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BREAKING: जज की कुर्सी के चारों ओर एक अदृश्य, लेकिन भारी जिम्मेदारी होती है : कहते हुए हाईकोर्ट ने कन्हैया लाल हत्याकांड के पांच आरोपियों की जमानत की खारिज

SEO Title Kanhaiya Lal Murder Case: Rajasthan High Court Rejects Bail of Five Accused, Cites UAPA Bar and Fast-Paced Trial

जमानत आदेश की शुरुआत गांधी और दिनकर की पंक्तियों से, हाईकोर्ट ने कहा-आतंकवाद कानून के राज की जगह भय का राज लाने की कोशिश, सिर्फ लंबे समय से जेल में होने से Article 21 के तहत जमानत का आधार नहीं, UAPA की धारा 43D(5) की पाबंदी लागू.

जयपुर। उदयपुर के बहुचर्चित कन्हैया लाल हत्याकांड से जुड़े मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने पांच आरोपियों को जमानत देने से इनकार कर दिया है।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने वसीम अली, मुस्लिम खान, मोहसिन खान, मोहम्मद मोहसिन और आसिफ हुसैन की ओर से दायर पांच अलग-अलग आपराधिक अपीलों को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा जमानत से इनकार करने के आदेशों को बरकरार रखा हैं।

इन अपीलों के माध्यम से आरोपियों ने NIA मामलों की विशेष अदालत, जयपुर द्वारा वर्ष 2024 में जमानत आवेदन खारिज किए जाने के आदेशों को चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि इस स्तर पर उपलब्ध अभियोजन सामग्री को देखते हुए UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत पर लगी वैधानिक पाबंदी लागू होती है।

साथ ही कोर्ट ने कहा कि मामले का ट्रायल सक्रिय रूप से और तेजी से आगे बढ़ रहा है, इसलिए केवल लंबे समय से जेल में रहने के आधार पर Article 21 के तहत जमानत देने का आधार नहीं बनता।

जज की कुर्सी के चारों ओर एक अदृश्य, लेकिन भारी जिम्मेदारी होती है

पांच आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज करने की शुरूआत राजस्थान हाईकोर्ट ने बेहद प्रभावशाली और गंभीर टिप्पणियों से की.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने अपने फैसले के प्रारंभिक हिस्से में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए आतंकवाद, भय और राज्य की सुरक्षा से जुड़े संवैधानिक प्रश्नों को रेखांकित किया।

गांधी की पंक्ति से फैसले की शुरूआत

खंडपीठ ने फैसले की शुरुआत महात्मा गांधी की इस पंक्ति से की—

“Terrorism and deception are weapons not of the strong, but of the weak.”
— Mahatma Gandhi

इसके बाद कोर्ट ने रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रसिद्ध पंक्तियों को लिखा —

“सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है,
बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो।”
— रामधारी सिंह ‘दिनकर’

इन पंक्तियों के साथ ही हाईकोर्ट ने अपने “Prefatory Remarks” में उस संवैधानिक जिम्मेदारी को रेखांकित किया, जो गंभीर आपराधिक और आतंकवाद से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने होती है।

खंडपीठ ने कहा कि न्यायाधीश की कुर्सी के चारों ओर एक अदृश्य लेकिन भारी जिम्मेदारी होती है-वह जिम्मेदारी देश के नागरिकों के उन अधिकारों की रक्षा करने की है, जिन्हें संविधान ने सुरक्षित किया है।

कोर्ट ने कहा कि जब भी कोई मामला अदालत के सामने आता है तो अदालत केवल अभियोजन एजेंसी और आरोपी के बीच विवाद का फैसला नहीं कर रही होती, बल्कि वह यह भी परख रही होती है कि देश की संवैधानिक व्यवस्था और गणराज्य की संस्थागत मजबूती कितनी दृढ़ है।

“जब अपराध का निशाना व्यक्ति नहीं, राष्ट्र की आत्मा हो तो जमानत का नजरिया बदल जाता है”

खंडपीठ ने अपने प्रारंभिक अवलोकन में कहा कि जमानत का सामान्य दृष्टिकोण उस समय पूरी तरह बदल जाता है, जब अपराध का लक्ष्य केवल किसी व्यक्ति विशेष को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा पर हमला करना हो।

