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15 साल की सेवा में कमी, 4 बार सजा के बावजूद पूर्व सैनिक की विधवा को मिलेगी फैमिली पेंशन, 1962 और 1971 में लड़े थे युद्ध, केन्द्र की याचिका खारिज

Rajasthan HC Upholds Family Pension for Ex-Soldier’s Widow Despite Shortfall in 15 Years of Service

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक पूर्व सैनिक की विधवा को सेवा और फैमिली पेंशन का लाभ दिए जाने के मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए केंद्र सरकार की याचिका खारिज कर दी।

जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस आशुतोष कुमार की खंडपीठ ने आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल, रीजनल बेंच जयपुर के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसके तहत दिवंगत सिपाही सुमेर सिंह की सेवा में पेंशन के लिए आवश्यक 15 साल की सेवा ाअवधि की कमी को सीमित उद्देश्य से माफ करते हुए पहले सेवा पेंशन और उसके बाद उनकी विधवा को फैमिली पेंशन देने के आदेश दिए थे।

राजस्थान हाईकोर्ट ने दिवंगत सिपाही सुमेर सिंह की विधवा को ट्रिब्यूनल के आदेश के अनुसार सेवा पेंशन का निर्धारित बकाया और 1 मई 2018 से फैमिली पेंशन का लाभ मिलेगा।

विधवा को मिलना चाहिए संतोष कि पति ने देश सेवा की

दिवंगत सिपाही ने भारतीय सेना में करीब 14 वर्ष सेवा की थी और 1962 तथा 1971 के युद्धों में हिस्सा लिया था।

विशेष उपलब्धि के लिए सिपाही को 1962 के युद्ध में भागीदारी के लिए रक्षा मेडल तथा 1971 के युद्ध में भागीदारी के लिए सैन्य सेना मेडल प्रदान किया गया था।

कोर्ट ने माना कि पेंशन का दावा केवल मृत सैनिक के पुराने सेवा रिकॉर्ड तक सीमित नहीं था, बल्कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी विधवा के फैमिली पेंशन अधिकार से भी जुड़ा था।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सुमेर सिंह ने अपना जीवन देश की सेवा में लगाया, करीब 14 वर्ष सेवा की और दो युद्धों में हिस्सा लिया। दोनों युद्धों के लिए उन्हें पदक भी मिले थे।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी परिस्थितियों में मामले को न्यायसंगत दृष्टिकोण से देखते हुए दिवंगत सैनिक की विधवा को यह संतोष मिलना चाहिए कि उनके पति द्वारा देश की सेवा में दिए गए योगदान और दोनों युद्धों में उनकी भागीदारी को राष्ट्र ने नजरअंदाज नहीं किया।

मामला क्या था?

मामला झुंझुनूं जिले के खेतड़ी तहसील के गांव ठिचोली निवासी याचिकाकर्ता सुमित्रा देवी ने दायर किया हैंं.

सुमित्रा दिवंगत सिपाही सुमेर सिंह की विधवा जो भारतीय सेना में 25 जनवरी 1961 को भर्ती हुए थे और 23 दिसंबर 1974 को सेवा से डिस्चार्ज कर दिए गए थे।

उनकी कुल सेवा अवधि 13 वर्ष, 11 महीने और 28 दिन थी, जिसमें 35 दिन गैर-योग्य सेवा के रूप में दर्ज थे।

पेंशन नियमों के तहत उस समय सेवा पेंशन प्राप्त करने के लिए न्यूनतम 15 वर्ष की योग्य सेवा आवश्यक थी।

इस कारण सुमेर सिंह की सेवा अवधि पेंशन के लिए निर्धारित न्यूनतम अवधि से कम रह गई थी।

उनकी पत्नी ने बाद में आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल, जयपुर के समक्ष आवेदन दायर कर सेवा पेंशन और उसके बाद फैमिली पेंशन का लाभ देने की मांग की।

ट्रिब्यूनल दे दी पेंशन

ट्रिब्यूनल ने 9 मई 2023 को याचिकाकर्ता सुमित्रा के पक्ष में आदेश पारित करते हुए सेवा अवधि की कमी को पेंशन के सीमित उद्देश्य के लिए माफ किया था।

इसके साथ ही दिवंगत सैनिक के जीवनकाल की सेवा पेंशन और उनकी मृत्यु के बाद विधवा को फैमिली पेंशन देने का आदेश दिया गया था।

