हाईकोर्ट ने कहा-मूल दस्तावेज फीस वसूली का हथियार नहीं,आर्थिक विवाद के कारण विद्यार्थी का भविष्य दांव पर नहीं लगा सकते
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने शुक्रवार को अवकाश के दिन मेडिकल शिक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में विशेष सुनवाई करते हुए मेडिकल छात्रा के शैक्षणिक भविष्य को लेकर बड़ा अंतरिम आदेश दिया।
छात्रा के भविष्य को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल के निर्देश पर अवकाशकालीन जस्टिस फरजंद अली की विशेष एकलपीठ का गठन किया गया।
जस्टिस फरजंद अली की अदालत ने छात्रा का पक्ष सुनने के बाद श्रीगंगानगर के सुरेंद्र डेंटल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट को आदेश दिया है कि बीकानेर निवासी छात्रा नंदिनी स्वामी के सभी मूल शैक्षणिक दस्तावेज शनिवार, 24 अक्टूबर को सुबह 11 बजे तक लौटाए जाएं।
प्रथम वर्ष की छात्रा नंदिनी को कॉलेज ने शेष चार साल की पूरी फीस जमा कराने की शर्त पर दस्तावेज लौटाने से इनकार कर दिया था।
पूरी फीस वसूलने के लिए छात्रों के मूल दस्तावेज रोकना गलत
राजस्थान हाईकोर्ट का यह अंतरिम आदेश उन विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो एक संस्थान में प्रवेश लेने के बाद किसी दूसरे संस्थान में पढ़ाई का अवसर मिलने पर अपने मूल दस्तावेज वापस चाहते हैं, लेकिन फीस संबंधी विवाद के कारण उन्हें दस्तावेज नहीं मिल पाते।
अदालत ने फिलहाल इतना स्पष्ट कर दिया है कि संस्थान अपने वैध आर्थिक दावों के लिए कानून का सहारा ले सकता है, लेकिन फीस विवाद के नाम पर विद्यार्थी के शैक्षणिक भविष्य को अनिश्चितता में नहीं छोड़ा जा सकता।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी विद्यार्थी के मूल शैक्षणिक दस्तावेजों को फीस वसूली के लिए सुरक्षा के तौर पर नहीं रोका जा सकता।
यदि संस्थान का कोई वैध आर्थिक दावा है, तो उसे कानून के अनुसार अलग से निपटाया जाना चाहिए। फीस का विवाद अपनी जगह है, लेकिन उसके कारण विद्यार्थी की आगे की पढ़ाई और भविष्य को खतरे में नहीं डाला जा सकता।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के सक्षम अधिकारियों को आदेश की पालना सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। जरूरत पड़ने पर श्रीगंगानगर के संबंधित उपखंड अधिकारी को दस्तावेज वापस दिलाने में सहायता करनी होगी।
बीडीएस में लिया प्रवेश, बाद में एमबीबीएस का अवसर मिला
याचिकाकर्ता बीकानेर निवासी 20 वर्षीय नंदिनी स्वामी ने श्रीगंगानगर स्थित सुरेंद्र डेंटल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट में बीडीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया था।
इसके लिए उसने कॉलेज में कुल 2 लाख 75 हजार रुपये जमा कराए और अपने मूल शैक्षणिक दस्तावेज भी जमा करवा दिए।
बाद की काउंसलिंग में छात्रा को हरियाणा के झज्जर स्थित वर्ल्ड कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश का अवसर मिल गया।
यह संस्थान पंडित बी.डी. शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय, रोहतक से संबद्ध है।
नए संस्थान में प्रवेश की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए छात्रा को अपने मूल शैक्षणिक दस्तावेजों की जरूरत थी।
छात्रा ने पहले कॉलेज से प्रवेश वापस लेने, जमा फीस के निपटारे और मूल दस्तावेज लौटाने का अनुरोध किया।
लेकिन कॉलेज प्रशासन ने 21 अक्टूबर 2026 को पत्र जारी कर दस्तावेज लौटाने से इनकार कर दिया।
चार साल की पूरी फीस मांगने पर हाईकोर्ट पहुंची छात्रा
कॉलेज प्रशासन का कहना था कि उसकी नीति के अनुसार, शेष चार वर्षों के पाठ्यक्रम की पूरी निर्धारित फीस जमा कराने के बाद ही मूल दस्तावेज लौटाए जा सकते हैं।
इस शर्त के चलते छात्रा ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिका में दलील दी गई कि किसी विद्यार्थी को पहले संस्थान में प्रवेश लेने के बाद बेहतर शैक्षणिक अवसर मिलता है, तो केवल इसी आधार पर उसे पुराने संस्थान में पढ़ाई जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संजय माथुर, रचिता माथुर और हर्षित गोयल ने पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि फीस संबंधी विवाद के कारण मूल दस्तावेज रोकना छात्रा के शैक्षणिक हितों के प्रतिकूल है। दस्तावेज नहीं मिलने से दूसरे संस्थान में प्रवेश लेने का अवसर भी प्रभावित हो सकता है।