कोर्ट ने आतंकवाद की प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आतंकवाद केवल किसी व्यक्ति के शारीरिक शरीर पर हमला नहीं है। अदालत के अनुसार, यह देश की मनोवैज्ञानिक संप्रभुता पर एक सुनियोजित और प्रदर्शनात्मक हमला है।

कोर्ट ने आगे कहा कि आतंकवाद का अंतिम उद्देश्य केवल अपराध करना नहीं होता, बल्कि शांति की हत्या करना होता है। इसका उद्देश्य “Rule of Law” यानी कानून के शासन की जगह “Rule of Fear” यानी भय के शासन को स्थापित करना होता है।

संविधान की प्रस्तावना और सामाजिक भाईचारे का भी जिक्र

खंडपीठ ने आगे संविधान की प्रस्तावना का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रस्तावना केवल किसी दस्तावेज के पन्नों पर लिखे शब्द नहीं हैं, बल्कि यह राष्ट्र की आत्मा की अमर प्रतिज्ञा हैं।

अदालत ने Justice, Liberty, Equality और Fraternity यानी न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को संविधान की मूल प्रतिबद्धताओं के रूप में रेखांकित किया। कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि आतंक को हथियार बनाने वाले लोग समाज के ताने-बाने को हिंसा के जरिए तोड़ते हैं, तो गणराज्य सामाजिक भाईचारे को किस प्रकार सुरक्षित रखेगा।

NIA Act और UAPA को लेकर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

खंडपीठ ने National Investigation Agency Act, 2008 और Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967 यानी UAPA के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कानूनों की प्रस्तावनाएं महज औपचारिक शुरुआत नहीं हैं।

कोर्ट के अनुसार, ये कानून राज्य की संप्रभुता, सुरक्षा और अखंडता को प्रभावित करने वाले अपराधों की जांच और अभियोजन के लिए बनाए गए विशेष कानूनी ढांचे को दर्शाते हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि NIA Act का उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी जांच एजेंसी का गठन करना है जो भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और अखंडता, राज्य की सुरक्षा तथा विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों को प्रभावित करने वाले अपराधों की जांच और अभियोजन कर सके।

“ये सामान्य आपराधिक कानून नहीं, बल्कि राज्य की सुरक्षा का कवच हैं”

फैसले में खंडपीठ ने कहा कि NIA Act और UAPA जैसे कानून सामान्य आपराधिक कानूनों की श्रेणी में नहीं आते। कोर्ट ने इन्हें राज्य की सुरक्षा का कवच बताया।

इसके साथ ही अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में न्यायालय के सामने आरोपी के अधिकारों और राज्य के अस्तित्व एवं सुरक्षा से जुड़े प्रश्नों के बीच बेहद सावधानी से संतुलन स्थापित करने की चुनौती होती है।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत को अपराध को केवल एक सामान्य अपराध के चश्मे से नहीं देखना है, बल्कि जहां मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े आरोपों के अंतर्गत आता है, वहां उसके व्यापक प्रभाव को भी कानूनी कसौटी पर परखना होगा।

गांधी और दिनकर की पंक्तियों से UAPA की कठोर जमानत व्यवस्था तक

हाईकोर्ट की यह शुरुआती टिप्पणी आगे चलकर उस कानूनी प्रश्न से जुड़ती है, जिस पर पांचों आरोपियों की जमानत याचिकाओं का फैसला निर्भर था—क्या UAPA की धारा 43D(5) के तहत उपलब्ध सामग्री को देखते हुए आरोपियों को जमानत दी जा सकती है?

खंडपीठ ने बाद में स्पष्ट किया कि UAPA की धारा 43D(5) के तहत यदि चार्जशीट और केस डायरी की सामग्री से यह मानने के उचित आधार मौजूद हों कि आरोपी के खिलाफ आरोप प्रथमदृष्टया सत्य हैं, तो जमानत देने पर वैधानिक रोक लागू होती है।

कन्हैया लाल की हत्या से शुरू हुआ था मामला

प्रदेश को झकझोर देने वाली घटना में 28 जून 2022 को उदयपुर में कन्हैया लाल की उनकी दुकान में दो हमलावरों ने धारदार हथियारों से हत्या कर दी थी। घटना के दौरान दुकान में मौजूद दो कर्मचारी भी गंभीर रूप से घायल हुए थे।

अभियोजन के अनुसार, हमलावरों ने हत्या की घटना को रिकॉर्ड किया और उसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिए.