हालांकि बकाया पेंशन को तीन वर्ष की सीमा के अधीन रखा गया था। इसी आदेश को केंद्र सरकार ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

केंद्र सरकार की दलील

केंद्र सरकार की ओर से राजस्थान हाईकोर्ट में ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती देते हुए मुख्य रूप से पेंशन नियमों, सेवा की अवधि, डिस्चार्ज की प्रकृति और सेवा में कमी को माफ करने की शक्ति से जुड़े कई तर्क रखे गए।

केंद्र की ओर से कहा गया कि सुमेर सिंह ने केवल 13 वर्ष, 11 महीने और 28 दिन की सेवा की थी, जबकि उस समय लागू पेंशन नियमों के तहत सेवा पेंशन के लिए 15 वर्ष की योग्य सेवा आवश्यक थी।

केंद्र ने पेंशन रेगुलेशंस फॉर द आर्मी, 1961 के पैरा 132 का हवाला देते हुए कहा कि न्यूनतम 15 वर्ष की सेवा पूरी नहीं होने के कारण सेवा पेंशन का अधिकार स्वतः उत्पन्न नहीं हुआ था।

केंद्र की दूसरी प्रमुख दलील सेवा की कमी को माफ करने की सीमा से जुड़ी थी।

केंद्र सरकार ने कहा कि 1961 के नियमों के तहत सक्षम प्राधिकारी को सेवा में कमी को केवल तीन महीने तक माफ करने की शक्ति थी।

जबकि इस मामले में कमी इससे कहीं अधिक थी। इसलिए ट्रिब्यूनल द्वारा सेवा की कमी को माफ करना लागू नियमों के अनुरूप नहीं था।

केंद्र ने 2008 के पेंशन रेगुलेशंस में मौजूद 12 महीने तक की कमी को माफ करने वाले प्रावधान पर भी आपत्ति जताई।

उसकी दलील थी कि सुमेर सिंह वर्ष 1974 में डिस्चार्ज हुए थे, जबकि 2008 के नियम बाद में अस्तित्व में आए। इसलिए उन्हें 1974 में हुए डिस्चार्ज पर पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता।

केंद्र सरकार ने 14 अगस्त 2001 के रक्षा मंत्रालय के आदेश का भी हवाला दिया। इस आदेश के तहत कुछ परिस्थितियों में छह महीने से अधिक और 12 महीने तक की सेवा कमी को माफ करने के लिए प्रशासनिक शक्तियां प्रत्यायोजित की गई थीं।

केंद्र का कहना था कि यह आदेश जारी होने की तारीख से प्रभावी था और 1974 में हुए डिस्चार्ज पर इसे लागू नहीं किया जा सकता।

चार सजा और प्रशासनिक डिस्चार्ज का तर्क

केंद्र सरकार ने सुमेर सिंह के सेवा रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें 1969 से 1972 के बीच चार सजा मिली थीं।

केंद्र के अनुसार ये सजा बार-बार अनुशासनहीनता की ओर संकेत करती थीं और इन्हीं परिस्थितियों में उन्हें प्रशासनिक कार्रवाई के तहत सेवा से डिस्चार्ज किया गया था।

केंद्र ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में उन्हें ऐसा सैनिक बताया गया था जिसकी सेवाएं अब आवश्यक नहीं थीं।

केंद्र का यह भी तर्क था कि सुमेर सिंह ने अपने जीवनकाल में डिस्चार्ज आदेश को चुनौती नहीं दी।

उनकी पत्नी ने लगभग 44 वर्ष बाद ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया। केंद्र ने देरी को भी पेंशन संबंधी दावे के खिलाफ एक महत्वपूर्ण परिस्थिति के रूप में रखा।

केंद्र ने यह भी कहा कि उपलब्ध पुराने सेवा रिकॉर्ड निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद नियमों के अनुसार नष्ट किए जा चुके थे।

ऐसे में इतने लंबे समय बाद यह दावा स्वीकार करना कठिन था कि सैनिक सेवा में बने रहना चाहते थे और उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध डिस्चार्ज किया गया था।

केंद्र की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि सेवा में कमी को माफ करने की शक्ति विवेकाधीन है।

इसलिए केवल यह तथ्य कि किसी कर्मचारी या सैनिक की सेवा अवधि कम है, अपने आप में माफी का अधिकार पैदा नहीं करता। प्राधिकारी को डिस्चार्ज की प्रकृति, सेवा रिकॉर्ड और लागू नियमों को देखते हुए निर्णय लेना होता है।

विधवा की ओर से क्या पक्ष रखा गया?

