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प्रोबेशन पीरियड में भी हो सकता है कर्मचारी का तबादला, कानून में रोक नहीं तो प्रशासन शर्त नहीं लगा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Rajasthan High Court Big Decision: Probationer Employees Can Be Transferred, No Arbitrary Restriction Allowed

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के ट्रांसफर को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल कर्मचारी के प्रोबेशन (परिवीक्षा) पर होने के आधार पर उसका तबादला रोका नहीं जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी कानून या सेवा नियम में प्रोबेशनर कर्मचारी के ट्रांसफर पर स्पष्ट रोक नहीं है, तो प्रशासन अपने आदेश के जरिए ऐसी शर्त नहीं लगा सकता, जो कानून के विपरीत हो।

जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा की खंडपीठ ने गोविंद की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि प्रोबेशन पर होना अपने आप में ट्रांसफर से सुरक्षा प्रदान नहीं करता।

जब तक संबंधित कानून या सेवा नियम स्थानांतरण पर स्पष्ट प्रतिबंध नहीं लगाते, केवल प्रशासनिक आदेश में शर्त जोड़कर किसी प्रोबेशनर कर्मचारी को स्थानांतरण के बाद रिलीव करने से नहीं रोका जा सकता।

दो साल के प्रोबेशन पर थे कनिष्ठ सहायक

याचिकाकर्ता गोविंद का चयन कनिष्ठ सहायक (Junior Assistant) के पद पर हुआ था और उन्हें दो वर्ष की परिवीक्षा अवधि के लिए जिला कलेक्टर कार्यालय, बालोतरा में नियुक्त किया गया था।

ड्यूटी के दौरान सक्षम प्राधिकारियों ने 10 जुलाई 2026 के आदेश से उनका ट्रांसफर उपखंड अधिकारी कार्यालय, शेरगढ़, जिला जोधपुर कर दिया।

हालांकि, ट्रांसफर आदेश जारी होने के बावजूद उन्हें वर्तमान पदस्थापन से कार्यमुक्त नहीं किया गया।

ट्रांसफर आदेश में लगाई गई थी शर्त

गोविंद को रिलीव नहीं करने के पीछे ट्रांसफर आदेश में दर्ज नोट नंबर-3 का हवाला दिया गया।

इस नोट के अनुसार, निलंबित अथवा प्रोबेशन अवधि में चल रहे कर्मचारी को ट्रांसफर के बाद नए पदस्थापन स्थल पर जॉइन करने के लिए कार्यमुक्त नहीं किया जाना था।

इस शर्त के कारण गोविंद शेरगढ़ में नई पोस्टिंग पर जॉइन नहीं कर सके और उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।

पहले एकलपीठ से मिली थी राहत नहीं

याचिकाकर्ता गोविंद की रिट याचिका को हाईकोर्ट की एकलपीठ ने 17 सितंबर 2026 को खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने इस आदेश को चुनौती देते हुए खंडपीठ के समक्ष विशेष अपील दायर की।

अपील में अधिवक्ता मनोज बोहरा ने तर्क दिया कि राजस्थान सेवा नियम, 1951 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो प्रोबेशन पर कार्यरत कर्मचारी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने से रोकता हो।

इसलिए ट्रांसफर के बावजूद कर्मचारी को रिलीव नहीं करना और इसके लिए अलग से शर्त लगाना मनमाना है।

‘मोनिका बनाम राजस्थान राज्य’ के फैसले का भी हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से Monika Vs. State of Rajasthan फैसले का हवाला दिया गया।

इस फैसले में भी हाईकोर्ट की खंडपीठ ने माना था कि प्रोबेशन अवधि के दौरान कर्मचारी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ट्रांसफर करने पर कोई रोक नहीं है।

राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता एस.एस. राठौड़ ने याचिकाकर्ता के तर्कों का विरोध किया, लेकिन अदालत के समक्ष रखी गई कानूनी स्थिति और विशेष रूप से Monika मामले में निर्धारित सिद्धांत को प्रभावी रूप से खारिज नहीं कर सके।

कानून में रोक नहीं तो प्रशासन शर्त नहीं लगा सकता

खंडपीठ ने कहा कि यह स्थापित कानूनी स्थिति है कि यदि किसी कानून में कर्मचारी को प्रोबेशन अवधि के दौरान एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने पर रोक नहीं है, तो प्रशासन कानून से परे जाकर ऐसी शर्त नहीं लगा सकता।

अदालत ने विशेष रूप से कहा कि राजस्थान सेवा नियम, 1951 में प्रोबेशनर कर्मचारी के ट्रांसफर पर ऐसी कोई रोक नहीं है।

इसलिए ट्रांसफर आदेश में यह शर्त जोड़ना कि प्रोबेशन पर रहने वाला कर्मचारी नई पोस्टिंग पर जॉइन करने के लिए रिलीव नहीं किया जाएगा, प्रथम दृष्टया मनमाना और अनुचित (arbitrary and unreasonable) है।

एकलपीठ का आदेश निरस्त, तत्काल रिलीव करने के आदेश

खंडपीठ ने माना कि एकलपीठ ने गोविंद की याचिका खारिज करने में त्रुटि की।

इसके बाद 17 सितंबर 2026 के एकलपीठ के आदेश को निरस्त और रद्द कर दिया गया तथा विशेष अपील स्वीकार कर ली गई।

हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को आदेश दिया कि 10 जुलाई 2026 के ट्रांसफर आदेश को लागू किया जाए और गोविंद को जिला कलेक्टर कार्यालय, बालोतरा से तत्काल कार्यमुक्त कर उपखंड अधिकारी कार्यालय, शेरगढ़, जिला जोधपुर में जॉइन करने दिया जाए।

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