NIA का आरोप है कि इस पूरी कार्रवाई का उद्देश्य भय और आतंक का माहौल पैदा करना तथा सांप्रदायिक वैमनस्य को बढ़ावा देना था।

29 जून 2022 को कन्हैया लाल के बेटे यश तेली की शिकायत पर उदयपुर के धानमंडी थाने में FIR दर्ज हुई।

इसके बाद गृह मंत्रालय के निर्देश पर NIA ने 29 जून 2022 को ही मामले को अपने हाथ में लेते हुए जांच शुरू की।

FIR में IPC की धारा 452, 302, 153A, 153B, 295A और 34 के साथ UAPA की धारा 16, 18 और 20 के आरोप शामिल थे।

NIA की चार्जशीट, 2024 में आरोप तय

NIA ने विस्तृत जांच के बाद चार्जशीट पेश की। ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ 12 जनवरी 2024 और 13 फरवरी 2024 को आरोप तय किए।

हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, मुख्य आरोपियों के रूप में चार्जशीट में मोहम्मद रियाज अत्तारी और मोहम्मद गौस का उल्लेख है, जिन पर कन्हैया लाल की दुकान के अंदर हत्या करने का आरोप है।

अभियोजन के अनुसार घटना को रिकॉर्ड कर वीडियो भी प्रसारित किया गया था।

आरोपियों की ओर से क्या कहा गया?

जमानत की मांग करते हुए आरोपियों की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने कई महत्वपूर्ण दलीलें रखीं।

घटनास्थल के आसपास मौजूदगी का ठोस सबूत नहीं

बचाव पक्ष ने कहा कि आरोपियों के 10 जून से 28 जून 2022 के बीच कन्हैया लाल की दुकान या उसके आसपास मौजूद होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। यह भी कहा गया कि आरोपियों को घटना से पहले दुकान के आसपास किसी ने नहीं देखा था।

व्हाट्सऐप संदेशों का भी हवाला

आरोपियों की ओर से यह दलील दी गई कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई संदेश, वॉइस नोट या व्हाट्सऐप बातचीत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि उन्होंने किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या सांप्रदायिक वैमनस्य पैदा करने वाला कोई संदेश भेजा हो।

सह-आरोपियों को मिली जमानत

बचाव पक्ष ने अदालत के सामने यह भी रखा कि कुछ सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। इसी आधार पर समानता के सिद्धांत का लाभ देते हुए वर्तमान आरोपियों को भी जमानत देने का आग्रह किया गया।

साढ़े चार साल से अधिक समय से जेल

आरोपियों की ओर से सबसे महत्वपूर्ण दलील लंबे कारावास की रही। बचाव पक्ष ने कहा कि आरोपी करीब साढ़े चार साल से अधिक समय से जेल में हैं, जबकि ट्रायल अभी पूरा नहीं हुआ है।

बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि अभियोजन ने शुरुआत में लगभग 180 गवाहों की सूची रखी थी और इस कारण ट्रायल पूरा होने में काफी समय लग सकता है।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट के K.A. Najeeb और Syed Iftikhar Andrabi के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि Article 21 के तहत शीघ्र सुनवाई का अधिकार लंबे समय तक जारी प्री-ट्रायल हिरासत के मामलों में महत्वपूर्ण हो जाता है।

डिस्क्लोजर स्टेटमेंट और CDR पर भी सवाल

बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि कुछ डिस्क्लोजर स्टेटमेंट अंग्रेजी भाषा में रिकॉर्ड किए गए, जबकि आरोपी उस भाषा को नहीं समझते। इसके अलावा आरोपियों के नाम मूल FIR में नहीं होने तथा उनके खिलाफ कथित तौर पर कॉल डिटेल रिकॉर्ड और अन्य परिस्थितिजन्य सामग्री के आधार पर मामला बनाए जाने की दलील दी गई।

आरोपियों की ओर से यह भी कहा गया कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक पूर्ववृत्त नहीं है और वे अपने-अपने परिवारों के मुख्य कमाने वाले सदस्य हैं।

