जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी डिस्पेंसरी के प्रभारी डॉक्टर की जिम्मेदारी को लेकर अहम फैसला सुनाया है।
सरकारी डिस्पेंसरी का प्रभारी होना सिर्फ मरीजों के इलाज तक सीमित नहीं है। रिकॉर्ड और उसमें दर्ज होने वाली जानकारी की निगरानी की जिम्मेदारी भी प्रभारी अधिकारी की होती है।
हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए सरकारी आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी के रिकॉर्ड में हुई गड़बड़ी के एक मामले में डॉक्टर को राहत देने से इनकार कर दिया है।
जस्टिस आनंद शर्मा ने डॉक्टर को दी गई अनिवार्य रिटायरमेंट की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी।
डॉक्टर ने अपने खिलाफ हुई विभागीय कार्रवाई को चुनौती दी थी। मामला एक कर्मचारी को जारी किए गए बीमारी और स्वास्थ्य प्रमाणपत्रों के रिकॉर्ड से जुड़ा था। डॉक्टर का कहना था कि इन प्रमाणपत्रों की एंट्री रजिस्टर में करना उनकी जिम्मेदारी नहीं थी, बल्कि यह काम अधीनस्थ कंपाउंडर का था।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रभारी अधिकारी सिर्फ यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि अधीनस्थ कर्मचारी ने अपना काम नहीं किया।
हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया और सजा को बरकरार रखा।
कर्मचारी को जारी किए गए थे करीब 24 प्रमाणपत्र
याचिकाकर्ता सरकारी आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी, किशनपुर, बेराठ में प्रभारी डॉक्टर के पद पर तैनात थे। उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई एक कर्मचारी को जारी किए गए बीमारी और स्वास्थ्य प्रमाणपत्रों से जुड़ी थी।
विभागीय जांच में डॉक्टर पर आरोप लगा कि उन्होंने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए संबंधित कर्मचारी की बीमारी और उसके स्वस्थ होने से जुड़े करीब 24 प्रमाणपत्र जारी किए। ये प्रमाणपत्र करीब दो साल की अवधि के दौरान जारी किए गए थे।
जांच में पाया गया कि इन प्रमाणपत्रों से जुड़ी एंट्री डिस्पेंसरी के रिकॉर्ड में दर्ज नहीं थीं। विभाग ने इन प्रमाणपत्रों की एंट्री से जुड़े रिकॉर्ड में हुई अनियमितता को गंभीर माना।
इसी को लेकर डॉक्टर के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई और बाद में उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति का दंड दिया गया।
डॉक्टर ने कहा- रजिस्टर भरना मेरा काम नहीं था
डॉक्टर ने हाईकोर्ट में इस कार्रवाई को चुनौती दी।
उनकी ओर से कहा गया कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप उनके प्रमाणपत्र जारी करने के अधिकार या चिकित्सा संबंधी योग्यता से जुड़े नहीं हैं।
उनका कहना था कि विवाद केवल प्रमाणपत्रों की डिस्पेंसरी रजिस्टर में एंट्री नहीं होने को लेकर है।
डॉक्टर के मुताबिक यह एंट्री करना उनके अधीनस्थ कंपाउंडर की जिम्मेदारी थी। इसलिए कंपाउंडर की गलती के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराकर सजा देना सही नहीं है।
प्रभारी अधिकारी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता
हाईकोर्ट ने डॉक्टर की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता डॉक्टर डिस्पेंसरी के प्रभारी थे और नियमों के तहत वहां रखे जाने वाले रिकॉर्ड की निगरानी उनकी जिम्मेदारी थी।
कोर्ट का कहना था कि किसी अधीनस्थ कर्मचारी को कोई काम सौंप देने भर से प्रभारी अधिकारी की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।
अगर अधीनस्थ कर्मचारी ने अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं निभाई थी, तो प्रभारी अधिकारी को इस पर ध्यान देना और जरूरी कार्रवाई करना चाहिए था।
हाईकोर्ट ने माना कि किसी काम के लिए अधीनस्थ कर्मचारी की जिम्मेदारी तय होने का मतलब यह नहीं है कि प्रभारी अधिकारी उस काम की निगरानी से पूरी तरह मुक्त हो जाता है।
अधीनस्थ की गलती थी तो कार्रवाई क्यों नहीं की?
हाईकोर्ट ने एक और अहम बात पर गौर किया। डॉक्टर का कहना था कि रजिस्टर में एंट्री कंपाउंडर को करनी थीं। लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि डॉक्टर ने कंपाउंडर की इस कथित लापरवाही को लेकर कभी कोई कार्रवाई की हो।
न तो उसके खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी करने का कोई रिकॉर्ड सामने आया और न ही किसी दूसरी कार्रवाई का।
हाईकोर्ट ने माना कि अगर डॉक्टर के मुताबिक रिकॉर्ड की जिम्मेदारी अधीनस्थ कर्मचारी की थी और उसने अपना काम नहीं किया, तो डॉक्टर को उसके खिलाफ कदम उठाना चाहिए था।
लेकिन ऐसा नहीं किया गया। ऐसे में अब केवल अधीनस्थ कर्मचारी की गलती बताकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने कहा-रिकॉर्ड की निगरानी भी प्रभारी की जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रभारी पद पर तैनात अधिकारी की जिम्मेदारी सिर्फ अपने काम तक सीमित नहीं रहती। उसे अपने अधीन पूरी व्यवस्था की निगरानी भी करनी होती है।
इस मामले में डॉक्टर डिस्पेंसरी के प्रभारी थे। इसलिए यह सुनिश्चित करना भी उनकी जिम्मेदारी थी कि उनके कार्यकाल में जारी किए गए प्रमाणपत्रों की एंट्री तय तरीके से रिकॉर्ड में की जा रही है या नहीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक कई प्रमाणपत्र जारी किए गए, लेकिन उनसे जुड़ी जरूरी एंट्री रिकॉर्ड में नहीं हुईं। इसके बावजूद प्रभारी डॉक्टर ने अधीनस्थ कर्मचारी की इस लापरवाही पर कोई कार्रवाई नहीं की।
ऐसे में विभाग की ओर से की गई कार्रवाई को गलत नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने सजा में दखल देने से किया इनकार
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने डॉक्टर की ओर से उठाई गई सभी आपत्तियों को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने माना कि विभागीय जांच और उसके आधार पर दी गई सजा में ऐसा कोई आधार नहीं है, जिसके चलते कोर्ट को इसमें दखल देने की जरूरत हो।
हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और डॉक्टर की दलीलों को देखने के बाद विभाग की कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि डिस्पेंसरी के प्रभारी अधिकारी के तौर पर डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी से केवल यह कहकर नहीं बच सकते कि रिकॉर्ड में एंट्री करने का काम किसी अधीनस्थ कर्मचारी का था।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी और अनिवार्य रिटायरमेंट की सजा बरकरार रखी।