छह महीने, 258 मतदान केंद्र और लंबी मतगणना: तकनीक, पारदर्शिता और अधिवक्ताओं के प्रशिक्षण पर डॉ. सचिन आचार्य ने रखी अपनी बात
जयपुर। राजस्थान बार काउंसिल के 25 सदस्यों के चुनाव की प्रक्रिया करीब छह महीने तक चली। फरवरी 2026 में चुनावी प्रक्रिया शुरू हुई और अगस्त में मतगणना पूरी होने के साथ यह लंबी प्रक्रिया अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंची।
इन चुनावों के दौरान पूरे राजस्थान में 258 मतदान केंद्र बनाए गए और मतगणना की प्रक्रिया भी कई सप्ताह तक चली।
इतनी बड़ी और जटिल चुनावी प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा कराने की जिम्मेदारी वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सचिन आचार्य ने रिटर्निंग अधिकारी के रूप में निभाई।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित निगरानी व्यवस्था के तहत उन्हें राजस्थान के लिए यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
आगामी 10 अक्टूबर को इन चुनावों के आखरी पड़ाव के रूप में राजस्थान बार काउंसिल के चैयरमेन, वाईस चैयरमेन और को चैयरमेन के चुनाव होने जा रहे हैं.
Laws & Legals के विशेष कार्यक्रम “Law’s Life” में डॉ. सचिन आचार्य ने इस पूरे चुनाव, मतदान, पुनर्मतदान, मतगणना, तकनीक के इस्तेमाल, पारदर्शिता, अधिवक्ताओं के सहयोग और भविष्य के लिए अपनी तीन प्रमुख सीखों पर विस्तार से बातचीत की।
सवाल: छह महीने की इस चुनावी प्रक्रिया को आपने किस तरह देखा? क्या आपको शुरुआत में अंदाजा था कि यह चुनाव इतना लंबा चलेगा?
डॉ. सचिन आचार्य: मेरे लिए भी यह एक नया अनुभव था। चुनाव तो मैंने स्वयं लड़ा है, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन चुनाव करवाना कैसे है, इसकी पूरी प्रक्रिया मैंने अपने से वरिष्ठ लोगों को करते हुए देखी थी। उन्हीं के अनुभव के आधार पर मैंने कोशिश की कि राजस्थान बार काउंसिल का चुनाव सही तरीके से कराया जाए।
मुझे पता था कि यह बहुत बड़ा चुनाव है, लेकिन इतना बड़ा चुनाव है, इसका मुझे भी अंदाजा नहीं था।
सबसे अच्छी बात यह रही कि सभी लोगों का सहयोग मिला और हम इस पूरी प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा कर पाए।
सवाल: आप रिटर्निंग अधिकारी के रूप में इस चुनाव से कैसे जुड़े? पहली बार जिम्मेदारी मिलने पर आपकी क्या प्रतिक्रिया थी?
डॉ. सचिन आचार्य: जब माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय लिया कि देश की बार काउंसिलों के चुनाव सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित सुपरवाइजरी और मॉनिटरिंग कमेटी की निगरानी में करवाए जाएंगे, तब मेरे पास फोन आया।
मुझे बताया गया कि चुनाव के लिए एक ऑब्जर्वर और एक रिटर्निंग अधिकारी होंगे। इनमें से एक वरिष्ठ अधिवक्ता और दूसरा सेवानिवृत्त न्यायाधीश होगा।
मुझे सीधे कहा गया कि आपको रिटर्निंग अधिकारी की जिम्मेदारी निभानी है।
राजस्थान भौगोलिक रूप से देश का सबसे बड़ा राज्य है। इसलिए यहां चुनाव करवाना अपने आप में बड़ी चुनौती थी। देश के दूसरे कई राज्यों में रिटर्निंग अधिकारी की जिम्मेदारी सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने निभाई थी, लेकिन राजस्थान के लिए मुझे यह जिम्मेदारी दी गई।
सच कहूं तो मेरे मन में हिचकिचाहट थी। यह हिचकिचाहट जिम्मेदारी निभाने को लेकर नहीं थी, बल्कि यह सोचकर थी कि इसमें कितना समय लगेगा।
मुझे लगा था कि शायद दो-तीन या अधिकतम चार महीने लगेंगे। लेकिन बाद में यह प्रक्रिया करीब छह महीने तक चली।
जनवरी-फरवरी के आसपास प्रक्रिया शुरू हुई, फरवरी में अधिसूचना आई और 13-14 अगस्त 2026 को मतगणना पूरी होने के साथ यह पूरा काम समाप्त हुआ।
सवाल: आप स्वयं वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और आपकी अपनी प्रैक्टिस भी है। छह महीने तक इस जिम्मेदारी के साथ अपनी वकालत और परिवार को कैसे संभाला?
