दर्जनों वीडियो में मृतका ने आरोपी को ठहराया जिम्मेदार, फिर भी हाईकोर्ट ने दी जमानत; कहा-आत्महत्या से निकट संबंध वाला जानबूझकर किया कृत्य दिखाना जरूरी, सिर्फ भावनात्मक पीड़ा नहीं या आरोपी के आचरण से परेशानी पर्याप्त नहीं
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में आरोपी को जमानत देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी रिश्ते का टूटना, बातचीत बंद होना, फोन नंबर ब्लॉक करना या आरोपी का किसी अन्य महिला के साथ संबंध होना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध साबित नहीं करता।
हाईकोर्ट ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के लिए केवल मृतक की भावनात्मक पीड़ा या आरोपी के आचरण से हुई परेशानी पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत अभियोजन को प्रथमदृष्टया ऐसा सकारात्मक, सक्रिय और निकटतम कृत्य दिखाना होगा, जिससे आरोपी द्वारा आत्महत्या के लिए उकसाने, भड़काने या जानबूझकर सहायता करने का आवश्यक तत्व सामने आए।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह आदेश जयपुर निवासी दिनेश मेहरा उर्फ श्यामजी को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 483 के तहत नियमित जमानत आवेदन पेश किया गया था।
हाईकोर्ट ने जमानत याचिका स्वीकार करते हुए आरोपी को 50 हजार रुपये के व्यक्तिगत बॉन्ड और 25-25 हजार रुपये की दो जमानतों पर रिहा करने का आदेश दिया है।
रिपोर्टेबल जजमेंट और महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए अपने फैसले में महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु को स्पष्ट किया है।
हाईकोर्ट ने इस फैसले में आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में भावनात्मक कारण और आपराधिक उकसावे के बीच स्पष्ट कानूनी अंतर को रेखांकित किया है।
हाईकोर्ट ने माना कि किसी रिश्ते का टूटना, अस्वीकार किया जाना या आरोपी का किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध बनाना मृतक के लिए अत्यंत पीड़ादायक हो सकता है।
लेकिन आपराधिक कानून के तहत आरोपी को जिम्मेदार ठहराने के लिए इससे आगे जाकर यह साबित करना आवश्यक है कि आरोपी का आचरण कानूनी रूप से अपेक्षित उकसावे या जानबूझकर सहायता के स्तर तक पहुंचता है और उसका आत्महत्या से निकट संबंध है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर प्रथमदृष्टया ऐसा स्पष्ट निकटतम कृत्य नहीं पाया और आरोपी को जमानत प्रदान कर दी।
मृतका ने लगातार बनाए थे वीडियो, आरोपी पर लगाए थे आरोप
जयपुर के पुलिस थाना सदर में दर्ज एफआईआर के अनुसार मृतका और आरोपी एक-दूसरे को जानते थे और दोनों के बीच काफी समय से प्रेम संबंध था।
एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 108 और 308(2) के तहत आरोप लगाए गए थे। बाद में अन्य धाराएं भी जोड़ी गई हैं।
एफआईआर के अनुसार घटना से कुछ समय पहले मृतका द्वारा बनाए गए कई वीडियो मौजूद हैं।
इन वीडियो में मृतका ने अपने और आरोपी के बीच प्रेम संबंध समाप्त होने, आरोपी द्वारा उसे ब्लॉक किए जाने और आरोपी के जीवन में किसी अन्य महिला के आने जैसी बातें कही थीं।
मृतका ने कथित तौर पर आरोपी को अपनी स्थिति के लिए जिम्मेदार भी बताया था और उसके खिलाफ सख्त से सख्त सजा की मांग करते हुए फांसी की मांग की थी।
