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जज की APAR रेटिंग ‘गुड’ से घटाकर ‘एवरेज’ करने पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल, ‘Doubtful’ टिप्पणी पर राजस्थान हाईकोर्ट प्रशासन से मांगा रिकॉर्ड

Supreme Court Questions Downgrade of Judge’s APAR, Seeks Rajasthan HC Record Over ‘Doubtful’ Remark

नई दिल्ली। राजस्थान के न्यायिक अधिकारी राकेश गोयल की APAR (वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट) रेटिंग घटाने और राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की टिप्पणी का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है।

न्यायिक अधिकारी राकेश गोयल की 2010 की APAR में रेटिंग और ईमानदारी पर सवाल उठाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के प्रशासनिक फैसले पर सवाल उठाए हैं।

सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने पूछा कि जिस न्यायिक अधिकारी के काम को जिला जज और सीधे निगरानी करने वाले जजों ने अच्छा माना, उसी की रेटिंग बाद में चीफ जस्टिस के स्तर पर ‘गुड’ से घटाकर ‘एवरेज’ क्यों कर दी गई और ईमानदारी तक को ‘संदिग्ध’ क्यों बता दिया गया।

सवाल ये भी उठा कि जब जिला जल और दूसरे वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों की रिपोर्ट राकेश गोयल के पक्ष में थी, तो चीफ जस्टिस ने APAR की ग्रेडिंग घटाने का फैसला किस आधार पर किया?

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट से APAR में चीफ जस्टिस की मूल टिप्पणियों वाला रिकॉर्ड भी मांगा है।

दरअसल राकेश गोयल को इस मामले में मई 2026 में राजस्थान हाईकोर्ट से राहत मिल गई थी। इसके बाद राजस्थान हाईकोर्ट की एडमिनिस्ट्रेटिव साइड ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

इसी अपील पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने APAR की ग्रेडिंग बदलने और ईमानदारी पर सवाल उठाने के आधार पर ही सवाल खड़े कर दिए।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के मई 2026 के फैसले को नहीं बदला है। उसने सिर्फ उस फैसले के आधार और रिकॉर्ड को लेकर सवाल उठाए हैं।

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जिला जज ने ‘गुड’ दिया, चीफ जस्टिस ने ‘एवरेज’ कर दी थी रेटिंग

मामला राजस्थान के न्यायिक अधिकारी राकेश गोयल की वर्ष 2010 की APAR से जुड़ा है।

गोयल वर्ष 2002 में सिविल जज नियुक्त हुए थे। APAR के पहले हिस्से में रिपोर्टिंग ऑफिसर यानी डिस्ट्रिक्ट जज ने उन्हें ‘गुड’ ग्रेड दिया था। बाद में चीफ जस्टिस ने इसे घटाकर ‘एवरेज’ कर दिया।

APAR के दूसरे हिस्से में भी डिस्ट्रिक्ट जज ने उनकी ईमानदारी को ‘गुड’ बताया था। इस पर कोई खराब टिप्पणी भी नहीं की गई थी। लेकिन चीफ जस्टिस ने उनकी ईमानदारी पर सवाल उठाते हुए इसे ‘डाउटफुल’ लिख दिया।

यानी डिस्ट्रिक्ट जज ने राकेश गोयल के काम और ईमानदारी, दोनों को अच्छा माना था, लेकिन बाद में चीफ जस्टिस की ओर से ग्रेड और टिप्पणी दोनों बदल दी गईं।

यही बदलाव बाद में विवाद की बड़ी वजह बना।

सुप्रीम कोर्ट के सामने यही सवाल था कि जब अधिकारी का काम देखने वाले वरिष्ठ जजों की राय उसके पक्ष में थी, तो चीफ जस्टिस ने उससे अलग राय क्यों द।

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हाईकोर्ट ने क्यों हटाईं प्रतिकूल टिप्पणियां?

मामला सिर्फ काम की रेटिंग तक सीमित नहीं था।

रिपोर्ट के दूसरे हिस्से में जिला जज ने गोयल की ईमानदारी को प्रमाणित किया था। उनकी सामान्य छवि भी ईमानदार बताई गई थी।

इसके उलट चीफ जस्टिस की ओर से उनकी ईमानदारी को ‘डाउटफुल’ दर्ज किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी अंतर पर सवाल उठाया कि क्या ऐसी गंभीर टिप्पणी के लिए कोई ठोस सामग्री मौजूद थी।

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सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- राय बदलने का आधार क्या था?

