विदेशी आर्बिट्रल अवॉर्ड के प्रवर्तन में अदालतों को अपीलीय अदालत की तरह नहीं करना चाहिए काम, असाधारण परिस्थितियों में ही हो हस्तक्षेप
जयपुर। पूर्व CJI जस्टिस बी.आर. गवई ने विदेशी आर्बिट्रल अवॉर्ड के प्रवर्तन को लेकर भारतीय न्यायपालिका की भूमिका पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायिक संयम का अर्थ न्यायिक शक्ति से पीछे हटना नहीं, बल्कि उसका अनुशासित, संतुलित और सीमित प्रयोग करना है।
जयपुर के राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर (RIC) में शनिवार को आयोजित यशराज सामंत मेमोरियल एनुअल आर्बिट्रेशन लेक्चर में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए जस्टिस गवई ने कहा कि विदेशी मध्यस्थता पुरस्कार के मामलों में अदालतों को अपीलीय अदालत की भूमिका नहीं निभानी चाहिए।
अदालत को न तो साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन करना चाहिए और न ही अनुबंध या कानून की अपनी व्याख्या को मध्यस्थ न्यायाधिकरण की व्याख्या से केवल इसलिए बदलना चाहिए कि दूसरी व्याख्या अधिक उपयुक्त प्रतीत होती है।
गंभीर खामी होने पर ही न्यायिक हस्तक्षेप
पूर्व CJI ने स्पष्ट किया कि न्यायिक हस्तक्षेप असाधारण परिस्थितियों तक सीमित रहना चाहिए। गंभीर प्रक्रियात्मक खामी, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन अथवा भारत के कानून और न्याय के मूलभूत सिद्धांतों के प्रत्यक्ष उल्लंघन जैसी परिस्थितियों में ही अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मध्यस्थता व्यवस्था की सफलता के लिए यह जरूरी है कि न्यायालय अपनी सीमाओं का सम्मान करें और मध्यस्थ न्यायाधिकरण के निर्णयों में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचें।
‘पंच परमेश्वर’ से आधुनिक Arbitration तक का सफर
जस्टिस गवई ने कहा कि भारत में मध्यस्थता की अवधारणा कोई नई व्यवस्था नहीं है।
भारतीय गांवों में लंबे समय से विवादों को पंचों के समक्ष ले जाने की परंपरा रही है और पंचों को ‘पंच परमेश्वर’ का दर्जा दिया जाता था।
उन्होंने कहा कि मध्यस्थता, विवाद समाधान और आपसी सहमति से न्याय की भारतीय परंपरा में गहरी जड़ें हैं।
उन्होंने कहा कि भारत ने 1940 के हस्तक्षेप-प्रधान Arbitration Act से 1996 के Arbitration and Conciliation Act तक लंबा सफर तय किया है।
2015 और 2019 के संशोधनों ने देश के Arbitration framework को और अधिक pro-arbitration और pro-enforcement बनाया है।
भारत के सामने संतुलन की बड़ी चुनौती
पूर्व CJI ने कहा कि भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी मौलिक सार्वजनिक नीति और न्याय के मूलभूत सिद्धांतों की रक्षा करते हुए विदेशी arbitral awards के सम्मान और उनके प्रभावी प्रवर्तन के बीच उचित संतुलन बनाए।
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वाणिज्य के लगातार बढ़ते दायरे के बीच भारत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के वैश्विक केंद्र के रूप में उभरने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और इसके लिए एक भरोसेमंद, स्थिर और न्यायिक रूप से संतुलित Arbitration व्यवस्था आवश्यक है।
‘The Sovereign Duty of Non-Interference’ पर विशेष व्याख्यान
कार्यक्रम में पूर्व CJI जस्टिस बी.आर. गवई ने “The Sovereign Duty of Non-Interference: Judicial Restraint in Enforcing Foreign Arbitral Awards” विषय पर विशेष व्याख्यान दिया।
उन्होंने विदेशी आर्बिट्रल अवॉर्ड के प्रवर्तन के दौरान न्यायपालिका के हस्तक्षेप की सीमाओं और न्यायिक संयम की आवश्यकता पर विस्तार से विचार रखा।
कार्यक्रम में राजस्थान हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस महेंद्र गोयल, जस्टिस रवि चिरानिया, जस्टिस बिपिन गुप्ता और जस्टिस अनुरूप सिंघी सहित कई पूर्व न्यायाधीश, वरिष्ठ अधिवक्ता और विधि जगत की प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं।
यशराज सामंत की पहली पुण्यतिथि पर भावपूर्ण आयोजन
यह कार्यक्रम पूर्व CJI जस्टिस बी.आर. गवई के लॉ क्लर्क रहे यशराज सामंत की पहली पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित किया गया। इस दौरान यशराज सामंत के पोर्ट्रेट का अनावरण भी किया गया।
जस्टिस गवई ने यशराज को याद करते हुए कहा कि उनके साथ उनका बेहद आत्मीय और व्यक्तिगत संबंध था। उन्होंने बताया कि उन्हें यशराज की पुस्तक “Specialized Arbitration, Emerging International Trends and Practices” के लिए Foreword लिखने का अवसर मिला था।
उन्होंने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव के मार्गदर्शन में यशराज एक बेहद प्रतिभाशाली और होनहार युवा काउंसल के रूप में तेजी से आगे बढ़ रहे थे। उनके कानूनी लेखन और Arbitration के क्षेत्र में योगदान ने कम उम्र में ही उन्हें अलग पहचान दिलाई।
पूर्व CJI ने कहा कि यशराज की प्रतिभा और कानून के प्रति समर्पण को देखते हुए उनमें एक बड़ी कानूनी संभावना दिखाई देती थी। उनका असमय निधन न केवल परिवार और उनके करीबियों, बल्कि पूरे विधि जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।