टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला: केवल प्रतिकूल कब्जे का दावा करने से नहीं लगेगी भारी कोर्ट फीस

No ‘Mini Trial’ at the Start of a Lawsuit: Rajasthan High Court Defines Limits of Preliminary Scrutiny
हाईकोर्ट ने कहा-वादपत्र दर्ज करने के शुरुआती चरण में किसी पक्ष के स्वामित्व, अधिकार या दावे की अंतिम वैधता पर फैसला नहीं किया जा सकता।

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि केवल प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) के आधार पर मालिकाना हक का दावा करने से मुकदमे को घोषणा का मुकदमा नहीं माना जा सकता।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमा दर्ज करने के शुरुआती चरण में अदालत मामले की पूरी सुनवाई या अंतिम फैसला नहीं कर सकती।

कोर्ट ने कहा कि वादपत्र (Plaint) के पंजीकरण के शुरुआती चरण में अदालत किसी दावे के अंतिम कानूनी परिणाम पर फैसला नहीं कर सकती। केवल इस आधार पर कि वादी ने लंबे समय के प्रतिकूल कब्जे से संपत्ति पर अधिकार प्राप्त होने का दावा किया है, मुकदमे को स्वतः घोषणा (Declaration) का वाद मानकर संपत्ति के बाजार मूल्य के आधार पर भारी कोर्ट फीस जमा कराने का आदेश नहीं दिया जा सकता।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने जोधपुर महानगर की अधीनस्थ अदालत के आदेश को रद्द करते हुए वादपत्र को कानून के अनुसार पंजीकृत करने और मामले को नियमित सिविल सूट के रूप में आगे बढ़ाने के आदेश दिए हैं.

हालांकि हाईकोर्ट ने साफ किया कि प्रतिकूल कब्जे के आधार पर स्वामित्व का दावा सही है या नहीं, इस पर उसने कोई अंतिम राय नहीं दी है।

क्या था मामला?

याचिकाकर्ता निकिता, परमेश्वरी देवी और जयश्री ने जोधपुर के कमला नेहरू नगर प्रथम विस्तार योजना स्थित प्लॉट नंबर-8 को लेकर सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया था।

उनका दावा था कि उनके पूर्वज वर्ष 1987 से और वे स्वयं वर्ष 2010 से इस संपत्ति पर वास्तविक, शांतिपूर्ण, खुले और लगातार कब्जे में हैं।

वादपत्र में कहा गया कि प्लॉट नंबर-8 उनके प्लॉट नंबर-9 के पास स्थित है और प्लॉट नंबर-9 की रजिस्टर्ड बिक्री विलेख में प्लॉट नंबर-8 को उत्तरी सीमा के रूप में भी दर्शाया गया है।

हालांकि विवादित प्लॉट खाली और बिना निर्माण का बताया गया है। याचिकाकर्ताओं ने लंबे कब्जे के आधार पर प्रतिकूल कब्जे से अधिकार प्राप्त होने का दावा किया।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 16 अगस्त 2026 को कथित हस्तक्षेप और जबरन बेदखली की आशंका पैदा होने के बाद उन्होंने अदालत से अपनी कब्जे की स्थिति की सुरक्षा और प्रतिवादी को संपत्ति में प्रवेश करने, कब्जा लेने या हस्तक्षेप करने से रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा मांगी थी।

इसके साथ ही अंतरिम संरक्षण के लिए CPC के आदेश 39 नियम 1 और 2 के तहत आवेदन भी पेश किया गया था।

सिविल कोर्ट ने बाजार मूल्य के आधार पर मांगी थी कोर्ट फीस

19 अगस्त 2026 को वादपत्र की जांच के दौरान अधीनस्थ अदालत ने यह माना कि प्रतिकूल कब्जे से स्वामित्व प्राप्त होने का दावा एक स्वतंत्र घोषणा की मांग है और स्थायी निषेधाज्ञा उसका परिणामी राहत है।