बचाव पक्ष की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विभूतिभूषण शर्मा, हर्षित तिवाड़ी, अनिंद्या गुप्ता और सुमन कलाल ने हाईकोर्ट के समक्ष नियमित जमानत की मांग करते हुए दलील दी कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए अपराधों का मामला प्रथमदृष्टया नहीं बनता और उसकी लगातार हिरासत आवश्यक नहीं है।
अधिवक्ता ने दलील दी कि इस मामले में आत्महत्या के लिए उकसावे का अपराध स्थापित करने के लिए आरोपी की ओर से तत्काल उकसावा, दबाव या ऐसा कोई प्रत्यक्ष कृत्य होना आवश्यक है, जो व्यक्ति को आत्महत्या के लिए प्रेरित करे।
अधिवक्ता विभूतिभूषण शर्मा ने दलील दी कि महिला और आरोपी के बीच लंबे समय से कोई संपर्क नहीं था।
डेढ़ साल की अवधि में महिला ने आरोपी को प्रतिदिन हजारों कॉल किए, लेकिन आरोपी ने फोन नहीं उठाया।
यहां तक कि आरोपी ने करीब एक साल से महिला को ब्लॉक कर रखा था। ऐसे में आरोपी की ओर से आत्महत्या के लिए तत्काल उकसावे या दबाव का कोई कृत्य सामने नहीं आता।
अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि महिला अपने वैवाहिक जीवन को लेकर भी परेशान थी। उसके कथन के अनुसार, उसका पति करीब 15 वर्षों से उसके साथ मारपीट और प्रताड़ना करता था।
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि महिला ने आरोपी पर लंबे समय तक उसका शोषण करने और किसी अन्य महिला के साथ संबंध होने के आरोप लगाए थे।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि आत्महत्या के लिए उकसावे के मामले में महज मानसिक पीड़ा, भावनात्मक तनाव या रिश्ते का टूटना अपने आप में पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए उकसाया, दबाव बनाया या ऐसा कोई प्रत्यक्ष कृत्य किया, जिसका आत्महत्या से स्पष्ट और निकट संबंध हो।
अधिवक्ताओं ने कहा कि जब आरोपी डेढ़ साल से महिला के संपर्क में ही नहीं था और करीब एक साल से उसे ब्लॉक कर रखा था, तो उसके खिलाफ तत्काल उकसावे का आरोप प्रथमदृष्टया कैसे स्थापित होता है, यह महत्वपूर्ण प्रश्न है।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि महिला को इस बात को लेकर ईर्ष्या थी कि आरोपी किसी अन्य महिला के साथ संबंध में क्यों है। इसी व्यक्तिगत भावनात्मक स्थिति को आरोपी की ओर से आत्महत्या के लिए उकसावे के रूप में नहीं देखा जा सकता, ऐसा बचाव पक्ष का कहना था।
सरकार और मृतका का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से पेश लोक अभियोजक ने जमानत याचिका का विरोध किया।
अभियोजन पक्ष ने अदालत के समक्ष कहा कि वर्तमान मामला ऐसा नहीं है, जिसमें आरोपी को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।
राज्य की ओर से आरोपी की जमानत का विरोध करते हुए उसके खिलाफ उपलब्ध जांच सामग्री और मामले की परिस्थितियों पर भरोसा किया गया।
वहीं मृतका के परिजनों की ओर से कहा गया कि मृतका को झांसे में लेकर लंबे समय तक शोषण किया गया।
सुनवाई के दौरान मृतका द्वारा घटना से कुछ समय पहले बनाए गए कई वीडियो पेश किए गए।
वीडियो में मृतका ने कथित तौर पर अपने और आरोपी के बीच रिश्ते के खत्म होने, आरोपी द्वारा उसे ब्लॉक करने तथा आरोपी के किसी अन्य महिला के साथ संबंध होने की बात कही थी। उसने आरोपी को अपनी स्थिति के लिए जिम्मेदार भी बताया था।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों के बाद क्या माना?