डॉ. सचिन आचार्य: काम वाकई आसान नहीं था।
वकालत में हमारे अपने कमिटमेंट होते हैं। अगर मैंने किसी मुकदमे में पेश होने का वादा किया है तो मुझे उसमें पेश होना ही है।
मैंने अपनी तरफ से कुछ समायोजन किए। उदाहरण के लिए, जोधपुर से बाहर की नई पेशियां मैंने काफी हद तक नहीं लीं।
एक वरिष्ठ अधिवक्ता के तौर पर मेरे पास यह विकल्प रहता है कि किसी खास दिन अगर मैं किसी मामले में पेश नहीं हो सकता तो कोई दूसरा वरिष्ठ अधिवक्ता मेरी जगह पेश हो सकता है।
मैंने उस विकल्प का इस्तेमाल किया।
सौभाग्य से सभी लोगों को पता था कि मैं इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी में व्यस्त हूं। इसलिए अधिवक्ताओं, सहकर्मियों और अदालतों ने भी मेरे साथ काफी सहयोग और समायोजन किया।
सवाल: आपको करीब पांच लाख रुपये की फीस ऑफर की गई थी, लेकिन आपने उसे वापस कर दिया। क्या यह आपके लिए एक बड़ा त्याग नहीं था?
डॉ. सचिन आचार्य: मैं इसे त्याग नहीं कहूंगा। मेरे लिए यह सेवा का अवसर था।
मैं पहले भी बार काउंसिल से जुड़ा रहा हूं। 2 अगस्त 2018 को मैं बार काउंसिल का सदस्य बना था। इसके बाद विभिन्न समितियों और अलग-अलग पदों पर भी जिम्मेदारी निभाने का अवसर मिला।
इसलिए जब संस्था ने मुझे यह जिम्मेदारी दी तो मैंने इसे सेवा का अवसर माना।
मुझे लगता है कि किसी संस्था के लिए किए गए काम को सिर्फ पैसे के नजरिए से देखना उचित नहीं है।
इससे पहले भी जब मैं सदस्य नहीं था, तब भी संस्था के लिए अपनी सेवाएं देता रहा हूं।
जहां संस्था ने कहा कि यह काम करना है, मैंने कर दिया।
काम था, कर दिया। बात खत्म।
सवाल: पूरे राजस्थान में 258 मतदान केंद्र थे। इतने बड़े स्तर पर मतदान करवाने की व्यवस्था कैसे की गई?