इस आधार पर अदालत ने राजस्थान कोर्ट फीस एवं वाद मूल्यांकन अधिनियम की धारा 24(बी) लागू करते हुए याचिकाकर्ताओं को संपत्ति का बाजार मूल्य बताने और उसी आधार पर कोर्ट फीस जमा करने के आदेश दिए, इसके चलते वादपत्र का पंजीकरण नहीं किया गया।

हाईकोर्ट ने कहा-फीस की जांच जरूरी, लेकिन मुकदमे का ट्रायल नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमा दर्ज होने से पहले कोर्ट फीस और मूल्यांकन की जांच करना अदालत का वैधानिक दायित्व है, लेकिन इस अधिकार का मतलब यह नहीं है कि अदालत शुरुआती चरण में ही विवादित तथ्यों और कानून के जटिल प्रश्नों का फैसला करने लगे।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर यह तय नहीं किया जा सकता कि याचिकाकर्ताओं का कब्जा वास्तव में प्रतिकूल कब्जे की सभी कानूनी शर्तों को पूरा करता है या नहीं।

कोर्ट ने कहा कि कब्जा कब से प्रतिकूल था, क्या वह वास्तविक मालिक के विरुद्ध था, क्या आवश्यक अवधि पूरी हुई और क्या स्वामित्व वास्तव में प्राप्त हुआ—ये सभी प्रश्न साक्ष्य और नियमित सुनवाई के बाद तय किए जा सकते हैं।

कोर्ट ने कहा कि इन्हें कोर्ट फीस तय करने के नाम पर ‘मिनी ट्रायल’ में नहीं बदला जा सकता।

स्वामित्व दावा करने से मुकदमा घोषणा का वाद नहीं बन जाता

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति द्वारा यह कहना कि उसे पहले से कोई अधिकार या स्वामित्व प्राप्त है और उस अधिकार की रक्षा के लिए निषेधाज्ञा मांगना, अपने आप में अदालत से उस अधिकार की घोषणा करने की मांग नहीं है।

कोर्ट के अनुसार, मुकदमे की वास्तविक प्रकृति तय करने के लिए वादपत्र को समग्र रूप से पढ़ना जरूरी है।

किसी एक पंक्ति या दावे को अलग करके पूरे मुकदमे को घोषणा का वाद नहीं माना जा सकता। इस मामले में तत्काल राहत संपत्ति में कथित हस्तक्षेप और बेदखली से सुरक्षा की थी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के K.M. Krishna Reddy बनाम Vinod Reddy मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी संपत्ति विवाद में स्वामित्व या प्रतिकूल कब्जे का प्रश्न उठने मात्र से हर निषेधाज्ञा का मुकदमा घोषणा के मुकदमे में परिवर्तित नहीं हो जाता।

प्रत्येक मामले में वादपत्र और मांगी गई वास्तविक राहत की प्रकृति को देखकर निर्णय लिया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने आदेश रद्द कर वादपत्र दर्ज करने के दिए आदेश

हाईकोर्ट ने अधीनस्थ अदालत के 19 अगस्त 2026 के आदेश को रद्द करते हुए वादपत्र को कानून के अनुसार पंजीकृत करने का आदेश दिया।

इसके बाद मामले को नियमित सिविल सूट के रूप में आगे बढ़ाया जाएगा और अंतरिम राहत के आवेदन पर भी कानून के अनुसार विचार किया जाएगा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रतिवादी मुकदमे में उपस्थित होने के बाद कोर्ट फीस, मूल्यांकन, क्षेत्राधिकार, मुकदमे की वैधता, स्वामित्व या प्रतिकूल कब्जे से जुड़े सभी कानूनी आपत्तियां उठा सकेंगे।

हाईकोर्ट ने इन मुद्दों पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है और सभी प्रश्न ट्रायल कोर्ट के समक्ष उचित चरण पर खुले रहेंगे।

सबसे अधिक लोकप्रिय