नई दिल्ली। 2008 के जयपुर सीरियल बम धमाकों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोषी आतंकी मोहम्मद सरवर आज़मी उर्फ ढिल्ला पप्पू को बड़ा झटका दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने सरवर आजमी की उम्रकैद की सजा को निलंबित कर जेल से रिहा करने की मांग को खारिज कर दिया हैं.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामला आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और आम जनता की सुरक्षा से जुड़ा है, इसलिए इसे सामान्य जमानत या सजा निलंबन के मामले की तरह नहीं देखा जा सकता।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना वी. वराले की पीठ ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें आज़मी की उम्रकैद की सजा को निलंबित कर उसे रिहा करने से मना किया गया था।
9वें जिंदा बम का मामला, जिसने आज़मी की रिहाई रोक दी
मामला 13 मई 2008 के जयपुर सीरियल ब्लास्ट के दौरान मिले नौवें बम से जुड़ा है।
उस दिन जयपुर के अलग-अलग स्थानों पर कुल नौ बम लगाए गए थे। इनमें से आठ बम धमाके हुए, जिनमें 70 लोगों की मौत और करीब 186 लोग घायल हुए थे।
नौवां बम फट नहीं पाया था। यह चांदपोल मार्केट में एक दुकान के पास मिला था, जिसे बाद में सुरक्षित तरीके से निष्क्रिय किया गया।
इसी जिंदा बम को लगाने में भूमिका के आरोप में आज़मी को ट्रायल कोर्ट ने 2025 में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली तो पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ आज़मी ने राजस्थान हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट से उसने अपील लंबित रहने तक अपनी उम्रकैद की सजा को निलंबित कर जमानत पर रिहा करने की मांग की।
राजस्थान हाई कोर्ट ने उसकी मांग खारिज कर दी। इसके बाद आज़मी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
आज़मी की दलील-आठ मामलों में बरी हो चुका हूं
सुप्रीम कोर्ट में आज़मी की ओर से मुख्य दलील दी गई कि जयपुर ब्लास्ट से जुड़े आठ अन्य मामलों में राजस्थान हाई कोर्ट उसे पहले ही बरी कर चुका है।
उसका कहना था कि 13 मई 2008 को हुए सभी नौ विस्फोट एक ही बड़ी साजिश का हिस्सा थे। ऐसे में जब आठ मामलों में उसे दोषमुक्त किया जा चुका है, तो नौवें बम से जुड़े मामले में भी उसे जेल में रखना उचित नहीं है।
आज़मी की ओर से यह भी कहा गया कि पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने और उसके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल करने में करीब 12 वर्ष का समय लिया।
इस देरी को उसके खिलाफ मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाला तथ्य बताया गया।
उसने यह भी दावा किया कि उसके खिलाफ मौजूद मुख्य गवाह भरोसेमंद नहीं है और वह 15 वर्ष से अधिक समय जेल में बिता चुका है।
आज़मी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल और गौरव अग्रवाल ने पैरवी की।
सरकार की दलील जो भारी पड़ी-‘नौवां बम बाकी मामलों से अलग’
मामले में राजस्थान सरकार ने आज़मी की रिहाई का जमकर विरोध किया।
राजस्थान राज्य की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी, अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा, अधिवक्ता सौरभ राजपाल और दिव्यांक पंवार ने जवाब पेश करते हुए अदालत के समक्ष कहा कि नौवें बम का मामला अन्य आठ मामलों से अलग है।
राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि इसमें अलग स्थान पर मिला जिंदा बम,अलग परिस्थितियां,अलग साक्ष्य और एक महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष पहचान संबंधी साक्ष्य मौजूद हैं।
राज्य ने विशेष रूप से उस दुकानदार की पहचान का उल्लेख किया, जिसने कथित तौर पर आज़मी को वह साइकिल बेची थी, जिसका इस्तेमाल बम को ले जाने के लिए किया गया था।
राज्य का कहना था कि इस महत्वपूर्ण साक्ष्य को पहले के आठ मामलों में हाई कोर्ट ने खारिज नहीं किया था।
आठ मामले अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित
राजस्थान सरकार ने यह भी बताया कि आज़मी को आठ अन्य मामलों में बरी किए जाने के खिलाफ राज्य की अपीलें सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।
ऐसे में राज्य के मुताबिक, उन मामलों में मिली राहत को मौजूदा मामले में आज़मी की रिहाई का आधार नहीं बनाया जा सकता।
देरी के मुद्दे पर भी राज्य ने साफ कहा कि गिरफ्तारी में देरी अपने आप में मामले को झूठा या फर्जी साबित नहीं करती। साथ ही, सजा निलंबन के चरण में अदालत को पूरे साक्ष्य का विस्तृत पुनर्मूल्यांकन नहीं करना चाहिए।
मामला असाधारण रूप से गंभीर
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आज़मी को राहत देने से इनकार कर दिया।
पीठ ने मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह आतंकवाद और जनता की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला है।
अदालत ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस निर्णय को सही माना, जिसमें दोषी की उम्रकैद की सजा को निलंबित करने से इनकार किया गया था।
इस आदेश के साथ फिलहाल मोहम्मद सरवर आज़मी उर्फ ढिल्ला पप्पू की उम्रकैद की सजा और दोषसिद्धि पर कोई रोक नहीं लगी है। उसकी मुख्य अपील पर सुनवाई जारी रहने तक उसे जेल में ही रहना होगा।
फिलहाल जेल में रहेगा आजमी
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद आजमी को उम्रकैद की सजा से फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है। अपील लंबित रहने के दौरान उसकी सजा पर रोक नहीं लगेगी और उसे जेल में ही रहना होगा।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई में उसकी दोषसिद्धि या उम्रकैद की सजा पर अंतिम फैसला नहीं दिया है।
उसकी अपील पर आगे सुनवाई जारी रहेगी। इसी प्रक्रिया में यह तय होगा कि ट्रायल कोर्ट की ओर से दी गई दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा बरकरार रहती है या नहीं।