दोनों पक्षों की दलीलों और जांच सामग्री पर बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के कानूनी तत्वों को महत्वपूर्ण माना।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने कहा कि केवल यह तथ्य कि किसी व्यक्ति ने आत्महत्या की और उसके जीवन में आरोपी से जुड़ी कोई भावनात्मक या व्यक्तिगत परिस्थिति थी, अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध स्थापित नहीं करता।
अभियोजन को प्रथमदृष्टया ऐसा सक्रिय और निकटतम कृत्य दिखाना होगा, जिससे यह सामने आए कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए उकसाया, भड़काया या जानबूझकर सहायता की।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि मृतका की भावनात्मक संवेदनशीलता या किसी रिश्ते के टूटने से उसे हुई गंभीर मानसिक पीड़ा को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन भावनात्मक पीड़ा और आपराधिक उकसावे के बीच कानूनी अंतर बनाए रखना जरूरी है।
भावनात्मक पीड़ा और कानूनी उकसावे में अंतर
जस्टिस फरजंद अली ने अपने आदेश में आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध की कानूनी सीमा को विस्तार से समझाया।
अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को भावनात्मक रूप से ठेस पहुंचना, निराशा होना या किसी रिश्ते के खत्म होने से गहरा मानसिक आघात होना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बन जाता।
आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए कानून को इससे आगे जाकर यह देखना होता है कि क्या आरोपी का कोई ऐसा आचरण था जिसे आत्महत्या के लिए उकसाने, भड़काने या जानबूझकर सहायता करने के उद्देश्य से किया गया सकारात्मक और निकटतम कृत्य माना जा सकता है।
धारा 108 BNS पर हाईकोर्ट ने समझाया कानून
हाईकोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 108 पर विचार करते हुए कहा कि इसका मूल कानूनी सिद्धांत भारतीय दंड संहिता की धारा 306 में मौजूद आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के समान है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस तथ्य से कि किसी व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली और आरोपी किसी तरह उससे जुड़ा हुआ था, आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध अपने आप स्थापित नहीं हो जाता।
इसके लिए यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी की ओर से उकसाने या जानबूझकर सहायता करने वाला कृत्य था और उस कृत्य का आत्महत्या से आवश्यक निकट संबंध यानी proximate nexus था।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि आत्महत्या के मामले में अभियोजन को केवल दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। आरोपी के आचरण और आत्महत्या के बीच आवश्यक कानूनी संबंध भी स्थापित होना चाहिए।
फोन ब्लॉक करना और बातचीत बंद करना—क्या यह उकसावा है?
मामले में उपलब्ध सामग्री के अनुसार, आरोपी ने मृतका से बातचीत बंद कर दी थी और उसके फोन नंबर ब्लॉक कर दिए थे।
मृतका के वीडियो में भी इस बात को लेकर नाराजगी और पीड़ा दिखाई देती है। वीडियो में उसने आरोपी पर रिश्ते को खत्म करने और किसी दूसरी महिला के साथ संबंध बनाने का आरोप लगाया था।
लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों को आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के संदर्भ में अलग-अलग स्तर पर देखना होगा।
अदालत के अनुसार, किसी रिश्ते को समाप्त करना, बातचीत बंद करना या किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध बनाना, भले ही उससे दूसरे व्यक्ति को भावनात्मक पीड़ा हुई हो, तब तक आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता जब तक आरोपी के आचरण में कानून द्वारा अपेक्षित उकसावे या जानबूझकर सहायता के तत्व मौजूद न हों।
जमानत देते समय हाईकोर्ट का निष्कर्ष