डॉ. सचिन आचार्य: सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि हम मानसिक रूप से पहले से तैयार थे कि हमें इस चुनाव में 100 प्रतिशत देना है।
99 प्रतिशत से काम नहीं चल सकता था।
पूरे राजस्थान में 258 मतदान केंद्र थे। राजस्थान भौगोलिक रूप से बहुत बड़ा राज्य है। रिटर्निंग अधिकारी के लिए व्यक्तिगत रूप से हर जगह जाना संभव नहीं था।
इसलिए हमने पूरे राजस्थान की एडवोकेट्स एसोसिएशनों से संपर्क किया।
हमने अध्यक्ष, सचिव और कार्यकारिणी से अनुरोध किया कि वे ऐसे लोगों के नाम भेजें जो निस्वार्थ भावना से संस्था के लिए काम कर सकें और जिन्हें अतिरिक्त मतदान अधिकारी के रूप में जिम्मेदारी दी जा सके।
सभी एसोसिएशनों ने अच्छे नाम भेजे।
इसके बाद हमने इन अधिकारियों को लगातार छह दिन तक ऑनलाइन प्रशिक्षण दिया। उन्हें विस्तार से समझाया कि मतदान किस तरह करवाना है और किन बातों का ध्यान रखना है।
लिखित दिशा-निर्देश भी तैयार किए गए और व्हाट्सऐप के जरिए सभी तक भेजे गए।
इसके बाद हमारी मतदान पार्टियों के साथ अनुभवी लोगों और बार काउंसिल के कर्मचारियों को भेजा गया, जो पहले से चुनावी प्रक्रिया में काम करते रहे हैं।
उन्होंने मतदान केंद्रों पर जाकर अधिकारियों और उनकी टीम को पूरी प्रक्रिया समझाई।
हमने कोशिश की कि सभी 258 मतदान केंद्रों तक चुनाव की प्रक्रिया और दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से पहुंचें।
सवाल: जयपुर के कुछ मतदान केंद्रों पर विवाद हुआ और पुनर्मतदान की स्थिति बनी। उस समय आपने डैमेज कंट्रोल कैसे किया?
डॉ. सचिन आचार्य: जब इस तरह के बड़े चुनाव होते हैं तो हम पहले से मानसिक रूप से तैयार थे कि कुछ परिस्थितियां सामने आ सकती हैं।
हमारा उद्देश्य था कि अगर कहीं कोई शिकायत या संशय आता है तो उसे दबाने के बजाय उसका समाधान किया जाए।
पुनर्मतदान की स्थिति में भी हमने यही किया। हमने अधिवक्ताओं और उम्मीदवारों से सहयोग मांगा और सभी ने सहयोग किया।
मुझे यह बताते हुए खुशी है कि जब मैंने वरिष्ठ अधिवक्ताओं और दूसरे साथियों को फोन करके कहा कि हमें आपकी सेवाओं की जरूरत है, तो किसी ने मना नहीं किया।
पूर्व और वर्तमान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल, वरिष्ठ अधिवक्ता और युवा अधिवक्ता—सभी इस प्रक्रिया में शामिल हुए।
सवाल: मतगणना के दौरान आपने पारदर्शिता पर विशेष जोर दिया। यूट्यूब पर मतगणना लाइव करने का विचार कैसे आया?
डॉ. सचिन आचार्य: जब इतनी बड़ी मतगणना होती है तो सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है कि लोगों का विश्वास बना रहे।
मॉनिटरिंग कमेटी, ऑब्जर्वर साहब और मैंने आपस में विचार किया कि हमें मतगणना को लाइव करना चाहिए।
इसलिए पूरी मतगणना यूट्यूब पर लाइव की गई।
इसका बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा।
लेकिन हमने केवल यूट्यूब लाइव तक खुद को सीमित नहीं रखा। पूरी प्रक्रिया को सीसीटीवी सर्विलांस में रखा गया।
जहां से एंट्री होती थी, मतगणना हॉल के बाहर की जगह और मतगणना हॉल के अंदर की गतिविधियों को निगरानी में रखा गया।
हम चाहते थे कि उम्मीदवार या मतदाता किसी के मन में कोई संशय न रहे।
सवाल: क्या उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को भी मतगणना देखने के लिए आमंत्रित किया गया था?
