हाईकोर्ट ने कहा-अनुकंपा नियुक्ति केवल रोजगार नहीं, परिवार के आश्रित सदस्यों के प्रति जिम्मेदारी पुनर्विवाह-परिवार से अलग होने के बाद भी खत्म नहीं, 30 दिन में मृत कर्मचारी के टर्मिनल बेनिफिट्स बांटने का आदेश
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने मृतक कर्मचारी के स्थान पर अनुकंपा नियुक्ति करने वाले व्यक्ति और परिवार के प्रति जिम्मेदारी से जुड़ा ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि मृत कर्मचारी की जगह अनुकंपा नियुक्ति पाने वाले व्यक्ति पर परिवार के अन्य आश्रित सदस्यों के हितों की रक्षा की जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि मृत कर्मचारी के आश्रित को मिली अनुकंपा नियुक्ति केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी नियुक्ति को केवल व्यक्तिगत रोजगार लाभ के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि मृत कर्मचारी के आश्रित परिवार की आर्थिक सुरक्षा भी इसके मूल उद्देश्य का हिस्सा है।
मामला अजमेर की एक बहू द्वारा अनुकंपा नौकरी हासिल करने के बाद सास-ससुर का घर छोड़ने के साथ आर्थिक सहायता बंद करने से जुड़ा है।
बहू पर यह भी आरोप है कि उसने खुद पुनर्विवाह कर लिया है, जबकि पीड़ित सास-ससुर को किसी तरह की आर्थिक सहायता नहीं मिल रही।
राजस्थान हाईकोर्ट ने इसी के आधार पर अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (AVVNL) को आदेश दिया है कि अनुकंपा नियुक्ति पाने वाली बहू के नियमित मासिक वेतन का 25 प्रतिशत हिस्सा उसके ससुराल पक्ष की जीवित याचिकाकर्ता सास को सीधे बैंक खाते में जमा कराया जाए।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला ससुर चोथमल वर्मा और सास कमली देवी की ओर से दायर याचिका पर दिया है। मामले की सुनवाई के दौरान ससुर का निधन हो चुका है।
क्या था पूरा मामला?
मामला अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड में कार्यरत रहे कर्मचारी सुभाष चंद वर्मा से जुड़ा है, जो AVVNL में टेक्निकल हेल्पर के पद पर कार्यरत थे।
24 मार्च 2017 को सुभाष चंद्र का निधन हो गया। सुभाष चंद परिवार के मुख्य कमाने वाले सदस्य थे। उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ममता रानी ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया।
पति की मृत्यु के चलते सुभाष चंद की पत्नी ममता रानी को याचिकाकर्ता सास कमली देवी—ससुर चोथमल की सहमति के बाद अनुकंपा नियुक्ति मिली।
जिसके बाद 30 अगस्त 2017 को मृतक की पत्नी कमली देवी को एलडीसी के पद पर नियुक्त किया गया।
नौकरी के बाद छोड़ा घर, दूसरी शादी
मामले में नौकरी मिलने के बाद मृतक की पत्नी कमली देवी ने सास-ससुर का घर छोड़ दिया और उन्हें आर्थिक सहायता देना बंद कर दिया।
इसके साथ अनुकंपा नियुक्ति मिलने के बाद ममता देवी ने किसी अन्य व्यक्ति से पुनर्विवाह भी कर लिया।
कोर्ट पहुंचा मामला, ससुर का निधन
बहू द्वारा सास-ससुर का साथ छोड़ने और आर्थिक सहायता बंद करने के खिलाफ सास और ससुर ने विभाग के समक्ष शिकायत पर वेतन का एक हिस्सा दिलाने की मांग की।
सास-ससुर द्वारा निगम के समक्ष किए गए आवेदन पर निगम ने उनके पक्ष में वेतन का हिस्सा देने का कोई आदेश पारित नहीं किया और न ही टर्मिनल लाभों का वितरण किया गया।
सास-ससुर के पास जीवन-यापन का कोई पर्याप्त साधन नहीं होने के चलते अधिवक्ता रमित पारीक के जरिए राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर न्याय दिलाने की मांग की।
राजस्थान हाईकोर्ट में दायर याचिका की सुनवाई के दौरान ही ससुर चोथमल का भी निधन हो गया, जिसके बाद बुजुर्ग सास ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपनी याचिका को जारी रखा।

याचिका में दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता रमित पारीक और अधिवक्ता उजाला पारीक ने राजस्थान हाईकोर्ट में कई महत्वपूर्ण दलीलें रखीं।
