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टेंपरेरी स्टेटस वाले कैजुअल लेबर को पेंशन नहीं! हाईकोर्ट का अहम फैसला, रेलवे कर्मचारियों की विधवाओं की याचिकाएं खारिज

Rajasthan High Court Denies Pensionary Benefits to Widows of Casual Railway Workers With Temporary Status

जोधपुर। रेलवे में कैजुअल लेबर के तौर पर काम करने वाले कर्मचारी की सेवा के दौरान मौत हो गई और उसे टेंपरेरी रेलवे सर्वेंट के तौर पर नियुक्ति नहीं मिली थी, तो उसकी विधवा पेंशनरी लाभ का दावा नहीं कर सकती।

राजस्थान हाईकोर्ट ने करीब दो दशक से ज्यादा पुराने ऐसे मामलों पर फैसला सुनाते हुए सभी रिट याचिकाएं खारिज कर दीं।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कैजुअल लेबर को टेंपरेरी स्टेटस मिल जाना, उसे टेंपरेरी रेलवे सर्वेंट नहीं बना देता।

हाईकोर्ट ने कहा कि कैजुअल लेबर विद टेंपरेरी स्टेटस को सिर्फ इस आधार पर टेंपरेरी रेलवे सर्वेंट नहीं माना जा सकता।

मामला उन रेलवे कर्मचारियों की विधवाओं का था, जिनके पति कैजुअल गैंगमैन, सब्स्टीट्यूट खलासी और TS/ग्रेडेड फिटर के तौर पर काम कर रहे थे और सेवा के दौरान ही उनकी मौत हो गई। पति की मौत के बाद इन महिलाओं ने रेलवे से पेंशन मांगी थी।

चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल, जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण की बेंच ने कहा कि इन कर्मचारियों की मौत टेंपरेरी पोस्ट पर नियुक्ति से पहले हुई थी। इसलिए रेलवे मैनुअल के नियमों के तहत वे टेंपरेरी रेलवे सर्वेंट की कैटेगरी में नहीं आते और उनकी विधवाएं पेंशनरी लाभ की हकदार नहीं हैं।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सभी रिट याचिकाएं खारिज कर दीं और विधवाओं को पेंशनरी लाभ देने की मांग स्वीकार नहीं की।

रेलवे में काम करते हुए हुई थी कर्मचारियों की मौत

मामला उन महिलाओं की याचिकाओं से जुड़ा था, जिनके पति रेलवे में अलग-अलग पदों पर कैजुअल लेबर विद टेंपरेरी स्टेटस यानी कैजुअल लेबर के तौर पर काम कर रहे थे।

इनमें कैजुअल गैंगमैन, सब्स्टीट्यूट खलासी और टीएस ग्रेडेड फिटर के तौर पर काम करने वाले कर्मचारी शामिल थे। इन कर्मचारियों की सेवा के दौरान ही मौत हो गई। इसके बाद उनकी विधवाओं ने रेलवे से पेंशन देने की मांग की, लेकिन रेलवे ने पेंशनरी लाभ देने से इनकार कर दिया।

इसके बाद विधवाएं जोधपुर स्थित सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल पहुंचीं। लेकिन ट्रिब्यूनल ने भी 18 फरवरी 2000 को उनकी अर्जियां खारिज कर दीं। इसके बाद विधवाओं ने हाईकोर्ट में रिट याचिकाएं दायर कीं।

2003 में बड़ी बेंच को भेजा गया था मामला

मामले में सवाल सिर्फ पेंशन का नहीं था। सवाल यह था कि कैजुअल लेबर को टेंपरेरी स्टेटस मिलने के बाद उसे किस कैटेगरी में माना जाएगा।

पहले डिवीजन बेंच ने 15 नवंबर 2003 को यह मामला बड़ी बेंच के पास भेज दिया था। बेंच को लगा था कि Somati Dai Vs. Union of India मामले में दिए गए पुराने फैसले पर दोबारा विचार होना चाहिए।