दूसरी ओर, विधवा की ओर से ट्रिब्यूनल के आदेश का समर्थन किया गया।

उनका पक्ष था कि पेंशन किसी प्रकार की दान या कृपा नहीं है, बल्कि सैनिक द्वारा दी गई सेवा से जुड़ा सामाजिक सुरक्षा लाभ है।

पति की मृत्यु के बाद परिवार को फैमिली पेंशन का लाभ मिलना इसी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है।

विधवा की ओर से सुप्रीम कोर्ट के Union of India and Others v. Balakrishnan Mullikote के फैसले का भी हवाला दिया गया।

इस फैसले में सेवा की कमी को माफ करने की शक्ति को विवेकाधीन माना गया था और पुराने निर्णय Ex Sepoy Chattar Pal की सीमाओं को स्पष्ट किया गया था।

विधवा की ओर से Surender Singh Parmar v. Union of India के निर्णय पर भी भरोसा किया गया।

इसमें सुप्रीम कोर्ट ने सेवा अवधि की गणना और सेवा में कमी को माफ करने से जुड़े सिद्धांतों पर विचार किया था।

विधवा की ओर से यह तर्क रखा गया कि उचित मामले में सक्षम प्राधिकारी द्वारा सेवा में कमी को माफ किया जा सकता है और जहां ऐसा नहीं किया गया हो, वहां हाईकोर्ट या ट्रिब्यूनल उचित निर्देश जारी कर सकता है।

ट्रिब्यूनल ने क्या आदेश दिया था?

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों और पेंशन नियमों पर विचार करते हुए माना था कि सुमेर सिंह की सेवा अवधि 13 वर्ष, 11 महीने और 28 दिन थी और पेंशन के लिए 15 वर्ष की सेवा की आवश्यकता थी।

ट्रिब्यूनल ने माना कि सेवा में कमी को निर्धारित परिस्थितियों में माफ किया जा सकता है।

ट्रिब्यूनल ने सेवा पेंशन के लिए कमी को माफ करते हुए यह निर्देश दिया कि सुमेर सिंह के जीवनकाल की सेवा पेंशन और उसके बाद उनकी पत्नी को फैमिली पेंशन मिले।

ट्रिब्यूनल ने पेंशन का बकाया वर्ष 1974 से देने के बजाय 1 अक्टूबर 2015 से 30 अप्रैल 2018 तक सेवा पेंशन और 1 मई 2018 से फैमिली पेंशन देने का आदेश दिया।

ट्रिब्यूनल ने यह भी आदेश दिया था कि बकाया राशि छह महीने के भीतर भुगतान की जाए। यदि भुगतान में देरी होती है तो बकाया पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देय होगा।

हाईकोर्ट की विस्तृत टिप्पणी-मामला केवल 1974 के नियमों तक सीमित नहीं

हाईकोर्ट ने केंद्र की इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि केवल इस आधार पर ट्रिब्यूनल का आदेश गलत हो जाता है कि सुमेर सिंह का डिस्चार्ज 1974 में हुआ था और बाद के नियम 2001 या 2008 में आए।

खंडपीठ ने कहा कि मामले को केवल डिस्चार्ज की तारीख के आधार पर नहीं देखा जा सकता।

विधवा का फैमिली पेंशन संबंधी दावा सुमेर सिंह की मृत्यु के बाद उत्पन्न हुआ।

ट्रिब्यूनल ने 1974 से अनिश्चितकालीन या पूर्ण पिछला पेंशन लाभ नहीं दिया था, बल्कि Tarsem Singh के सिद्धांत को लागू करते हुए बकाया को मूल आवेदन दाखिल करने से पहले की तीन वर्ष की अवधि तक सीमित रखा था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल ने यह नहीं माना था कि सुमेर सिंह को 1974 में डिस्चार्ज होते ही 2008 के नियमों के कारण पेंशन का अधिकार मिल गया था।

बल्कि सवाल यह था कि बाद के लाभकारी ढांचे को ध्यान में रखते हुए क्या उनकी सेवा में कमी को सीमित उद्देश्य से माफ किया जा सकता है ताकि उनकी विधवा को पेंशन सुरक्षा मिल सके।

हाईकोर्ट ने सेवा अवधि और कमी पर क्या कहा?

