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अभी नहीं होगा CEC ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सस्पेंड करने से किया इनकार; चुनाव आयोग से मांगा जवाब, एकतरफा फैसलों के आरोपों पर होगी सुनवाई

No Interim Suspension of CEC Gyanesh Kumar Yet, Supreme Court Seeks Replies from ECI and Centre

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देशभर में विरोध और इस्तीफे की मांग के बीच सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें तत्काल निलंबित करने से इनकार कर दिया है।

CEC ज्ञानेश कुमार को तुरंत सस्पेंड करने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया, लेकिन चुनाव आयोग, केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के कुछ अहम फैसले सभी सदस्यों की सहमति के बिना लिए गए। सुप्रीम कोर्ट अब इन आरोपों और फैसले लेने की प्रक्रिया को रिकॉर्ड के आधार पर देखेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि केवल मीडिया रिपोर्ट या लगाए गए आरोपों के आधार पर किसी संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ अंतरिम कार्रवाई नहीं की जा सकती।

यानी ज्ञानेश कुमार को फिलहाल पद से हटाने या उनके कामकाज पर रोक लगाने का कोई आदेश नहीं है, लेकिन मामला आगे चलेगा। अगर जवाब और रिकॉर्ड की जांच में किसी फैसले में तय कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन सामने आता है, तो सुप्रीम कोर्ट उस पर आगे कार्रवाई कर सकता है।

मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने की। याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट विकास सिंह और मेनका गुरुस्वामी ने पैरवी की।

बिना सहमति फैसलों के खिलाफ दायर हुई याचिका

मामला चुनाव आयोग के फैसले लेने के तरीके को लेकर है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि CEC ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में कुछ अहम फैसले बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए।

इनमें वोटर लिस्ट के Special Intensive Revision यानी SIR से जुड़े फैसले भी शामिल हैं। याचिका में दावा किया गया है कि दूसरे चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों पर आपत्ति जताई थी, इसके बावजूद उन्हें आगे बढ़ाया गया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि या अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी नहीं हुआ है।

SIR और Form 6 के फैसलों पर भी उठाए गए सवाल

याचिका में SIR के अलावा वोटर लिस्ट और Form 6 में किए गए बदलावों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। Form 6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट में जोड़ने के लिए किया जाता है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसे बदलाव और फैसले चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के तहत होने चाहिए थे। इसी आधार पर याचिका में संबंधित फैसलों की वैधता की जांच और उन्हें रद्द करने की मांग भी की गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पहले ECI और सरकार का जवाब आए

सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सस्पेंशन की मांग पर आदेश देने के बजाय पहले संबंधित पक्षों का पक्ष जानना जरूरी माना। कोर्ट ने चुनाव आयोग, केंद्र सरकार, CEC ज्ञानेश कुमार और दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है।

सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि सिर्फ किसी न्यूज रिपोर्ट या याचिका में लगाए गए आरोपों के आधार पर अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता। पहले यह देखा जाएगा कि संबंधित फैसले वास्तव में किस तरीके से लिए गए थे।

‘रिकॉर्ड से गलती मिली तो CEC पर हो सकती है कार्रवाई‘

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह संकेत भी दिया कि अगर रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि कोई फैसला तय कानूनी प्रक्रिया या जरूरी सहमति के बिना लिया गया था, तो उस पर आगे कार्रवाई की जा सकती है, यानी जरूरत पड़ने पर ऐसे फैसले को रद्द भी किया जा सकता है।

यानी सुप्रीम कोर्ट ने अभी किसी फैसले को गलत नहीं ठहराया है। लेकिन कोर्ट ने यह रास्ता खुला रखा है कि जवाब और रिकॉर्ड देखने के बाद अगर किसी फैसले में कानूनी खामी मिलती है, तो उसे वापस लिया या रद्द किया जा सकता है।

याचिका में 14 फैसलों पर आपत्ति का भी जिक्र

चुनाव आयोग के भीतर सामने आई आपत्तियों का भी इस विवाद में जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों ने SIR और उससे जुड़े फैसलों पर कई बार आपत्ति जताई थी। एक रिपोर्ट में अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच 14 मौकों पर आपत्तियों का जिक्र किया गया है।

हालांकि, चुनाव आयोग ने इन फैसलों और आपत्तियों को लेकर अपना अलग पक्ष रखा है। अब सुप्रीम कोर्ट के सामने आयोग का जवाब और संबंधित रिकॉर्ड आने के बाद ही साफ होगा कि ये फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए गए थे।

फिलहाल CEC ज्ञानेश कुमार को सस्पेंशन से राहत

सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश का सीधा मतलब यह है कि CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ तत्काल सस्पेंशन या कामकाज पर रोक नहीं लगी है। लेकिन याचिका खारिज भी नहीं हुई है।

अब चुनाव आयोग, केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों के जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट मामले की आगे सुनवाई करेगा। इसके बाद ही यह तय होगा कि जिन फैसलों को लेकर सवाल उठाए गए हैं, उनमें कानूनी और तय प्रक्रिया का पालन हुआ था या नहीं।

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