वहीं, राज्य सरकार और काउंसलिंग बोर्ड की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता एन.एस. राजपुरोहित ने दलील दी कि छात्रा को दूसरे चरण की काउंसलिंग में सीट आवंटित हुई थी।
प्रवेश लेने के बाद सीट छोड़ने से उसके खाली रह जाने और संस्थान को आर्थिक नुकसान होने की आशंका है।
मूल दस्तावेज फीस वसूली का हथियार नहीं
सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद जस्टिस फरजंद अली की विशेष एकलपीठ ने कहा कि विद्यार्थी के शैक्षणिक हितों और संस्थान के आर्थिक हितों के बीच संतुलन जरूरी है। हालांकि, फीस वापसी और मूल दस्तावेज लौटाने के सवाल को अलग-अलग देखा जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही संस्थान का फीस या प्रवेश वापस लेने से संबंधित कोई वैध दावा हो, लेकिन केवल उस दावे के आधार पर विद्यार्थी के मूल दस्तावेज रोकने का असीमित अधिकार नहीं मिल जाता।
हाईकोर्ट के अनुसार, मूल शैक्षणिक दस्तावेज किसी विवादित आर्थिक दावे की वसूली के लिए सुरक्षा के तौर पर इस्तेमाल नहीं किए जा सकते।
संस्थान को अपनी बकाया फीस या अन्य वैध देनदारी की वसूली के लिए कानून में उपलब्ध उपाय अपनाने होंगे।
शैक्षणिक दस्तावेज सामान्य सामान नहीं, विद्यार्थी के भविष्य की चाबी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि विद्यार्थियों के मूल शैक्षणिक दस्तावेज सामान्य वस्तुएं या व्यावसायिक संपत्ति नहीं हैं।
ये दूसरे संस्थान में प्रवेश लेने, आगे की पढ़ाई जारी रखने और नए शैक्षणिक अवसरों का लाभ उठाने के लिए जरूरी होते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी विद्यार्थी के दस्तावेज रोकने से उसे ऐसा नुकसान हो सकता है, जो संस्थान और विद्यार्थी के बीच चल रहे आर्थिक विवाद से कहीं अधिक गंभीर हो। फीस की वसूली और दस्तावेज लौटाने के अधिकारों को एक-दूसरे के विकल्प के रूप में नहीं देखा जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थानों से अपेक्षा की जाती है कि वे विद्यार्थियों के शैक्षणिक हितों को ध्यान में रखते हुए निष्पक्ष और जिम्मेदार तरीके से काम करें। संस्थानों के आर्थिक हितों की रक्षा भी कानून और लागू नियमों के अनुसार ही की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट के चार अहम अंतरिम आदेश
शनिवार सुबह 11 बजे तक लौटाने होंगे दस्तावेज
हाईकोर्ट ने डेंटल कॉलेज को आदेश दिया है कि कॉलेज छात्रा के सभी मूल शैक्षणिक दस्तावेज और पूरा मूल शैक्षणिक रिकॉर्ड 24 अक्टूबर 2026 को सुबह 11 बजे तक छात्रा या उसके अधिकृत प्रतिनिधि को सौंपे।
कॉलेज अपने रिकॉर्ड के लिए दस्तावेजों की स्पष्ट छायाप्रतियां रख सकेगा।
राज्य प्रशासन सुनिश्चित करेगा पालना
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि राज्य सरकार के सक्षम अधिकारी आदेश की सख्ती से पालना सुनिश्चित करेंगे। जरूरत पड़ने पर श्रीगंगानगर के संबंधित उपखंड अधिकारी दस्तावेज वापस दिलाने में सहायता करेंगे।
छात्रा की सीट फिलहाल रिक्त मानी जाएगी
कॉलेज के रिकॉर्ड में आवंटित सीट के संबंध में छात्रा का नाम हटाकर सीट को रिक्त दर्शाया जाएगा।
यह व्यवस्था आगे के न्यायिक आदेशों और लागू काउंसलिंग नियमों के अधीन रहेगी।
आगे की काउंसलिंग में सीट पर विचार संभव
सक्षम काउंसलिंग अधिकारी आगामी काउंसलिंग चरणों में, यदि कोई हों, लागू नियमों के अनुसार इस सीट पर विचार कर सकेंगे।
2.75 लाख रुपये की फीस वापसी पर अभी फैसला बाकी
हाईकोर्ट ने छात्रा की ओर से जमा कराए गए 2 लाख 75 हजार रुपये की वापसी को लेकर अभी कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है।
हाईकोर्ट ने इस पुरे मामले मामले को खुला रखा हैं कि छात्रा को कितनी फीस वापस मिलनी चाहिए, कॉलेज कितनी राशि अपने पास रखने का अधिकारी है और प्रवेश वापस लेने के कारण छात्रा की कोई आर्थिक देनदारी बनती है या नहीं।
इन प्रश्नों पर संबंधित काउंसलिंग नियमों, फीस वापसी की नीति, प्रवेश की शर्तों और कॉलेज को सुनवाई का अवसर देने के बाद विचार किया जाएगा।
अदालत ने याचिका को विचारार्थ स्वीकार करते हुए मुख्य याचिका और अंतरिम राहत संबंधी प्रार्थना पत्र पर नोटिस जारी किए हैं। मामले की अगली सुनवाई 26 नवंबर 2026 को होगी।
