जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) से जुड़े अहम मामले में फैसला सुनाते हुए 6 साल की उम्र से नाबालिग से कथित यौन शोषण और ग्रूमिंग के मामले में आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया है।
जस्टिस अनिल कुमार उपमन ने पीड़िता की कम उम्र, उसके बयानों में लगाए गए आरोपों की गंभीरता और आरोपी द्वारा बचपन से कथित यौन शोषण किए जाने के पहलू को ध्यान में रखते हुए जमानत देने से इनकार किया।
आरोपी रिश्ते में पीड़िता का सगा बुआ का बेटा है और उसने संपत्ति विवाद के चलते उसे झूठा फंसाए जाने का दावा किया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध रिकॉर्ड और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी जमानत पाने का हकदार नहीं है। इसलिए जमानत याचिका खारिज कर दी गई
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत पर फैसला देते समय की गई टिप्पणियां केवल इसी याचिका के निपटारे के लिए हैं। इनका मुकदमे की सुनवाई या अंतिम फैसले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यानी कोर्ट ने आरोपी को दोषी घोषित नहीं किया है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता भानु कुमार बावटा और आशीष चौहान ने पैरवी की। वहीं, राज्य सरकार की ओर से पब्लिक प्रॉसिक्यूटर एनएस धाकर और परिवादी की ओर से अधिवक्ता वैभव शर्मा और विवेक शर्मा ने पक्ष रखा।
6 साल की उम्र से शोषण का आरोप, आरोपी है बुआ का बेटा
मामले के मुताबिक, पीड़िता ने आरोप लगाया कि जब वह महज 6 साल की थी, तभी से उसका कथित यौन शोषण किया जा रहा था। आरोपी उसका सगा बुआ का बेटा है, यानी परिवार का करीबी सदस्य।
पीड़िता का कहना है कथित शोषण बचपन से जारी रहा। मामले में आरोपी के खिलाफ थाने में FIR नंबर 101/2026 दर्ज की गई।
पुलिस ने जांच पूरी करने के बाद चार्जशीट दाखिल कर दी। इसके बाद आरोपी ने जमानत के लिए राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया।
पीड़िता की कम उम्र में होने और आरोपी के परिवार से जुड़े होने का पहलू इस मामले को संवेदनशील बनाता है। हालांकि, आरोपों की अंतिम सच्चाई का फैसला ट्रायल के दौरान पेश होने वाले साक्ष्यों के आधार पर होगा।
बच्ची को मानसिक रूप से प्रभावित करने का आरोप
इस मामले में ग्रूमिंग यानी बच्चे का भरोसा जीतकर उसे धीरे-धीरे मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रभावित करने वाला का पहलू भी अहम है। आरोपी पर आरोप है कि उसने बचपन से ही पीड़िता को मानसिक रूप से प्रभावित किया।
पीड़ित पक्ष की दलीलों के मुताबिक, आरोपी ने बच्ची के मन में अपने परिवार के प्रति नकारात्मक भावनाएं पैदा कीं और खुद को उसकी सबसे ज्यादा परवाह करने वाला व्यक्ति बताकर उसका भरोसा जीता। आरोप है कि इस तरह उसने बच्ची पर भावनात्मक प्रभाव बनाया।
पीड़ित के पक्ष का कहना है कि ऐसे कथित व्यवहार के कारण बच्ची के लिए अपने साथ हो रहे अनुचित व्यवहार को समझना और उसके बारे में खुलकर किसी को बताना मुश्किल हो सकता था।
पीड़ित के पक्ष ने कहा कि बच्चों के कथित यौन शोषण के मामलों में जांच के दौरान केवल शारीरिक घटनाओं ही नहीं, बल्कि बच्चे को मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रभावित किए जाने के आरोपों पर भी ध्यान देना अहम हो सकता है।
NGO प्रतिनिधियों से बातचीत में पीड़िता ने बताई आपबीती
पीड़ित पक्ष ने कहा है कि कम उम्र और पारिवारिक रिश्ते की संवेदनशीलता के चलते पीड़िता लंबे समय तक अपनी बात सामने नहीं रख सकी।
बाद में एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) के प्रतिनिधियों से बातचीत के दौरान उसने अपनी पीड़ा साझा की। इसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई और मामले की जांच शुरू हुई।
अभियोजन पक्ष ने हाईकोर्ट में दलील दी कि कथित यौन शोषण के कारण पीड़िता मानसिक परेशानी से गुजर रही है और डिप्रेशन का इलाज करा रही है।