अदालत ने कहा कि इस स्तर पर उपलब्ध सामग्री से आरोपी की ओर से ऐसा कोई स्पष्ट और निकटतम सकारात्मक कृत्य पर्याप्त रूप से सामने नहीं आता, जिसे प्रथमदृष्टया आत्महत्या के लिए उकसाने के आवश्यक कानूनी तत्वों के रूप में देखा जा सके।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अंतिम निर्णय नहीं है और न ही आरोपी को आरोपों से बरी किया गया है। मामले में उपलब्ध साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन ट्रायल के दौरान किया जाएगा।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने आरोपी की जमानत मंजूर करते हुए उसे 50 हजार रुपये के व्यक्तिगत बॉन्ड और 25-25 हजार रुपये की दो जमानतों पर रिहा करने का आदेश दिया।
नोट: आदेश में प्रतिवादी राज्य की ओर से विस्तृत लिखित तर्क अलग से दर्ज नहीं हैं; आदेश में मुख्य रूप से इतना दर्ज है कि लोक अभियोजक ने जमानत का विरोध किया और आरोपी की हिरासत को जारी रखना उचित बताया। इसलिए इससे आगे अभियोजन की कोई ऐसी दलील जोड़ना, जो आदेश में दर्ज नहीं है, तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
मृतका के वीडियो को कोर्ट ने पूरी तरह खारिज नहीं किया
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मृतका द्वारा बनाए गए वीडियो को इस स्तर पर पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने माना कि वीडियो में मृतका ने आरोपी को अपनी स्थिति के लिए जिम्मेदार बताया था और आरोपी को दंडित किए जाने की इच्छा भी व्यक्त की थी।
लेकिन जमानत के स्तर पर अदालत को पूरे साक्ष्य का उसी तरह सूक्ष्म मूल्यांकन नहीं करना होता, जैसा ट्रायल के दौरान किया जाएगा।
अदालत ने कहा कि वीडियो में दिखाई देने वाली भावनात्मक स्थिति महत्वपूर्ण है, लेकिन यह अलग प्रश्न है कि आरोपी के खिलाफ कानूनी रूप से आवश्यक mens rea और आत्महत्या से निकट संबंध प्रथमदृष्टया स्थापित होते हैं या नहीं।
संवेदनशीलता को आरोपी का अपराध नहीं माना जा सकता
हाईकोर्ट ने मानव व्यवहार और व्यक्तिगत संवेदनशीलता के पहलू पर भी विस्तार से चर्चा की।
अदालत ने कहा कि हर व्यक्ति किसी रिश्ते के खत्म होने, अस्वीकार किए जाने, अलगाव, ईर्ष्या, परित्याग या करीबी संबंध खोने की स्थिति पर एक समान प्रतिक्रिया नहीं देता।
किसी व्यक्ति के लिए किसी रिश्ते का टूटना अत्यंत गंभीर भावनात्मक संकट हो सकता है, जबकि कोई अन्य व्यक्ति उसी परिस्थिति को अलग तरीके से स्वीकार कर सकता है।
लेकिन केवल इस आधार पर कि किसी व्यक्ति ने किसी परिस्थिति को अत्यधिक भावनात्मक रूप से लिया, दूसरे व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
आपराधिक कानून हर गलत आचरण को अपराध नहीं बनाता
जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि आपराधिक कानून का परीक्षण इस बात पर केंद्रित होता है कि आरोपी का आचरण संबंधित दंडात्मक प्रावधान के आवश्यक तत्वों को पूरा करता है या नहीं।
किसी व्यक्ति का व्यवहार भावनात्मक रूप से गलत, कठोर, असंवेदनशील या सामाजिक रूप से अस्वीकार्य माना जा सकता है, लेकिन केवल नैतिक या सामाजिक आधार पर किसी आचरण को आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक संबंधित कानून के आवश्यक तत्व मौजूद न हों।
अदालत ने इस अंतर को विशेष रूप से रेखांकित किया क्योंकि वर्तमान मामले में मृतका के वीडियो में रिश्ते के टूटने और आरोपी के किसी अन्य महिला से जुड़ने को लेकर उसकी भावनात्मक प्रतिक्रिया सामने आई थी।
‘Eggshell Skull’ सिद्धांत का भी उल्लेख
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में “Eggshell Skull” या “Thin Skull” सिद्धांत का भी उल्लेख किया।
अदालत ने समझाया कि यह सिद्धांत अपने उचित क्षेत्र में यह मानता है कि यदि किसी व्यक्ति ने पहले से मौजूद असामान्य संवेदनशीलता के कारण किसी कानूनी रूप से दोषपूर्ण कृत्य के परिणाम को सामान्य व्यक्ति की तुलना में अधिक गंभीर रूप से अनुभव किया, तो आरोपी केवल इस आधार पर जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस सिद्धांत को आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध की मूल कानूनी आवश्यकताओं को समाप्त करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
