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पति न गारंटर, न जमानतदार; पत्नी की गलती की सजा पति को नहीं दी जा सकती, जब तक जांच में उसकी भूमिका साबित न हो: राजस्थान हाईकोर्ट

Main Petition Missing from Digital Portal: Rajasthan HC Warns Accountability Is Essential for Paperless Courts

पत्नी के सरपंच रहते सरकारी बकाया निकला तो पति जिम्मेदार नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा-रिश्ते के आधार पर नहीं थोपी जा सकती रिकवरी, चुनाव लड़ने के लिए तुरंत जारी करें नो-ड्यूज

जयपुर: पत्नी के सरपंच रहते हुए अगर किसी मामले में सरकारी बकाया निकलता है, तो सिर्फ पति होने के कारण उसकी जिम्मेदारी पति पर नहीं डाली जा सकती।

राजस्थान हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में पति को राहत देते हुए विभाग को तुरंत नो-ड्यूज/नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश दिया, ताकि वह आगामी पंचायती राज चुनाव लड़ सके।

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि पति-पत्नी दोनों की जिम्मेदारियां अलग-अलग होती हैं।

पत्नी के सरपंच रहते हुए हुए किसी काम या गड़बड़ी की जिम्मेदारी पति पर तभी डाली जा सकती है, जब जांच में ये साबित हो कि पति ने भी इस गड़बड़ी में पति का साथ दिया।

लेकिन सिर्फ पति होने की वजह से उसे पत्नी की गलती की सजा नहीं दी जा सकती।

दरअसल याचिकाकर्ता अपनी पत्नी के पुराने बकाये के कारण नो-ड्यूज सर्टिफिकेट नहीं मिलने के चलते हाईकोर्ट पहुंचे थे।

वहीं विभाग का कहना था कि जब तक उनकी पत्नी का बकाया जमा नहीं होता, तब तक उन्हें सर्टिफिकेट नहीं दिया जा सकता।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने कहा कि अगर किसी पूर्व सरपंच से सरकारी रकम की रिकवरी होनी है, तो कार्रवाई उसी के खिलाफ की जानी चाहिए। सिर्फ पारिवारिक रिश्ते के आधार पर उसके पति या किसी दूसरे सदस्य से यह रकम नहीं वसूली जा सकती।

इसी के साथ कोर्ट ने संबंधित विभाग को याचिकाकर्ता को तुरंत नो-ड्यूज/नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश दिया, ताकि वह आगामी पंचायती राज चुनाव लड़ सके।

पत्नी 1995-2000 तक रही थीं सरपंच

यह मामला बूंदी जिले की ग्राम पंचायत फलेण्डा से जुड़ा है। याचिकाकर्ता रामलक्ष्मण मीणा की पत्नी लक्ष्मी बाई वर्ष 1995 से 2000 तक ग्राम पंचायत फलेण्डा की सरपंच थीं।

बाद में लक्ष्मी बाई के सरपंच रहते पंचायत में हुए एक काम को लेकर जांच कराई गई थी।

जांच के बाद उनके खिलाफ कुछ रकम की रिकवरी का आदेश दिया गया और रकम जमा नहीं होने पर बाद में विभाग ने उनकी संपत्ति कुर्क करने और नीलाम करने की कार्रवाई शुरू कर दी।

इसके खिलाफ लक्ष्मी बाई ने 2009 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

16 सितंबर 2009 को हाईकोर्ट ने उनकी संपत्ति की नीलामी पर रोक लगा दी। यह मामला अभी भी हाईकोर्ट में लंबित है।

पत्नी का बकाया होने पर पति को नहीं दिया सर्टिफिकेट

पूर्व सरपंच लक्ष्मी बाई के पति रामलक्ष्मण मीणा आगामी पंचायती राज चुनाव में ग्राम पंचायत फलेण्डा से चुनाव लड़ना चाहते हैं।

इसके लिए उन्हें विभाग से नो-ड्यूज सर्टिफिकेट लेना था। लेकिन विभाग ने उन्हें सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया।