यह अभियोजन पक्ष की ओर से रखी गई दलील थी। जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पीड़िता की उम्र, उसके बयानों और आरोपों की प्रकृति समेत गंभीरता पर विचार किया।
आरोपी पक्ष ने संपत्ति विवाद का दिया हवाला
आरोपी के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि आरोपी और पीड़िता का परिवार आपस में करीबी रिश्तेदार हैं और दोनों परिवारों के बीच संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा है।
आरोपी पक्ष का कहना था कि इसी विवाद के कारण दबाव बनाने के इरादे से एफआईआर दर्ज कराई गई। वकील ने आरोपों को गलत बताते हुए आरोपी को मामले में झूठा फंसाए जाने की बात कही।
FIR में देरी और मेडिकल सबूत नहीं होने की दलील
बचाव पक्ष ने कहा कि कथित घटना दिसंबर 2025 की बताई गई है, जबकि एफआईआर अप्रैल 2026 में दर्ज हुई। वकील के अनुसार, अभियोजन पक्ष ने एफआईआर दर्ज कराने में हुई देरी का संतोषजनक कारण नहीं बताया।
आरोपी की ओर से यह भी कहा गया कि आरोपों की पुष्टि के लिए रिकॉर्ड पर मेडिकल सबूत उपलब्ध नहीं हैं। उसके खिलाफ पहले कोई आपराधिक मामला भी नहीं है और जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट पेश की जा चुकी है।
बचाव पक्ष ने यह दलील भी दी कि मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में समय लग सकता है। ऐसे में आरोपी को आगे जेल में रखने का कोई उपयोगी उद्देश्य नहीं रह जाता।
हाईकोर्ट ने बचपन से यौन शोषण और ग्रूमिंग के आरोपों को माना गंभीर
जस्टिस अनिल कुमार उपमन ने जमानत याचिका पर फैसला देते समय पीड़िता की उम्र और आरोपी पर लगाए गए आरोपों की प्रकृति व गंभीरता को ध्यान में रखा।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में आरोपी पर बचपन से पीड़िता का यौन शोषण करने और मामले में ग्रूमिंग का पहलू होने का जिक्र किया।
इसके साथ ही, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 180 और 183 के तहत दर्ज पीड़िता के बयानों पर भी विचार किया। इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने के पक्ष में पर्याप्त आधार नहीं पाया।
हाईकोर्ट ने पीड़िता के बयानों को माना अहम
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद रिकॉर्ड पर उपलब्ध सबूतों पर गौर किया। आदेश में कहा गया कि BNSS की धारा 180 और 183 के तहत दर्ज बयानों में पीड़िता ने बयान देते हुए आरोपी के खिलाफ स्पष्ट आरोप लगाए हैं।
हाीकोर्ट ने इन बयानों के साथ पीड़िता की उम्र और आरोपों की गंभीरता को भी जमानत पर विचार के दौरान अहम माना।
‘पीड़िता की उम्र और आरोपों की गंभीरता के चलते जमानत नहीं’
जस्टिस अनिल कुमार उपमन ने मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद कहा कि आरोपी को जमानत देने का यह उपयुक्त मामला नहीं है।
हाईकोर्ट ने पीड़िता के बयानों, उसकी उम्र और आरोपी पर लगाए गए आरोपों की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए जमानत अर्जी खारिज कर दी।
बचाव पक्ष ने आरोपी को संपत्ति विवाद के चलते झूठा फंसाए जाने समेत कई दलीलें दी थीं, लेकिन कोर्ट ने मौजूद रिकॉर्ड के आधार पर उनकी इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया।
जमानत याचिका खारिज, ट्रायल पर नहीं पड़ेगा असर
राजस्थान हाईकोर्ट ने अभिजीत सोनी की जमानत याचिका खारिज कर दी। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत याचिका के निपटारे के लिए हैं और इनका मुकदमे की सुनवाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
इसका मतलब है कि जमानत खारिज होने से आरोपी दोषी साबित नहीं हो जाता। उसके खिलाफ लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं, इसका फैसला ट्रायल के दौरान पेश साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर किया जाएगा।