खंडपीठ ने रिकॉर्ड के आधार पर माना कि सुमेर सिंह ने 13 वर्ष, 11 महीने और 28 दिन की सेवा की थी।

सुप्रीम कोर्ट के Surender Singh Parmar मामले में निर्धारित सिद्धांत के अनुसार तीन महीने या उससे अधिक लेकिन छह महीने से कम की वर्ष की अंश सेवा को आधे वर्ष की सेवा के रूप में गणना करने का सिद्धांत भी ध्यान में रखा गया।

कोर्ट ने कहा कि केंद्र की आपत्ति मुख्य रूप से यह थी कि सुमेर सिंह की डिस्चार्ज की प्रकृति और लागू पेंशन व्यवस्था के कारण सेवा की कमी को माफ नहीं किया जा सकता।

लेकिन कोर्ट के अनुसार यह तर्क इस तथ्य को नजरअंदाज करता है कि सेवा में कमी को माफ करने की शक्ति का उद्देश्य उन मामलों में पेंशन से वंचित होने की स्थिति को रोकना है जहां सेवा की कमी सीमित है और अन्य परिस्थितियां लाभ देने पर विचार का आधार बनती हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘may’ शब्द का इस्तेमाल सेवा में कमी को माफ करने की शक्ति को विवेकाधीन बनाता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इस शक्ति का इस्तेमाल मनमाने ढंग से किया जा सकता है।

सेवा, परिस्थितियों और दावे की प्रकृति को ध्यान में रखकर उचित निर्णय लिया जाना चाहिए।

चार सजा के बावजूद पेंशन का दावा क्यों बरकरार रहा?

हाईकोर्ट ने केंद्र द्वारा बताए गए चार दंडों और प्रशासनिक डिस्चार्ज के तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया। कोर्ट ने माना कि ये बातें सेवा में कमी को माफ करने के विवेकाधीन निर्णय में प्रासंगिक हो सकती हैं।

लेकिन कोर्ट ने साथ ही यह भी कहा कि रिकॉर्ड से यह साबित नहीं हुआ कि सुमेर सिंह की प्रशासनिक रूप से की गई डिस्चार्ज ऐसी स्पष्ट श्रेणी में आती थी, जिसे पेंशन नियमों के तहत सेवा में कमी माफ करने से पूरी तरह बाहर रखा गया हो।

पेंशन रेगुलेशंस फॉर द आर्मी, 2008 के रेगुलेशन 44 में कुछ श्रेणियों को सेवा में कमी माफ करने से बाहर रखा गया है, जिनमें अपनी इच्छा से डिस्चार्ज लेने वाला व्यक्ति और कुछ अन्य श्रेणियां शामिल हैं।

हाईकोर्ट ने नोट किया कि सुमेर सिंह का डिस्चार्ज स्वैच्छिक नहीं था और वे इन स्पष्ट अपवर्जित श्रेणियों में नहीं आते थे।

दो युद्धों में भागीदारी को भी माना महत्वपूर्ण तथ्य

फैसले में हाईकोर्ट ने सुमेर सिंह के सैन्य जीवन के एक महत्वपूर्ण पहलू पर विशेष ध्यान दिया। रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने 1962 और 1971 के युद्धों में हिस्सा लिया था।

1962 के युद्ध में उनकी भागीदारी के लिए उन्हें रक्षा मेडल और 1971 के युद्ध में भागीदारी के लिए सैन्य सेना मेडल दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि इस तथ्य को पूरे सेवा रिकॉर्ड के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि वह चार सजा या प्रशासनिक डिस्चार्ज के तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर रही है और न ही सशस्त्र बलों में अनुशासन के मानकों को कम कर रही है।

लेकिन मौजूदा मामला सेवा में पुनर्नियुक्ति, बकाया वेतन, पदोन्नति या दशकों पुराने डिस्चार्ज आदेश को फिर से खोलने का नहीं था। मामला सीमित रूप से पेंशन सुरक्षा से जुड़ा था।

रिकॉर्ड नष्ट होने पर भी विधवा के खिलाफ नहीं जाएगा मामला

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड के नष्ट होने के मुद्दे पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि मूल रिकॉर्ड निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद नष्ट किए गए थे।

