नई दिल्ली। देश की अदालतों में डिक्री मिलने के बाद भी उसका लाभ नहीं मिलने के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता दिखाई है।
देश की जिला अदालतों में 8 लाख से ज्यादा सिविल एग्जीक्यूशन याचिकाएं लंबित होने पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट से इन मामलों की प्रगति रिपोर्ट मांगी है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि केवल हर 6 महीने में लंबित मामलों के आंकड़े मंगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। यह देखना जरूरी है कि वास्तव में कितने मामलों का निस्तारण हुआ है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने यह बात पेरियम्मल (डेड) एंड अदर्स बनाम वी. राजामणि एंड अनदर मामले की सुनवाई के दौरान कही। कोर्ट अलग-अलग हाईकोर्ट से मिली अनुपालन रिपोर्ट की समीक्षा कर रहा था और अब इन मामलों में हुई प्रगति की रिपोर्ट भी मांगी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एग्जीक्यूशन मामलों के निपटारे पर लगातार नजर रखने के लिए एक ठोस व्यवस्था जरूरी है।
डिक्री मिलने के बाद भी नहीं मिलता पूरा लाभ
यह मामला पेरियम्मल बनाम वी. राजामणि से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि देशभर की जिला अदालतों में 8 लाख से ज्यादा सिविल एग्जीक्यूशन मामले लंबित हैं।
किसी सिविल मुकदमे में कोर्ट किसी पक्ष के हक में फैसला या डिक्री देता है, लेकिन सामने वाला उस आदेश का पालन नहीं करता, तो उसे लागू कराने के लिए एग्जीक्यूशन की कार्रवाई शुरू की जाती है।
उदाहरण के लिए, कोर्ट ने किसी व्यक्ति के पक्ष में फैसला दिया और सामने वाले को पैसा देने या संपत्ति का कब्जा देने का आदेश दिया। लेकिन सामने वाले ने कोर्ट का आदेश नहीं माना। ऐसे में फैसला पाने वाला व्यक्ति कोर्ट में एग्जीक्यूशन की कार्रवाई शुरू कर सकता है, ताकि कोर्ट के आदेश को लागू कराया जा सके।
यानी सिर्फ कोर्ट से फैसला मिल जाना काफी नहीं है। जब तक उस फैसले के मुताबिक पैसा या संपत्ति वास्तव में नहीं मिलती, तब तक उसे लागू कराने की प्रक्रिया चलती रहती है। कई मामलों में इसी प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2025 में भी इस समस्या पर सख्त रुख अपनाया था। उस समय चार दशक पुराने संपत्ति विवाद की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि डिक्री लागू होने में देरी से उसे पाने वाले व्यक्ति को फैसले का वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता।
एग्जीक्यूशन मामले 6 महीने में निपटाने का दिया था निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने 6 मार्च 2025 को इसी मामले में निर्देश दिया था कि हाईकोर्ट अपने अधीन आने वाली जिला कोर्टों में एग्जीक्यूशन मामलों को सामान्य तौर पर 6 महीने के अंदर निपटाने की व्यवस्था करें।
अगर किसी मामले में इससे ज्यादा समय लगता है तो संबंधित न्यायिक अधिकारी से प्रशासनिक स्तर पर जवाब मांगा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने उस समय कहा था कि किसी व्यक्ति के पक्ष में फैसला आने के बाद भी अगर उसे उसका लाभ नहीं मिलता, तो सिर्फ फैसला मिल जाना पर्याप्त नहीं है। फैसले को लागू कराने में होने वाली देरी भी न्याय के उद्देश्य को प्रभावित करती है।
एग्जीक्यूशन मामलों में देरी की कई वजहें सामने आईं
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने अलग-अलग हाईकोर्ट से मिली जानकारी कोर्ट के सामने रखी। इसमें एग्जीक्यूशन मामलों में देरी की कई वजहें सामने आईं।
इनमें अंतरिम रोक, आपत्तियां, वकीलों का सुनवाई में पेश नहीं होना और बार-बार तारीख बढ़ना शामिल हैं। इसके अलावा कई मामलों में जिस व्यक्ति के खिलाफ फैसला हुआ है, उसे नोटिस नहीं मिल पाता या उसकी संपत्ति का पता नहीं चल पाता।
केस की निगरानी के लिए विशेष सेल बनाने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने एग्जीक्यूशन मामलों की निगरानी के लिए अलग व्यवस्था बनाने पर जोर दिया। कोर्ट ने कमर्शियल कोर्ट्स रूल्स के नियम 12 का जिक्र करते हुए कहा कि इसके तहत ऐसे मामलों की निगरानी के लिए विशेष सेल बनाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि दूसरे हाईकोर्ट भी इस तरह के सेल क्यों नहीं बना सकते। सुनवाई के दौरान बताया गया कि अभी तक सिर्फ एक हाईकोर्ट ने ऐसी निगरानी व्यवस्था बनाई है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे सेल अलग-अलग अदालतों में चल रहे एग्जीक्यूशन मामलों की प्रगति पर नजर रखने में मदद कर सकते हैं।
एग्जीक्यूशन के लिए तय समय सीमा तय करने का सुझाव
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि सरकार मूल कानून में जरूरी प्रावधान जोड़ने और सिविल प्रक्रिया संहिता में उससे जुड़े बदलावों पर विचार कर रही है।
इस पर जस्टिस पारदीवाला ने सुझाव दिया कि एग्जीक्यूशन की प्रक्रिया के लिए कानून में ही तय समय सीमा रखी जा सकती है। इससे मामलों को निपटाने की समय सीमा स्पष्ट हो सकेगी।
अब सिर्फ आंकड़े नहीं, निपटारे की प्रगति देखेगा कोर्ट
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कितने एग्जीक्यूशन मामले लंबित हैं। अब यह भी देखा जाएगा कि इन मामलों को निपटाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं और वास्तव में कितने मामलों का निपटारा हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से सुनवाई के आधार पर 3 से 4 पेज की रिपोर्ट देने को कहा है।
मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को होगी।