NIA ने जमानत का किया जोरदार विरोध

दूसरी ओर, NIA की ओर से ASG राज ठाकरे के साथ विशेष लोक अभियोजक स्नेह दीप ख्यालिया और अन्य अधिवक्ताओं ने जमानत का कड़ा विरोध किया।

NIA ने अदालत से कहा कि मामला UAPA के तहत दर्ज है और इसकी जांच एक विशेष राष्ट्रीय एजेंसी ने की है। अभियोजन के अनुसार, सभी आरोपियों की कथित भूमिका अपराध की बड़ी साजिश में सक्रिय, महत्वपूर्ण और अभिन्न रही है।

NIA का दावा—साजिश पहले से रची गई थी

NIA ने अदालत को बताया कि रिकॉर्ड पर मौजूद गवाहों के बयान और जांच सामग्री एक गहरी और सुनियोजित आपराधिक साजिश की ओर संकेत करती है।

अभियोजन के मुताबिक, हत्या के बाद घटना का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित करना भी कथित साजिश का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य समाज में भय पैदा करना और सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाना था।

NIA ने सुप्रीम कोर्ट के NIA v. Zahoor Ahmad Shah Watali फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जमानत के चरण में अदालत को मिनी ट्रायल नहीं करना है और उपलब्ध अभियोजन सामग्री को उसके प्रथमदृष्टया स्वरूप में देखना है।

ट्रायल में देरी पर NIA का पलटवार

बचाव पक्ष द्वारा लंबे समय से जेल में रहने और ट्रायल में देरी की दलील पर NIA ने कहा कि ट्रायल रुका हुआ नहीं है।

NIA के अनुसार—

अभियोजन गवाहों की संख्या पहले लगभग 180 थी।

इसे घटाकर 89 गवाह किया जा चुका है।

लगभग 30 महत्वपूर्ण गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं।

ट्रायल दिन-प्रतिदिन के आधार पर तेजी से चल रहा है।

NIA ने यह भी अदालत के सामने कहा कि ट्रायल को तेजी से चलाने के लिए राज्य की ओर से किए गए अनुरोध का आरोपियों ने विरोध किया था। इस आधार पर अभियोजन ने देरी के लिए आरोपियों की भूमिका भी बताई।

हाईकोर्ट ने माना-ट्रायल तेजी से आगे बढ़ रहा है

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीले सुनने के बाद कहा कि इस मामले में Article 21 के तहत लंबे कारावास के आधार पर जमानत देने का सवाल ट्रायल की वर्तमान स्थिति के संदर्भ में देखा जाना होगा।

कोर्ट ने माना कि आरोपियों को करीब साढ़े चार वर्ष से अधिक समय से हिरासत में रखा गया है, लेकिन इस मामले में ट्रायल पूरी तरह रुका हुआ नहीं है। अभियोजन ने गवाहों की संख्या घटाई है और लगभग 30 महत्वपूर्ण गवाहों के बयान रिकॉर्ड हो चुके हैं।

इसलिए कोर्ट ने माना कि वर्तमान मामले के तथ्य उन मामलों से अलग हैं, जहां ट्रायल शुरू ही नहीं हुआ हो या सैकड़ों गवाहों की गवाही बाकी हो।

हाईकोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी-UAPA में जमानत का अलग मानदंड

खंडपीठ ने कहा कि UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत के लिए सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में अलग और कठोर व्यवस्था लागू होती है।

यदि केस डायरी या चार्जशीट देखने के बाद अदालत को यह विश्वास करने के उचित आधार मिलते हैं कि आरोपी के खिलाफ आरोप prima facie true हैं, तो जमानत नहीं दी जा सकती।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस स्तर पर अदालत को साक्ष्यों की विश्वसनीयता, स्वीकार्यता या अंतिम दोषसिद्धि की संभावना पर मिनी ट्रायल नहीं करना है।

“आरोपियों की भूमिका आरोपी-विशिष्ट तरीके से देखी जानी चाहिए”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि UAPA की धारा 43D(5) के तहत जांच सामूहिक या सामान्य आधार पर नहीं होनी चाहिए।

प्रत्येक आरोपी की भूमिका, उसके खिलाफ उपलब्ध सामग्री और कथित गैरकानूनी गतिविधि से उसके वास्तविक संबंध को अलग-अलग देखना जरूरी है।