डॉ. सचिन आचार्य: हम चाहते थे कि सिर्फ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ही नहीं, बल्कि हर व्यक्ति आकर इस प्रक्रिया को देखे।
हम पूरी तरह खुले थे।
We were open, we were transparent.
हमारा मानना था कि इस openness और transparency से लोगों को रूबरू होना जरूरी है।
सिर्फ उम्मीदवार को नहीं, बल्कि जिस सामान्य अधिवक्ता ने अपना वोट दिया है, उसे भी यह महसूस होना चाहिए कि मेरा वोट इस तरह से गिना जा रहा है।
सवाल: आपने तकनीक का इस्तेमाल किया, लेकिन क्या सिर्फ तकनीक पर निर्भर रहना पर्याप्त था?
डॉ. सचिन आचार्य: नहीं। हमने तकनीक के साथ-साथ मानवीय निगरानी को भी महत्व दिया।
एक तरफ सीसीटीवी था और दूसरी तरफ यूट्यूब पर लाइव प्रसारण।
इसके अलावा हमने राजस्थान के बाहर से एक टीम बुलवाई, जो मतपत्रों की गणना में शामिल रही।
मतपत्र को तीन लोग देखते थे—एक मुख्य व्यक्ति और उसके दोनों तरफ दो अन्य लोग।
प्राथमिक गणना के बाद उम्मीदवारों के वोटों की एक तालिका तैयार होती थी। इसके बाद उन मतपत्रों का दोबारा भौतिक सत्यापन किया जाता था।
जिस उम्मीदवार को जितने मत मिले, उन मतपत्रों को दोबारा देखा जाता था और उनकी संख्या का मिलान किया जाता था।
इसे आप एक तरह का ऑडिट कह सकते हैं।
पहली टीम ने जो गणना की, दूसरी टीम उसका सत्यापन करती थी। इससे मानवीय भूल की संभावना को कम किया गया।
इसके बाद अंतिम तालिका तैयार की जाती थी और उसे वेबसाइट पर जारी किया जाता था।
सवाल: अगर किसी उम्मीदवार को किसी मत को लेकर संदेह होता था तो क्या वह दोबारा गणना की मांग कर सकता था?
डॉ. सचिन आचार्य: बिल्कुल। मैंने सभी उम्मीदवारों से कहा था कि अगर उन्हें जरा सा भी संशय है तो वे अपनी बात लिखकर दें।
मैंने उनसे कहा था—
“अगर आपको लगता है कि यहां शून्य लिखा है या आठ लिखा है, नौ लिखा है या आठ लिखा है, आपको जरा सा भी संशय है तो तुरंत मुझे लिखकर भेजिए।”
हमने इसके लिए ई-मेल की व्यवस्था भी की थी।
जब भी कोई ऐसी शिकायत आती थी, मैं स्वयं उसे देखता था।
जरूरत पड़ने पर हम वहीं रुकते थे और मतपत्र को दोबारा देखते थे।
हमें देरी मंजूर थी, लेकिन किसी के मन में संशय रह जाए, यह मंजूर नहीं था।
सवाल: क्या ऐसा कोई मामला आया जहां अंतिम समय में किसी उम्मीदवार ने किसी एक मत पर सवाल उठाया हो?
डॉ. सचिन आचार्य: हां। एक युवा उम्मीदवार ने अंतिम चरण में एक मत को लेकर संशय जताया।
पहले चरण की मतगणना लगभग पूरी हो चुकी थी। अंतिम तालिका तैयार हो रही थी और प्रिंटआउट आने वाला था।
उम्मीदवार ने कहा कि उन्हें लगता है कि ‘एक्सहॉस्ट’ हुए मतों में उनका एक मत हो सकता है।
मैंने उनसे कहा कि अपनी आपत्ति लिखित में दें।
जैसे ही लिखित शिकायत आई, हमने एक्सहॉस्ट हुए सभी मतपत्र वापस लिए और उनकी दोबारा गणना की।
मैंने सबके सामने आदेश दिया और काउंटिंग टीम को पुनर्गणना के निर्देश दिए।
दोबारा गणना में उनका संशय सही साबित नहीं हुआ, लेकिन हमारे लिए महत्वपूर्ण यह था कि उनका संशय दूर हो गया।
हमने सभी को यह संदेश दिया कि अगर दो घंटे अतिरिक्त लगते हैं तो लगने दीजिए, अगर दो दिन अतिरिक्त लगते हैं तो लगने दीजिए, लेकिन किसी के मन में संशय नहीं रहना चाहिए।
सवाल: आपने पहले चरण की मतगणना के बाद भी दोबारा सत्यापन कराया था?
