जिला प्रमुख के 41 पदों में ओबीसी को 5 सीटें मिलने पर विवाद, याचिकाकर्ता ने उठाए अनुपातिक आरक्षण पर सवाल
जयपुर। राजस्थान में पंचायत चुनाव के लिए ओबीसी आरक्षण को लेकर चल रहे विवाद के बीच राज्य सरकार ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए आरक्षण व्यवस्था को उचित ठहराया है।
सरकार ने कहा है कि पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण ओबीसी आयोग की रिपोर्ट और उसके आधार पर की गई प्रक्रिया के अनुसार तय किया गया है।
सरकार का मुख्य तर्क है कि एससी, एसटी और ओबीसी समेत कुल आरक्षण सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत की सीमा के भीतर रखा गया है, इसलिए ओबीसी आरक्षण को और बढ़ाना संभव नहीं है।
मामला जिला प्रमुख पदों पर ओबीसी आरक्षण से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने जिला पुनर्गठन के बाद जिला प्रमुख के पदों की संख्या बढ़ने के बावजूद ओबीसी आरक्षण में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं किए जाने को हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
41 जिला प्रमुख पदों में ओबीसी के हिस्से में सिर्फ 5 सीटें
दरअसल, 13 अगस्त को जिला परिषदों में जिला प्रमुख पदों के आरक्षण की लॉटरी निकाली गई थी।
प्रदेश के 41 जिलों में जिला प्रमुख के कुल 41 पदों में से 5 पद ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित किए गए।
इनमें जालोर, बूंदी और खैरथल-तिजारा के जिला प्रमुख पद ओबीसी वर्ग के लिए तथा ब्यावर और सीकर के जिला प्रमुख पद महिला ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित किए गए।
इसके बाद ओबीसी आरक्षण को लेकर सवाल उठे और मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
विवाद के बीच सरकार ने पंचायत चुनाव से संबंधित आगे की लॉटरी भी स्थगित की थी।
17-18 सितंबर को प्रस्तावित लॉटरी को लेकर भी अब स्थिति बदल गई है और निकाय चुनावों से जुड़ी प्रक्रिया का हवाला देते हुए इसे फिर टाल दिया गया है।
याचिकाकर्ता का सवाल- पद बढ़े तो आरक्षण क्यों नहीं बढ़ा?
याचिकाकर्ता राधेराम गोदारा की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि जिला पुनर्गठन और नए जिलों के गठन के बाद जिला प्रमुख के पदों की संख्या 33 से बढ़कर 41 हो गई है।
ऐसे में ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित पदों की संख्या में भी उसी अनुपात में बढ़ोतरी की जानी चाहिए थी।
याचिकाकर्ता के मुताबिक जब जिला प्रमुख के कुल 33 पद थे, तब भी ओबीसी वर्ग के लिए 5 पद आरक्षित थे।
अब पदों की संख्या बढ़कर 41 होने के बावजूद ओबीसी के लिए 5 ही पद आरक्षित किए गए हैं। इसी आधार पर याचिका में आनुपातिक आरक्षण की मांग उठाई गई है।
सरकार ने 50% आरक्षण सीमा को बनाया मुख्य आधार
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में दाखिल जवाब में कहा है कि ओबीसी आयोग ने डोर-टू-डोर सर्वे और उपलब्ध जनसांख्यिकीय डेटा के विश्लेषण के आधार पर अपनी सिफारिशें दी हैं।
सरकार के अनुसार आरक्षण का निर्धारण आयोग की रिपोर्ट के आधार पर किया गया है और लॉटरी की प्रक्रिया भी उसी के अनुरूप अपनाई गई।
सरकार ने बताया कि 41 जिला प्रमुख पदों में से 8 पद एससी, 7 पद एसटी और 5 पद ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित किए गए हैं। इस तरह कुल 20 पद आरक्षित हैं, जो 41 का लगभग 48.78 प्रतिशत है।
सरकार का कहना है कि कुल आरक्षण पहले ही 50 प्रतिशत की सीमा के करीब है।
ऐसे में ओबीसी के लिए आरक्षण बढ़ाने पर निर्धारित सीमा पार होने की स्थिति पैदा होगी। इसी आधार पर सरकार ने ओबीसी आरक्षण को बढ़ाने की मांग का विरोध किया है।
ओबीसी आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करने पर सवाल
वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता आनंद शर्मा ने सरकार के जवाब और आरक्षण के आधार पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सरकार ने अभी तक ओबीसी आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की है।
अधिवक्ता के मुताबिक ओबीसी वर्ग को वर्तमान व्यवस्था में करीब 16 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है, जबकि राज्य में ओबीसी आरक्षण को लेकर पहले अलग-अलग समय पर अलग-अलग व्यवस्थाएं रही हैं। उनका तर्क है कि यदि 2020 में लागू व्यवस्था को आधार माना जाए तो जिला प्रमुख के 41 पदों में ओबीसी आरक्षण के तहत पदों की संख्या बढ़नी चाहिए थी।
याचिकाकर्ता पक्ष ने यह भी सवाल उठाया है कि जब जिला प्रमुख के पदों की कुल संख्या बढ़ी है, तो ओबीसी वर्ग के आरक्षित पदों की संख्या पहले के स्तर पर ही क्यों रखी गई।
सरकार के जवाब पर रिजॉइंडर दाखिल, अगले सप्ताह सुनवाई संभव
याचिकाकर्ता पक्ष के अधिवक्ता के अनुसार राज्य सरकार के जवाब पर रिजॉइंडर दाखिल किया जा चुका है। अब मामले में अगले सप्ताह हाईकोर्ट में सुनवाई होने की संभावना है।
ऐसे में अगली सुनवाई में हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह रहेगा कि 41 जिला प्रमुख पदों के लिए ओबीसी आरक्षण का निर्धारण किस आधार पर किया गया और 50 प्रतिशत की कुल आरक्षण सीमा के संदर्भ में ओबीसी आरक्षण बढ़ाने की याचिकाकर्ता की मांग पर कानूनी स्थिति क्या है।
पंचायत चुनाव की आगामी आरक्षण लॉटरी और चुनावी प्रक्रिया को देखते हुए यह मामला राजस्थान की स्थानीय निकाय राजनीति में भी महत्वपूर्ण बना हुआ है।