इसी वजह से यह मामला करीब दो दशक बाद तीन जजों की बेंच के सामने सुनवाई के लिए आया। जहां कोर्ट ने महिलाओं को पेंशनरी लाभ का हकदार नहीं माना।

सुप्रीम कोर्ट के ‘चंदा देवी’ फैसले से भी मिला जवाब

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के General Manager, North West Railway & Ors. Vs. Chanda Devi, (2008) 2 SCC 108 के फैसले का हवाला दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में रेलवे मैनुअल के Para 1501 का जिक्र है। इसमें टेंपरेरी रेलवे सर्वेंट की परिभाषा दी गई है। इसमें साफ कहा गया है कि कैजुअल लेबर, जिसमें टेंपरेरी स्टेटस वाला कैजुअल लेबर भी शामिल है, टेंपरेरी रेलवे सर्वेंट की कैटेगरी में नहीं आता।

हाईकोर्ट ने इस फैसले में कैजुअल लेबर और टेंपरेरी रेलवे सर्वेंट के बीच के इस फर्क को अहम माना।

टेंपरेरी स्टेटस से नहीं बदलती कर्मचारी की कैटेगरी

हाईकोर्ट ने कहा कि रेलवे मैनुअल में दोनों की स्थिति अलग-अलग है और उसी के मुताबिक कर्मचारी की कैटेगरी तय होगी।

यानी सिर्फ किसी कैजुअल कर्मचारी को टेंपरेरी स्टेटस मिल जाने से उसे रेलवे मैनुअल के Para 1501 के तहत टेंपरेरी रेलवे सर्वेंट नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने समझाया कि पहले के Somati Dai मामले में डिवीजन बेंच ने रिट याचिकाएं खारिज जरूर की थीं, लेकिन उस समय रेलवे मैनुअल के Para 1501 पर ध्यान नहीं दिया गया था। यही नियम बताता है कि कैजुअल लेबर और टेंपरेरी रेलवे सर्वेंट की स्थिति अलग है।

मौजूदा मामले में इसी नियम को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पति टेंपरेरी रेलवे सर्वेंट नहीं थे। इसलिए उनकी विधवाओं को पेंशनरी लाभ का अधिकार नहीं बनता।

‘मौत के समय क्या था स्टेटस, यही अहम है’

हाईकोर्ट ने इस मामले में एक और अहम बात स्पष्ट की। याचिकाकर्ताओं के पति रेलवे में कैजुअल लेबर विद टेंपरेरी स्टेटस के तौर पर काम कर रहे थे।

उनकी मौत सेवा के दौरान हुई थी, लेकिन उन्हें टेंपरेरी पोस्ट पर नियुक्ति मिलने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। इसलिए हाईकोर्ट ने माना कि वे Para 1501 के तहत टेंपरेरी रेलवे सर्वेंट नहीं थे।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि उनकी विधवाएं पेंशनरी लाभ की हकदार नहीं हैं।

तीन जजों की बेंच ने सभी याचिकाएं खारिज कीं

चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल, जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण की बेंच ने पहले के Somati Dai मामले में दिए गए फैसले को सही माना और सभी रिट याचिकाएं खारिज कर दीं।

हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के Chanda Devi फैसले और रेलवे मैनुअल के Para 1501 से यह स्थिति साफ हो जाती है। इसलिए इस मामले में अलग राय बनाने की जरूरत नहीं है।

इस फैसले के साथ हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि कैजुअल लेबर को टेंपरेरी स्टेटस मिल जाना अपने आप में पेंशन का अधिकार नहीं देता। इस मामले में कर्मचारियों की टेंपरेरी रेलवे सर्वेंट के तौर पर नियुक्ति होने से पहले ही सेवा के दौरान मौत हो गई थी। इसलिए हाईकोर्ट ने उनकी विधवाओं को पेंशनरी लाभ का हकदार नहीं माना।

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