डॉ. सचिन आचार्य: हां। जिला स्तर पर पहले चरण की गणना पूरी होने के बाद हमने उसका भौतिक सत्यापन कराया।
यह प्रक्रिया खुले तौर पर की गई और इसमें करीब चार दिन लगे।
हमारा उद्देश्य सिर्फ परिणाम घोषित करना नहीं था। हमारा उद्देश्य यह था कि परिणाम घोषित होने के बाद किसी के मन में यह सवाल न रहे कि प्रक्रिया में कहीं कोई कमी रह गई।
सवाल: छह महीने की पूरी यात्रा को पीछे मुड़कर देखते हैं तो इसे किस रूप में याद करना चाहेंगे?
डॉ. सचिन आचार्य: बहुत अच्छा अनुभव रहा।
जब मैंने 2018 में स्वयं चुनाव लड़ा था, तब मैंने कहा था कि यह मेरा पहला और आखिरी चुनाव है।
मुझे लगता है कि चुनाव करवाने के मामले में भी शायद यह मेरा पहला और आखिरी अनुभव रहेगा।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मुझे बहुत सारी नई चीजें सीखने और अपने अंदर कई नए कौशल विकसित करने का अवसर मिला।
मैं बहुत शुक्रगुजार हूं कि मॉनिटरिंग कमेटी के वरिष्ठ सदस्य मेरे साथ थे। ऑब्जर्वर भी वरिष्ठ सेवानिवृत्त न्यायाधीश रहे हैं और उन्होंने पूरी प्रक्रिया में सहयोग किया।
लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि हर अधिवक्ता मेरे साथ खड़ा था।
जब जयपुर या जोधपुर में पुनर्मतदान की स्थिति बनी और मैंने अधिवक्ताओं को फोन करके कहा कि हमें आपकी जरूरत है, तो लोगों ने तुरंत हां कहा।
सवाल: इस चुनाव में महिला अधिवक्ताओं की भागीदारी को आप किस तरह देखते हैं?
डॉ. सचिन आचार्य: इस बार महिला अधिवक्ताओं की भागीदारी बहुत अच्छी रही।
चाहे चुनाव में प्रत्याशी के रूप में उनकी भागीदारी हो या चुनावी टीम का हिस्सा बनने की बात हो, महिलाओं की अच्छी भागीदारी रही।
मैं चाहता हूं कि महिलाएं अधिक से अधिक इस पूरी प्रक्रिया में आएं।
चुनाव में आएं, संस्था की गतिविधियों में आएं और सबसे महत्वपूर्ण बात—वकालत के पेशे में अधिक से अधिक महिलाएं आएं।
महिलाएं सिर्फ इसलिए नहीं आएं कि वे महिला हैं। वे इसलिए आगे आएं क्योंकि वे अधिवक्ता हैं, सक्षम हैं और संस्था में योगदान देने की क्षमता रखती हैं।
सवाल: इस पूरी यात्रा की सबसे बड़ी सीख क्या रही?
