जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट की एक टिप्पणी और आदेश का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। ट्रिब्यूनल को ‘सुस्त’ बताने वाली टिप्पणी और फीस में कटौती के आदेश के खिलाफ पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस दीपक वर्मा सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं।
राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है, जिसमें पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस दीपक वर्मा की अध्यक्षता वाले आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए गए थे।
दरअसल हाईकोर्ट ने राजस्थान की तीन बिजली कंपनियों और एचसीएल इन्फोसिस्टम्स के करीब 528 करोड़ रुपए के विवाद की सुनवाई कर रहे मध्यस्थता ट्रिब्यूनल की कार्यवाही पर गंभीर सवाल उठाए थे, जिसकी अध्यक्षता पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस दीपक वर्मा कर रहे थे।
हाईकोर्ट ने सुनवाई में देरी और बार-बार तारीख पड़ने को लेकर ट्रिब्यूनल को ‘सुस्त’ बताया था और पहले से दी गई मध्यस्थता फीस में 5 प्रतिशत की कटौती का आदेश दिया था।
राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश को अब जस्टिस दीपक वर्मा के साथ रिटायर्ड हाईकोर्ट जज दिनेश चंद्र सोमानी और एन कुमार ने भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
इस मामले की सुनवाई 17 अगस्त 2026 को चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने होगी।
मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि हाईकोर्ट की आपत्ति सिर्फ सुनवाई में देरी तक सीमित नहीं थी। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल की हर बैठक के लिए 7.5 लाख रुपए की फीस पर भी सवाल उठाए थे।
हाईकोर्ट ने कहा था कि जब सुनवाई के बीच लंबे अंतर हों और हर बैठक पर 7.5 लाख रुपए फीस लगे, तो इससे मामले का खर्च बढ़ता जाता है।
528 करोड़ के विवाद की शुरुआत
पूरा मामला राजस्थान की तीन बिजली कंपनियों और एचसीएल इन्फोसिस्टम्स के बीच का है।
जयपुर विद्युत वितरण निगम, अजमेर विद्युत वितरण निगम और जोधपुर विद्युत वितरण निगम ने 2009 में एचसीएल को बिजली और सूचना तकनीक से जुड़े काम दिए थे।
बाद में काम में देरी, रकम में कटौती और काम पूरा नहीं होने को लेकर दोनों पक्षों में विवाद हो गया।
एचसीएल ने 27 सितंबर 2019 को मध्यस्थता शुरू करने की मांग की। इसके बाद 27 जुलाई 2020 से ट्रिब्यूनल के सामने सुनवाई शुरू हुई।
कानून में मध्यस्थता का मामला बहुत लंबे समय तक न चले, इसके लिए समय सीमा तय है। लेकिन इस मामले में तय समय के भीतर सुनवाई पूरी नहीं हो सकी।
28 फरवरी 2023 को तय समय सीमा खत्म हो गई। इसके बाद एचसीएल को सुनवाई जारी रखने के लिए कई बार और समय लेना पड़ा।
वाणिज्यिक कोर्ट ने सितंबर 2024 में ट्रिब्यूनल को 30 अप्रैल 2025 तक का समय दिया। इसके बाद 24 फरवरी 2026 को समय बढ़ाकर 30 सितंबर 2026 कर दिया गया।
यहीं से विवाद ने नया मोड़ लिया और इसके बाद बिजली कंपनियों ने हाईकोर्ट का रुख किया।
बिजली कंपनियां पहुंचीं हाईकोर्ट
बिजली कंपनियों ने ट्रिब्यूनल का समय बढ़ाए जाने को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।
उनका कहना था कि ट्रिब्यूनल में सुनवाई नियमित तरीके से नहीं हो रही थी। तारीखों के बीच लंबा अंतर रहता था और कई बार सुनवाई टलती रही।
कंपनियों ने यह भी कहा कि मामला राजस्थान से जुड़ा होने के बावजूद सुनवाई की जगह जयपुर से नई दिल्ली कर दी गई। इससे आने-जाने और दूसरे खर्च बढ़ गए।
हाईकोर्ट ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि मध्यस्थता कानून का मकसद ही विवाद को जल्द खत्म करना है।
सिर्फ मामला बड़ा या जटिल है, इसलिए सुनवाई को बार-बार आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
दूसरी तरफ, एचसीएल का कहना था कि मामला काफी जटिल है। इसमें बड़ी संख्या में दस्तावेज हैं, 22 गवाहों की गवाही हो चुकी है और 160 से ज्यादा बैठकें हो चुकी हैं।
कंपनी ने कोविड के दौरान हुई रुकावटों का भी हवाला दिया।
लेकिन हाईकोर्ट ने माना कि मामले का इतना लंबा खिंचना सिर्फ उसकी जटिलता की वजह से नहीं हो सकता।
देरी पर ‘सुस्त’ टिप्पणी
राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल की सुनवाई में हुई देरी पर सख्त टिप्पणी की थी।
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के कामकाज को ‘सुस्त’ बताते हुए कहा कि सुनवाई तय समय में पूरी करने को लेकर जरूरी तेजी नहीं दिखाई गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता कानून का मकसद विवादों को समय पर खत्म करना है। लेकिन इस मामले में सुनवाई लंबे समय तक चलती रही और ट्रिब्यूनल का समय भी कई बार बढ़ाना पड़ा।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि मामले की जटिलता को देखते हुए कुछ ज्यादा समय लग सकता है, लेकिन इतनी लंबी देरी को सिर्फ मामले की जटिलता के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता।
यही वजह रही कि हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल की कार्यवाही में देरी को गंभीरता से लिया और आगे सुनवाई को तय समय में पूरा करने के निर्देश दिए।
7.5 लाख की फीस पर सवाल
हाईकोर्ट के सामने आया कि ट्रिब्यूनल की हर बैठक के लिए 7.5 लाख रुपए फीस तय थी।
कोर्ट ने कहा कि एक तरफ हर बैठक पर इतनी फीस है और दूसरी तरफ सुनवाई के बीच लंबा अंतर रहता है। ऐसे में मामला जितना लंबा चलेगा, खर्च भी उतना ही बढ़ता जाएगा।
इस मामले में मध्यस्थता का कुल खर्च करीब 13 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका था।
45 दिन में फैसला देने का आदेश
देरी पर सवाल उठाने के बाद हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल को 31 मई 2026 से जयपुर मध्यस्थता और सुलह केंद्र में लगातार सुनवाई करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने कहा कि पूरी कार्यवाही 45 दिन के भीतर पूरी कर अवॉर्ड दिया जाए।
यानी हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल को अब बिना लंबा समय लिए लगातार सुनवाई करने और तय समय में मामला खत्म करने को कहा था।
इसी आदेश के खिलाफ अब पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस दीपक वर्मा, रिटायर्ड हाईकोर्ट जज दिनेश चंद्र सोमानी और एन. कुमार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं।
फीस घटाने का दिया था आदेश
हाईकोर्ट ने माना कि इतनी देरी और बढ़ता खर्च मध्यस्थता को जल्द पूरा करने के मकसद के खिलाफ है।
इसी वजह से हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल की वजह से हुई देरी पर फीस में कटौती का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने पहले दी जा चुकी फीस में हर महीने 5 प्रतिशत की कटौती करने को कहा।
साथ ही ट्रिब्यूनल की वजह से आगे होने वाले अतिरिक्त खर्च का बोझ भी पक्षकारों पर नहीं डालने का निर्देश दिया।