हालांकि, इस मामले में अदालत ने चार्जशीट और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री देखने के बाद कहा कि पांचों आरोपियों के खिलाफ बड़ी आपराधिक साजिश में उनकी कथित भागीदारी प्रथमदृष्टया बनती है।

कोर्ट ने कहा-यह सामान्य अपराध नहीं, कथित आतंकी गतिविधि की गंभीरता अलग

फैसले में खंडपीठ ने मामले की प्रकृति पर विशेष टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन के अनुसार यह केवल किसी व्यक्ति की हत्या तक सीमित अपराध नहीं है, बल्कि हत्या के साथ घटना की रिकॉर्डिंग और उसका प्रसार कर भय तथा आतंक पैदा करने का आरोप भी जुड़ा है।

अदालत ने कहा कि ऐसी संगठित आपराधिक साजिश का समाज पर प्रभाव एक सामान्य व्यक्तिगत अपराध की तुलना में कहीं व्यापक हो सकता है।

Article 21 को भी नजरअंदाज नहीं किया

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के Article 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कोर्ट ने K.A. Najeeb और Syed Iftikhar Andrabi के सिद्धांतों पर भी विचार किया, जिनमें लंबे समय तक ट्रायल पूरा न होने की स्थिति में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक पहलू को महत्व दिया गया है।

लेकिन कोर्ट ने यह भी कहा कि Article 21 का इस्तेमाल UAPA की धारा 43D(5) की वैधानिक शर्त को स्वतः समाप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत को दोनों के बीच संतुलित और अनुशासित तरीके से कानून लागू करना होगा।

सह-आरोपियों की जमानत पर भी कोर्ट ने किया अंतर स्पष्ट

NIA ने वर्तमान आरोपियों को उन सह-आरोपियों से अलग बताया जिन्हें पहले जमानत मिली थी।

अभियोजन के अनुसार, वर्तमान पांच आरोपियों की कथित भूमिका अलग और चार्जशीट में विशिष्ट रूप से दर्ज है।

NIA ने यह भी बताया कि एक सह-आरोपी को नाबालिग होने के आधार पर जमानत मिली थी, इसलिए उस आधार पर वर्तमान आरोपियों को स्वतः समान लाभ नहीं दिया जा सकता।

हाईकोर्ट का निर्णायक निष्कर्ष

सभी दलीलों और रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद खंडपीठ ने कहा कि—

मामले की गंभीरता, आरोपियों को सौंपी गई विशिष्ट भूमिकाएं, कथित बड़ी आपराधिक साजिश और अपराध की प्रकृति को देखते हुए वर्तमान चरण में पांचों आरोपी जमानत के लाभ के हकदार नहीं हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल सक्रिय रूप से और तेजी से चल रहा है, इसलिए लंबे कारावास के आधार पर Article 21 की दलील इस मामले में जमानत देने के लिए पर्याप्त नहीं है।

इसके बाद हाईकोर्ट ने 9 अक्टूबर 2024 और 12 नवंबर 2024 को NIA विशेष अदालत द्वारा जमानत आवेदन खारिज किए जाने के आदेशों को बरकरार रखा और पांचों आपराधिक अपीलें खारिज कर दीं।

कोर्ट ने साफ किया-ट्रायल के अंतिम फैसले पर कोई टिप्पणी नहीं

हाईकोर्ट ने अपने आदेश के अंत में महत्वपूर्ण रूप से स्पष्ट किया कि जमानत अपीलों का फैसला करते समय की गई टिप्पणियां केवल जमानत के प्रश्न तक सीमित हैं।

इन टिप्पणियों को ट्रायल के दौरान मामले के अंतिम गुण-दोष पर अदालत की राय नहीं माना जाएगा और ट्रायल कोर्ट को मामले की सुनवाई हाईकोर्ट की इन टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना करनी होगी।

एनआईए की ओर से पैरवी

इन पाचों जमानत याचिकाओं में एनआईए की ओर से ​एएसजी राजा ठाकरे, स्पेशल पीपी स्नेहदीप ख्यालिया, रोहित खरे, सिद्धार्थ शर्मा और हिमांशु चौधरी ने पैरवी की.

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