यानी पहले यह देखना जरूरी है कि आरोपी का कोई ऐसा कानूनी रूप से दोषपूर्ण कृत्य था, जो आत्महत्या के लिए उकसाने के आवश्यक तत्वों को पूरा करता हो।
अभियोजन को दिखाना होगा सक्रिय और निकटतम कृत्य
हाईकोर्ट ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में केवल भावनात्मक परिणाम पर्याप्त नहीं है।
अभियोजन को यह दिखाना होगा कि आरोपी ने कोई ऐसा सकारात्मक, सक्रिय और निकटतम कृत्य किया, जिसका उद्देश्य या आवश्यक परिणाम आत्महत्या के लिए उकसाना, भड़काना या जानबूझकर सहायता करना था।
अदालत ने कहा कि किसी रिश्ते का टूटना या आरोपी का दूसरी महिला के साथ संबंध बनाना मृतका के लिए गहरे भावनात्मक संकट का कारण हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में धारा 108 BNS के तहत अपराध के सभी तत्वों को पूरा नहीं करता।
जमानत के स्तर पर कोर्ट ने क्या देखा?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर अभियोजन के पूरे मामले पर अंतिम फैसला नहीं कर रहा है।
जमानत पर विचार करते समय अदालत को यह देखना होता है कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर आरोपी के खिलाफ प्रथमदृष्टया ऐसा मामला बनता है या नहीं, जिससे लगातार हिरासत जरूरी हो।
अदालत ने माना कि जांच के दौरान एकत्र सामग्री में मृतका और आरोपी के संबंध, रिश्ते के टूटने और मृतका की भावनात्मक स्थिति से जुड़ी सामग्री मौजूद है। लेकिन अदालत को यह भी दिखाई दिया कि उपलब्ध सामग्री से आरोपी की ओर से आत्महत्या से ठीक पहले किया गया कोई स्पष्ट, सकारात्मक और निकटतम उकसाने वाला कृत्य पर्याप्त स्पष्टता से सामने नहीं आता।
ट्रायल में साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन होगा
हाईकोर्ट ने कहा कि मृतका के वीडियो, उसके कथन और जांच के दौरान एकत्र अन्य सामग्री का अंतिम मूल्यांकन ट्रायल के दौरान किया जाएगा।
जमानत के चरण में अदालत को पूरे साक्ष्य का ऐसा सूक्ष्म मूल्यांकन नहीं करना चाहिए, जैसा अंतिम निर्णय देते समय किया जाता है।
अदालत ने यह भी कहा कि यह तय करना कि आरोपी के आचरण ने वास्तव में आत्महत्या के लिए उकसाने का कानूनी अपराध किया या नहीं, अंततः ट्रायल के दौरान साक्ष्य के विस्तृत परीक्षण का विषय रहेगा।
हाईकोर्ट ने माना-लंबी हिरासत जरूरी नहीं
मामले की प्रकृति, उपलब्ध सामग्री और जमानत के स्तर पर लागू कानूनी सिद्धांतों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी की लगातार हिरासत को उचित ठहराने के लिए प्रथमदृष्टया पर्याप्त आधार नहीं बनता।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि ट्रायल पूरा होने में पर्याप्त समय लग सकता है। इन्हीं परिस्थितियों में Justice फरजंद अली ने आरोपी को जमानत देने का निर्णय लिया।
50 हजार के बॉन्ड पर जमानत, दो जमानतदार भी देने होंगे
हाईकोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि आरोपी 50,000 रुपये के व्यक्तिगत बॉन्ड और 25,000-25,000 रुपये की दो जमानत प्रस्तुत करने पर रिहा किया जाएगा।
यह जमानत संबंधित ट्रायल जज की संतुष्टि के अधीन रहेगी।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि आरोपी को मामले की सुनवाई के दौरान निर्धारित तारीखों पर उपस्थित रहना होगा और जब भी अदालत द्वारा बुलाया जाए, तब उपस्थित होना अनिवार्य होगा।
हाईकोर्ट ने नहीं दी अंतिम क्लीन चिट
इस आदेश का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जमानत मिलने का अर्थ आरोपी का बरी होना नहीं है।
हाईकोर्ट ने स्वयं स्पष्ट किया कि उसने अभियोजन मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है।
अदालत ने केवल जमानत के चरण पर उपलब्ध सामग्री और आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के आवश्यक कानूनी तत्वों का प्रथमदृष्टया परीक्षण किया है।
मामले में आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की अंतिम सत्यता, साक्ष्यों की विश्वसनीयता और आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण ट्रायल कोर्ट द्वारा साक्ष्यों के परीक्षण के बाद किया जाएगा।