ऐसे में चार दशक से अधिक समय बाद विधवा से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अपने पति के डिस्चार्ज की उस समय की प्रत्येक परिस्थिति का सटीक प्रमाण प्रस्तुत करे।

कोर्ट के अनुसार उपलब्ध रिकॉर्ड से सेवा अवधि, डिस्चार्ज की प्रकृति, सजा और दोनों युद्धों में भागीदारी जैसे महत्वपूर्ण तथ्य पर्याप्त रूप से सामने आते हैं।

इसलिए रिकॉर्ड नष्ट हो जाने का लाभ केंद्र को इस तरह नहीं दिया जा सकता कि इससे विधवा के सीमित पेंशन दावे को ही समाप्त कर दिया जाए।

देरी पर भी हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण रुख

केंद्र की ओर से मामले में हुई लंबी देरी को लेकर भी आपत्ति उठाई गई थी।

हाईकोर्ट ने माना कि सुमेर सिंह ने अपने जीवनकाल में पेंशन के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाया था और उनकी पत्नी ने काफी समय बाद ट्रिब्यूनल का रुख किया।

लेकिन कोर्ट ने पेंशन को केवल कृपा या इनाम के रूप में देखने से इनकार किया।

कोर्ट ने कहा कि पेंशन सेवा से जुड़ा सामाजिक सुरक्षा लाभ है और फैमिली पेंशन का उद्देश्य कर्मचारी या सशस्त्र बल के सदस्य की मृत्यु के बाद उसके आश्रित परिवार को सुरक्षा प्रदान करना है।

कोर्ट ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि ट्रिब्यूनल ने वर्ष 1974 से पूरा बकाया नहीं दिया था।

उसने बकाया को केवल 1 अक्टूबर 2015 से 30 अप्रैल 2018 तक सीमित रखा और 1 मई 2018 से फैमिली पेंशन का लाभ देने का आदेश दिया था।

हाईकोर्ट ने कहा-ट्रिब्यूनल ने यांत्रिक तरीके से नहीं दी राहत

खंडपीठ ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया कि ट्रिब्यूनल ने सेवा में कमी माफ करने की शक्ति का यांत्रिक रूप से इस्तेमाल किया था।

कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने सेवा की वास्तविक अवधि, सेवा की गणना से संबंधित सिद्धांत, इस तथ्य कि सैनिक ने स्वेच्छा से डिस्चार्ज नहीं लिया था और पेंशन नियमों में मौजूद अपवर्जित श्रेणियों को ध्यान में रखा था। इसलिए ट्रिब्यूनल का निष्कर्ष प्रासंगिक तथ्यों और कानून पर आधारित था।

“परिवार की पेंशन कोई बाउंटी नहीं”-हाईकोर्ट की टिप्पणी

फैसले के अंतिम हिस्से में खंडपीठ ने कहा कि यह सही है कि सुमेर सिंह ने अपने जीवनकाल में पेंशन का लाभ लेने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाया और डिस्चार्ज के बाद उसी स्थिति में रहे।

लेकिन उनकी विधवा की फैमिली पेंशन को किसी कृपा या दान के रूप में नहीं देखा जा सकता।

केंद्र सरकार की याचिका खारिज, ट्रिब्यूनल का आदेश बरकरार

सभी तथ्यों, पेंशन नियमों और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों पर विचार करने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने माना कि आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के 9 मई 2023 के आदेश में ऐसा कोई कानूनी दोष, अधिकार क्षेत्र की त्रुटि या ऐसी विकृति नहीं है, जिसके आधार पर हाईकोर्ट अपने रिट अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करे।

खंडपीठ ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने सेवा की कमी को केवल पेंशन के सीमित उद्देश्य के लिए माफ किया और बकाया को मूल आवेदन दाखिल करने से पहले की तीन वर्ष की अवधि तक सीमित रखा। हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार की रिट याचिका खारिज कर दी।

दिवंगत सिपाही सुमेर सिंह की विधवा को ट्रिब्यूनल के आदेश के अनुसार सेवा पेंशन का निर्धारित बकाया और 1 मई 2018 से फैमिली पेंशन का लाभ मिलेगा। यदि ट्रिब्यूनल के निर्देशों का पहले से पालन नहीं किया गया है, तो केंद्र सरकार को निर्धारित अवधि के अनुसार उनका पालन करना होगा।

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