैं, जो सिर्फ मुनाफा कमाने या व्यावसायिक मकसद से किए गए हों।
वहीं कुछ ऐसे मामले भी हो सकते हैं, जहां बड़ी संख्या में गरीब लोग किसी जमीन पर रह रहे हों और उन्हें रहने के लिए दूसरी जगह की जरूरत हो।
दोनों स्थितियों में सरकार की नीति एक जैसी नहीं हो सकती।
इसी वजह से कोर्ट ने कहा कि किसी एक नीति के जरिए हर मामले का समाधान नहीं किया जा सकता।
अगर कोई राज्य अपने स्तर पर कोई नीति बनाता है तो कोर्ट उसे सिर्फ इसलिए रोक नहीं सकता कि पूरे देश में एक जैसी व्यवस्था होनी चाहिए।
समिति बनाने की मांग भी ठुकराई
याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से एक ऐसी समिति बनाई जाए, जो पूरे देश में पुरानी अवैध बस्तियों और निर्माणों को लेकर नीति तैयार करे और उसकी निगरानी करे।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को भी खारिज कर दिया।
सुप्रीम ने कहा कि किसी कोर्ट की बनाई समिति राज्य सरकार या नगर निकाय की उस जिम्मेदारी को अपने हाथ में नहीं ले सकती, जिसके तहत उन्हें कानून लागू करना है।
यानी अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई कैसे होगी, किन मामलों में नियमितीकरण होगा और प्रभावित लोगों के लिए क्या व्यवस्था होगी—इनका फैसला संबंधित सरकारों और स्थानीय निकायों को ही करना होगा।
रहने के अधिकार का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि रहने की जगह का अधिकार सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि एक तरफ सुप्रीम कोर्ट ने लोगों के रहने के अधिकार को अहम माना है, वहीं हाल के एक फैसले में यह भी कहा गया है कि किसी अवैध बस्ती का लंबे समय तक बने रहना उसे अपने आप कानूनी नहीं बना देता।
इसी बात को आधार बनाकर याचिकाकर्ता ने पूरे देश के लिए साफ नीति बनाने की मांग की थी।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों को हर मामले के हालात के हिसाब से देखना होगा।
इन्हें एक ऐसी नीति से तय नहीं किया जा सकता, जो हर राज्य और हर तरह की जमीन पर एक जैसी लागू हो।
फैसला राज्यों पर छोड़ा
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता को अपनी मांग और सुझाव केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के सामने रखने की छूट दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई कि संबंधित सरकारें इन मुद्दों पर गंभीरता से गौर करेंगी और जरूरत होने पर अपनी मौजूदा नीतियों में बदलाव करेंगी।
यानी सुप्रीम कोर्ट ने पुरानी अवैध बस्तियों को नियमित करने या उन्हें हटाने के लिए कोई नया नियम नहीं बनाया है।
अब यह फैसला राज्यों और स्थानीय निकायों को अपने यहां के हालात के हिसाब से लेना होगा।
कार्रवाई को लेकर रुख साफ
इस फैसले का यह मतलब नहीं है कि 30-40 साल पुराना निर्माण सिर्फ इसलिए नहीं गिराया जा सकता क्योंकि वह लंबे समय से मौजूद है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि किसी अवैध निर्माण का लंबे समय तक बने रहना उसे अपने आप कानूनी नहीं बना देता।
अगर निर्माण नियमों के खिलाफ है तो संबंधित सरकार या स्थानीय निकाय उस पर कार्रवाई कर सकता है।
हालांकि, कार्रवाई करते समय तय कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी होगा।
नोटिस और दूसरे जरूरी कदमों को नजरअंदाज करके अचानक बुलडोजर चलाने की कार्रवाई नहीं की जा सकती।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के लिए एक जैसी नीति बनाने से इनकार कर दिया है।
अब राज्यों और स्थानीय निकायों को अपने हालात के हिसाब से तय करना होगा कि पुराने अवैध निर्माणों पर कार्रवाई और वहां रहने वाले लोगों के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।