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने सवाल किया कि जब जिला जज और प्रशासनिक जज ने अधिकारी के काम का आकलन किया था, तो उनकी राय से अलग जाने के लिए क्या ज्यादा मजबूत आधार नहीं होना चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट का सवाल था कि पहले से दी गई अच्छी रिपोर्ट को बदलने के लिए सिर्फ पद बड़ा होना ही काफी नहीं हो सकता। इसके लिए ठोस वजह और आधार होना जरूरी है।

हट चुका आरोप फिर रिकॉर्ड में क्यों?

सुनवाई में राजस्थान हाईकोर्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेंद्र लोधा ने गोयल के पुराने सेवा रिकॉर्ड का हवाला दिया।

इसमें गोयल के न्यायिक अधिकारी रहते हुए पेट्रोल पंप के लिए आवेदन से जुड़ा एक आरोप भी शामिल था। हालांकि यह आरोप पहले ही हटा दिया गया था।

इस पर सुप्रीम ने सवाल किया कि प्रशासन जिस आरोप को खुद खत्म कर चुका है, उसे फिर से आधार बनाकर सामने क्यों लाया जा रहा है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने राकेश गोयल को पहले ही दी थी राहत

राकेश गोयल ने चीफ जस्टिस की टिप्पणियों के खिलाफ रिप्रेजेंटेशन दी थी। वहां से राहत नहीं मिलने पर उन्होंने हाईकोर्ट में इसे चुनौती दी।

इस मामले में राजस्थान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने गोयल के पक्ष में फैसला दिया था।

मई 2026 में हाईकोर्ट ने एपीएआर की प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि गोयल की ईमानदारी पर सवाल उठाने के लिए पर्याप्त वजह सामने नहीं आती।

इसके बाद उनकी 2010 की एपीएआर को ‘गुड’ मानने और ईमानदारी को ‘नॉट डाउटफुल’ दर्ज करने का निर्देश दिया गया।

साथ ही इससे मिलने वाले दूसरे लाभ देने को भी कहा गया।

APAR में लिखावट और तारीख को लेकर भी सवाल

इस मामले में APAR की एंट्री को लेकर भी गंभीर सवाल उठे थे।

हाईकोर्ट ने पाया था कि दो अलग-अलग चीफ जस्टिस के कार्यकाल से जुड़ी टिप्पणियां एक ही तरह की लिखावट और एक ही स्याही में दर्ज दिखाई दे रही थीं।

कोर्ट ने यह भी देखा कि इन टिप्पणियों पर 2012 की तारीख दर्ज थी। यानी अलग-अलग समय और अलग-अलग चीफ जस्टिस से जुड़ी एंट्री को लेकर रिकॉर्ड में ऐसी स्थिति दिखाई दी, जिस पर हाईकोर्ट ने सवाल उठाया।

हाईकोर्ट ने इसे राकेश गोयल के सर्विस रिकॉर्ड में गंभीर छेड़छाड़ माना था। कोर्ट के मुताबिक, सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज ऐसी टिप्पणियों का सीधा असर किसी अधिकारी के करियर और प्रतिष्ठा पर पड़ सकता है।

इसी वजह से हाईकोर्ट ने 2010 की APAR में दर्ज प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने का आदेश दिया था।

अब मूल रिकॉर्ड देखकर फैसला करेगा सुप्रीम कोर्ट

सुनवाई के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट की ओर से सीनियर एडवोकेट वीरेंद्र लोढ़ा पेश हुए। उन्होंने राकेश गोयल के पुराने सर्विस रिकॉर्ड से जुड़े कुछ मामलों का भी जिक्र किया।

इनमें ज्यूडिशियल ऑफिसर रहते हुए पेट्रोल पंप के लिए आवेदन करने से जुड़ा एक आरोप भी शामिल था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अभी कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट से चीफ जस्टिस की मूल टिप्पणियों वाला रिकॉर्ड पेश करने को कहा है।

अब सुप्रीम कोर्ट इसी रिकॉर्ड को देखने के बाद आगे फैसला करेगा कि 2010 की APAR में ‘गुड’ को ‘एवरेज’ करने और ईमानदारी को ‘डाउटफुल’ बताने के पीछे पर्याप्त आधार था या नहीं।

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