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परिस्थितियां पति-पत्नी को अलग कर सकती हैं, लेकिन प्रेम और विश्वास उन्हें फिर साथ ला सकते हैं- राजस्थान हाईकोर्ट

ajasthan High Court Sets Aside Divorce Decree After Estranged Couple Reconciles, Restores Marriage

तलाक के बाद हाईकोर्ट की समझाईश से बदला फैसला : हाईकोर्ट ने विवाह बहाल किया, कहा- जहां संभव हो कानून को मेल-मिलाप का रास्ता आसान बनाना चाहिए

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण वैवाहिक मामले में तलाक की डिक्री को रद्द करते हुए पति-पत्नी के बीच विवाह संबंध बहाल कर दिया।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि जब पति-पत्नी स्वयं अपने मतभेद खत्म कर वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करने के लिए तैयार हों, तो जहां कानून इसकी अनुमति देता है, वहां अदालत को शांति और पुनर्मिलाप की दिशा में आगे बढ़ने में सहयोग करना चाहिए।

यह आदेश जस्टिस समीर जैन और जस्टिस उमा शंकर व्यास की खंडपीठ ने पत्नी सरस्वती और पति अमित की ओर से दायर अपील की सुनवाई करते हुए दिया हैं.

सुनवाई के दौरान पति पत्नी व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष उपस्थित थे।

2024 में हुआ था तलाक

अपीलकर्ता दोनों पति पत्नी का विवाह 23 अक्टूबर 2015 को हुआ था।

पति द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत दायर तलाक याचिका को परिवारिक न्यायालय, हनुमानगढ़ ने 30 नवंबर 2024 को स्वीकार करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री पारित की थी। इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।

अपील लंबित रहने के दौरान मामले को 29 जनवरी 2026 को मध्यस्थता केंद्र भेजा गया, लेकिन वहां समझौता नहीं हो सका।

हालांकि, हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत की समझाइश और पति-पत्नी के आपसी संवाद के बाद दोनों ने अपने विवाद समाप्त कर फिर से साथ रहने पर सहमति जताई।

बेटी के भविष्य को बनाया आधार

राजस्थान हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने स्वेच्छा से अपने वैवाहिक संबंध को फिर से बहाल करने का निर्णय लिया।

मामले में पति की ओर से अधिवक्ता दुर्गेश खत्री ने पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि पति अपनी बेटी के लिए आगे बढ़ने को तैयार हैं.

दंपंति ने अपनी नाबालिग बेटी के कल्याण और भविष्य को भी इस निर्णय का महत्वपूर्ण आधार बताया। दोनों चाहते थे कि बेटी को माता-पिता दोनों का स्नेह, देखभाल, साथ और भावनात्मक सुरक्षा मिल सके।

विवाह केवल कानूनी बंधन नहीं, भावनात्मक और सामाजिक संबंध भी’

हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक संबंध केवल दो व्यक्तियों के बीच कानूनी बंधन नहीं है, बल्कि इसके भावनात्मक, पारिवारिक और सामाजिक आयाम भी हैं।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब पति-पत्नी परिपक्व विचार के बाद स्वयं वैवाहिक जीवन दोबारा शुरू करना चाहते हैं, तो कानून की सीमा के भीतर ऐसे बाद के घटनाक्रम को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा कि जब विवाद के दोनों पक्ष पूर्ण समझ और स्वतंत्र सहमति से अपने मतभेद खत्म कर चुके हों और दोबारा साथ रहना चाहते हों, तो ऐसे विवाद की सुनवाई जारी रखना, जिसे पक्षकार स्वयं आगे नहीं बढ़ाना चाहते, बहुत कम उद्देश्य पूरा करेगा।

हाईकोर्ट के अनुसार वैवाहिक मुकदमे केवल कानूनी दावों तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे मानवीय संबंधों और परिवारों के जीवन से जुड़े होते हैं।

शिव-पार्वती और नल-दमयंती का भी दिया संदर्भ

जस्टिस समीर जैन ने इस फैसले की शुरूआत शिव पार्वती से जुड़े संदर्भ से की, उन्होने कहा कि हिंदू परंपरा में विवाह को केवल दो व्यक्तियों के बीच अनुबंध न मानकर एक पवित्र संस्कार बताया।

उन्होंने शिव-पार्वती के संबंध का उदाहरण देते हुए कहा कि अलगाव और कठिन दौर के बाद भी प्रेम और साथ का संबंध दोबारा स्थापित हो सकता है।

हाईकोर्ट ने महाभारत के नल-दमयंती प्रसंग का भी उल्लेख किया और कहा कि परिस्थितियां पति-पत्नी को अलग कर सकती हैं, लेकिन प्रेम और विश्वास उन्हें फिर साथ ला सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में इस बात पर जोर दिया है कि वैवाहिक मुकदमे अपने आप में अंतिम उद्देश्य नहीं बनने चाहिए और जहां परिवार के पुनर्मिलन की संभावना हो, वहां उसे उचित महत्व दिया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक मामलों में न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल कानूनी गलती तय करना नहीं, बल्कि परिस्थितियां अनुमति दें तो न्यायपूर्ण और मानवीय समाधान की दिशा में आगे बढ़ना भी है।

कोर्ट ने इस मामले में राजस्थान हाईकोर्ट की समन्वय पीठ के Kamlesh Devi बनाम Vijay Kumar Soni मामले के निर्णय तथा कर्नाटक हाईकोर्ट के Prabhu Vaippan बनाम Akshita Pande मामले में निर्धारित दृष्टिकोण का भी उल्लेख किया।

तलाक की डिक्री रद्द, 2015 का विवाह बहाल

हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच बाद में हुए समझौते और दोनों की स्पष्ट सहमति को देखते हुए 30 नवंबर 2024 की तलाक की डिक्री को कायम रहने देना उनके स्वैच्छिक पुनर्मिलन में बाधा बनेगा। इसलिए अदालत ने तलाक की डिक्री को रद्द कर दिया।

पीठ ने स्पष्ट किया कि 23 अक्टूबर 2015 को हुआ विवाह अब इस तरह बहाल माना जाएगा, जैसे तलाक की डिक्री बीच में आई ही नहीं थी।

अदालत ने दोनों से भविष्य में मतभेद होने पर आपसी संवाद, धैर्य और समझदारी के साथ उन्हें सुलझाने तथा अपनी नाबालिग बेटी के कल्याण और खुशी को ध्यान में रखने की अपेक्षा की।

अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए परिवार न्यायालय, हनुमानगढ़ द्वारा पारित 30 नवंबर 2024 की डिक्री को निरस्त कर दिया और दोनों के विवाह को बहाल कर दिया।

रजिस्ट्रार (न्यायिक) को आदेश की प्रति संबंधित परिवार न्यायालय भेजने का निर्देश दिया गया, ताकि कानून के अनुसार आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की जा सकें।

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