डॉ. सचिन आचार्य: सबसे पहली बात यह है कि हमने कहीं न कहीं वह मानसिक बाधा दूर करने की कोशिश की, जो तकनीक को लेकर हमारे बीच बनी हुई है।
हमने इस चुनाव में तकनीक का इस्तेमाल किया और मुझे यह कहते हुए गर्व होता है कि राजस्थान बार काउंसिल ने अपनी प्रक्रियाओं को ऑनलाइन करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया है।
आज कोशिश यह है कि अधिवक्ता को छोटे-छोटे कामों के लिए बार काउंसिल के कार्यालय तक आने की जरूरत न पड़े।
अगर कोई अधिवक्ता 600 किलोमीटर दूर बैठा है तो वह वेबसाइट पर जाए, अपना काम करे और जरूरी जानकारी या सुविधा वहीं से प्राप्त कर सके।
मेरी पहली आशा और अनुरोध यही है कि भारत की दूसरी बार काउंसिल भी अपने अधिवक्ताओं के लिए तकनीक का अधिक से अधिक इस्तेमाल करें।
मेरी दूसरी सीख है—अधिवक्ताओं की सतत ट्रेनिंग।
माननीय सुप्रीम कोर्ट भी लगातार इस बात पर जोर दे रहा है।
वकालत में प्रशिक्षण की अपनी अलग व्यवस्था है। कई बार अधिवक्ता किसी बड़े कार्यालय से जुड़ते हैं और वहीं से व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं।
विश्वविद्यालयों में मूट कोर्ट आदि होते हैं, लेकिन वास्तविक व्यावहारिक प्रशिक्षण का बड़ा हिस्सा वरिष्ठ अधिवक्ताओं और उनके कार्यालयों के साथ काम करते हुए मिलता है।
इसलिए अधिवक्ताओं की सतत और व्यवस्थित ट्रेनिंग होनी चाहिए।
यह प्रशिक्षण राज्य स्तर पर हो, संभाग स्तर पर हो और जिला स्तर पर भी हो।
पिछले एक दशक में कानूनों में बहुत बड़े बदलाव आए हैं। नए कानून आए हैं और अधिवक्ताओं को इनके बारे में लगातार सीखना जरूरी है।
मेरी नए बार काउंसलर्स और सभी अधिवक्ताओं से अपील है कि वे मांग करें कि उन्हें लगातार और व्यावहारिक प्रशिक्षण मिले।
जितना हम सीखेंगे, उतना ही बेहतर तरीके से इस पेशे की चुनौतियों का सामना कर पाएंगे।
“जिम्मेदारी लीजिए, काम कीजिए और आगे बढ़ जाइए”
मेरी तीसरी बात बहुत सरल है।
जब आप किसी संस्था में आए हैं तो अपना काम कीजिए और आगे बढ़ जाइए।
जो दायित्व आपको दिया गया है, उसे स्वीकार कीजिए, पूरी ईमानदारी से निभाइए और फिर आगे बढ़ जाइए।
किसी तरह की उम्मीद मत रखिए। किसी तरह की आशा मत रखिए।
साहिर लुधियानवी साहब ने कहा है—
“कल और आएंगे नग़्मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले,
मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले।”
मेरा मानना है कि संस्था में नए लोग आते रहने चाहिए।
पुराने लोग अपना अनुभव देते रहें और नए लोग उस अनुभव को आगे लेकर जाएं।
शायद इसी वजह से मैंने 2018 में कहा था कि यह मेरा पहला और आखिरी चुनाव है।
मेरा मानना है कि नए लोगों को अवसर मिलना चाहिए।
पुराने लोग अपना अनुभव दें और संस्था का काम लगातार आगे बढ़ता रहे।
इसलिए मेरी तीसरी और सबसे बड़ी अपील यही है कि इस पेशे और अपनी संस्था में आइए, काम कीजिए, अपना दायित्व निभाइए और फिर अपने दूसरे कामों की ओर लौट जाइए।
चाहे वह समाज सेवा हो या आपका कोई दूसरा दायित्व—उसे भी साथ-साथ करते रहिए।