मृतक पुत्र था परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि उनके पुत्र सुभाष चंद वर्मा परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे। उनकी अचानक मृत्यु के बाद परिवार गंभीर आर्थिक संकट में आ गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इसी पारिवारिक स्थिति को देखते हुए मृतक की पत्नी ममता रानी को अनुकंपा नियुक्ति दी गई थी।
नियुक्ति परिवार की देखभाल की उम्मीद के साथ मिली
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ममता रानी को अनुकंपा नियुक्ति मिलने के पीछे यह भी उद्देश्य था कि वह परिवार के अन्य सदस्यों का भरण-पोषण करेंगी।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, ममता रानी ने अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त करते समय अन्य पारिवारिक सदस्यों की देखभाल करने का शपथपत्र भी दिया था।
नौकरी मिलने के बाद सास-ससुर को छोड़ने का आरोप
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि अनुकंपा नियुक्ति मिलने के बाद ममता रानी ने उनकी देखभाल करना बंद कर दिया और उन्हें आर्थिक सहायता से वंचित कर दिया।
उनका कहना था कि ममता रानी अपना पूर्व वैवाहिक घर छोड़कर अलग रहने लगीं और बाद में उन्होंने किसी अन्य व्यक्ति से पुनर्विवाह भी कर लिया।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इसके बाद वे अपने दैनिक जीवन की मूलभूत जरूरतें पूरी करने के लिए भी संघर्ष करने की स्थिति में पहुंच गए।
दो अन्य पुत्र होने के बावजूद आर्थिक सहायता उपलब्ध नहीं
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता रमित पारीक और अधिवक्ता उजाला पारीक यह भी बताया गया कि उनके दो अन्य पुत्र हैं, लेकिन वे भी उस समय रोजगार में नहीं थे और परिवार को आर्थिक रूप से पर्याप्त सहायता देने की स्थिति में नहीं थे।
इस कारण याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की।
वेतन का हिस्सा और टर्मिनल बेनिफिट्स दिलाने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से मांग की कि निगम को आदेश दिया जाए कि ममता रानी को मिलने वाले वेतन का एक हिस्सा नियमित रूप से याचिकाकर्ताओं को दिया जाए।
इसके साथ ही मृत कर्मचारी सुभाष चंद वर्मा के टर्मिनल बेनिफिट्स को भी परिवार के बीच उचित रूप से वितरित करने का आदेश देने की मांग की गई।
विशेष दलील
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता रमित पारीक की ओर से यह मुख्य दलील दी गई कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को अचानक उत्पन्न आर्थिक संकट से बाहर निकालना था और ममता रानी से यह अपेक्षा थी कि वह परिवार के अन्य सदस्यों की भी देखभाल करेंगी।
रिकॉर्ड के अनुसार, ममता रानी की ओर से इस संबंध में शपथपत्र/अंडरटेकिंग भी प्रस्तुत किया गया था।
निगम और बहू का पक्ष
अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की ओर से कोर्ट के समक्ष कहा गया कि ममता रानी को अनुकंपा नियुक्ति इस अपेक्षा और आधार पर दी गई थी कि वह मृत कर्मचारी के अन्य पारिवारिक सदस्यों की भी देखभाल करेंगी।
निगम की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि उसे याचिकाकर्ताओं को ममता रानी के वेतन का हिस्सा देने अथवा टर्मिनल बेनिफिट्स का भुगतान करने पर कोई आपत्ति नहीं है, यदि हाईकोर्ट इस संबंध में उचित दिशा-निर्देश जारी करता है।
निगम ने बताया कि याचिकाकर्ताओं और ममता रानी के बीच आपसी विवाद के कारण टर्मिनल बेनिफिट्स का भुगतान किसी व्यक्ति को नहीं किया जा सका था।
हालांकि निगम ने यह भी स्पष्ट किया कि मृत सुभाष चंद वर्मा की बकाया सैलरी और विशेषाधिकार अवकाश (Privileged Leave) का भुगतान पहले ही ममता रानी को किया जा चुका है, जबकि अन्य देय लाभों का भुगतान अभी बाकी था।
बहू ममता रानी की दलील ?