विभाग का कहना था कि उनकी पत्नी के नाम सरकारी रकम बकाया है। जब तक यह रकम जमा नहीं होती, तब तक रामलक्ष्मण को नो-ड्यूज सर्टिफिकेट नहीं दिया जाएगा।

रामलक्ष्मण ने दलील दी कि पत्नी के पुराने बकाये की वजह से उन्हें चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता।

उन्होंने साफ कहा कि इस रकम से उनका कोई लेना-देना नहीं है और वह इसके लिए न तो जमानतदार हैं और न ही गारंटर।

वहीं, राज्य सरकार ने रामलक्ष्मण की इस दलील का इसका विरोध किया।

सरकार का कहना था कि लक्ष्मी बाई के पति होने के नाते रामलक्ष्मण की भी यह रकम जमा करने की जिम्मेदारी है। जब तक बकाया रकम जमा नहीं होती, तब तक उन्हें नो-ड्यूज सर्टिफिकेट जारी नहीं किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने माना, पति न गारंटर, न जमानतदार

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति से सरकारी रकम की रिकवरी होनी है, तो कुछ मामलों में उसका जमानतदार या गारंटर भी जिम्मेदार हो सकता है।

लेकिन इस मामले में रामलक्ष्मण अपनी पत्नी के बकाये के लिए न तो जमानतदार थे और न ही गारंटर। ऐसे में पत्नी के बकाये की जिम्मेदारी उन पर नहीं डाली जा सकती।

हाईकोर्ट ने कहा कि अगर लक्ष्मी बाई से सरकारी रकम वसूलनी है तो विभाग उनके खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। लेकिन सिर्फ पति होने के कारण रामलक्ष्मण से यह रकम नहीं वसूली जा सकती।

हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि Panchayati Raj Act, 1994 और Panchayati Raj Rules, 1996 में ऐसा कोई नियम नहीं है, जिसके तहत सरपंच का बकाया उसके परिवार के किसी दूसरे सदस्य से वसूला जाए।

पत्नी की गलती की सजा पति को नहीं मिलेगी

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में एक अहम बात भी स्पष्ट की।

किसी सार्वजनिक पद पर रहते हुए अगर कोई व्यक्ति गलत काम या गड़बड़ी करता है तो उसकी जिम्मेदारी उसी व्यक्ति की होगी।

हाईकोर्ट ने कहा कि पति और पत्नी की जिम्मेदारी अलग-अलग होती है। सिर्फ पति या पत्नी होने के कारण एक को दूसरे की गलती या गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

हालांकि, अगर जांच में यह सामने आता है कि पति भी पंचायत के काम में शामिल था या पत्नी के साथ मिलकर किसी गड़बड़ी में उसकी भूमिका थी, तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।

यानी कोर्ट ने पति को सिर्फ रिश्ते के आधार पर जिम्मेदार मानने से इनकार किया है। जिम्मेदारी तय करने के लिए उसकी अपनी भूमिका सामने आना जरूरी होगा।

विभाग की कार्रवाई को कोर्ट ने गलत माना

हाईकोर्ट ने विभाग की कार्रवाई को भी गलत ठहराया और माना कि अधिकारियों ने मामले पर सही तरीके से विचार किए बिना ही यह फैसला लिया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि पति से पत्नी का बकाया जमा कराने की शर्त लगाकर नो-ड्यूज सर्टिफिकेट रोकना सही नहीं था।

रामलक्ष्मण को चुनाव लड़ने के लिए जरूरी सर्टिफिकेट सिर्फ इसलिए नहीं रोका जा सकता क्योंकि उनकी पत्नी के खिलाफ पुरानी रिकवरी की कार्रवाई लंबित है।

तुरंत सर्टिफिकेट देने का आदेश

इसी के साथ हाईकोर्ट ने रामलक्ष्मण मीणा की याचिका मंजूर कर ली।

हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को उन्हें तुरंत नो-ड्यूज/नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश दिया, ताकि वह आगामी पंचायती राज चुनाव लड़ सकें।

इसके साथ ही याचिका और उससे जुड़ी लंबित अर्जियों का भी निपटारा कर दिया गया।

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