मामले में अनुकंपा नियुक्ति हासिल करने वाली मृतक की पत्नी ममता रानी की ओर से कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के दावे का विरोध किया गया।
ममता रानी की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ताओं ने उनके साथ उचित व्यवहार नहीं किया, जिसके कारण उन्हें उनका घर छोड़कर अलग रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।
उनके अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ससुर की मृत्यु हो चुकी है और अब केवल याचिकाकर्ता सास जीवित हैं। उनके अनुसार, कमली देवी की देखभाल उनके अन्य दो जीवित पुत्र कर सकते हैं।
इसी आधार पर ममता रानी की ओर से कहा गया कि उन्हें अपनी सैलरी का हिस्सा याचिकाकर्ता के साथ साझा करने या मृत पति के टर्मिनल बेनिफिट्स में हिस्सा देने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।
ममता रानी की ओर से यह भी दलील दी गई कि उन्हें जो वेतन मिल रहा है, वह उनके पति की सेवा के बदले मिली अनुकंपा नियुक्ति से प्राप्त रोजगार का परिणाम है और इसे उनके व्यक्तिगत वेतन के रूप में देखा जाना चाहिए।
कोर्ट ने क्या माना?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड देखने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में यह तथ्य विवादित नहीं है कि ममता रानी को उनके पति की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति मिली थी।
कोर्ट ने विशेष रूप से इस तथ्य पर ध्यान दिया कि ममता रानी ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन करते समय अन्य पारिवारिक सदस्यों की देखभाल करने का अंडरटेकिंग दिया था।
कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को अचानक उत्पन्न आर्थिक संकट से बाहर निकालना है। परिवार का अर्थ केवल मृत कर्मचारी की विधवा तक सीमित नहीं है, बल्कि नियमों के अनुसार उसके माता-पिता और अन्य आश्रित सदस्य भी इसमें शामिल हो सकते हैं।
पुनर्विवाह-परिवार से अलग होने के बाद भी जिम्मेदारी खत्म नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का लाभ प्राप्त करने के बाद ममता रानी का परिवार से अलग हो जाना और पुनर्विवाह करना अपने आप में कोर्ट के लिए उनके व्यक्तिगत विकल्पों में हस्तक्षेप का आधार नहीं है।
हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति जिस अंडरटेकिंग और पारिवारिक दायित्व के आधार पर प्राप्त की गई थी, उससे पूरी तरह अलग होकर नियुक्ति का लाभ नहीं लिया जा सकता।
कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं सास-ससुर को छोड़ देने और उनकी देखभाल नहीं करने की स्थिति में अनुकंपा नियुक्ति की मूल भावना प्रभावित होती है।
Bhagwan Singh मामले का भी हवाला
राजस्थान हाईकोर्ट ने Bhagwan Singh बनाम Supt. Engineer, Pawas, Ajmer Vidyut Vitran Nigam Limited मामले में को-ऑर्डिनेट बेंच द्वारा दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति कोई सामान्य रोजगार अधिकार नहीं है, बल्कि मृत कर्मचारी की मृत्यु से उत्पन्न आर्थिक संकट से परिवार को राहत देने वाली कल्याणकारी व्यवस्था है।
कोर्ट ने वर्तमान मामले में उस फैसले के सिद्धांत से पूर्ण सहमति जताई और कहा कि अनुकंपा नियुक्ति पाने वाले व्यक्ति पर परिवार के अन्य आश्रितों के हितों की रक्षा से जुड़ी जिम्मेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का आदेश—सैलरी का 25% सास के खाते में
सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद जस्टिस आनंद शर्मा ने याचिका स्वीकार कर ली।
हाईकोर्ट ने अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड को आदेश दिया कि बहू ममता रानी के नियमित मासिक वेतन का 25 प्रतिशत हिस्सा सीधे याचिकाकर्ता सास कमली देवी के बैंक खाते में जमा कराया जाए।
कमली देवी को अपना बैंक खाता विवरण 15 दिनों के भीतर निगम के समक्ष पेश करना होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था कमली देवी के जीवित रहने तक जारी रहेगी।
टर्मिनल बेनिफिट्स भी बराबर बांटने के आदेश
टर्मिनल बेनिफिट्स भी बराबर बांटने के आदेश हाईकोर्ट ने निगम को दिवंगत सुभाष चंद वर्मा के टर्मिनल बेनिफिट्स 30 दिनों के भीतर जारी करने का आदेश दिया।
कोर्ट ने आदेश दिया कि इन टर्मिनल बेनिफिट्स को कमली देवी और ममता रानी के बीच बराबर-बराबर बांटा जाए। कमली देवी के 50 प्रतिशत हिस्से की राशि उनके बैंक खाते में जमा कराने का भी स्पष्ट आदेश दिया गया है।
