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किस पक्ष ने पहले हमला किया, इसका निर्धारण अपील में साक्ष्यों के विस्तृत परीक्षण के बाद : हाईकोर्ट ने 10 साल की सजा को अपील के पेडिंग रहने तक किया निलबिंत

Rajasthan High Court Suspends 20-Year Sentences of Two Convicts in Minor’s Sale and Marriage Case

हाईकोर्ट दोनों पक्षों के घायल होने और एक ही घटना में दो FIR दर्ज होने को माना अहम पहलू

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जमीन विवाद में हत्या के प्रयास सहित विभिन्न अपराधों में सजा पाए तीन आरोपियों को बड़ी राहत दी है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 साल जेल की सजा के खिलाफ अपील लंबित रहने तक सजा निलंबित करते हुए तीनों को शर्तों के साथ जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने अपने फैसले में मामले के कानूनी बिंदुओं पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि मामले में दोनों पक्षों के बीच जमीन विवाद, घटना में दोनों पक्षों के घायल होने और एक ही घटना को लेकर अलग-अलग जानकारी वाली दो FIR दर्ज होना शामिल है।

हाईकोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों में वास्तविक हमलावर कौन था, यह तय करने के लिए पूरे साक्ष्य का विस्तृत पुनर्मूल्यांकन आवश्यक होगा।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब अपील में गंभीर और विचारणीय आधार मौजूद हों तथा उसके शीघ्र निस्तारण की संभावना स्पष्ट न हो, तो अपील लंबित रहने के दौरान दोषसिद्ध व्यक्ति को लगातार जेल में रखना उचित नहीं हो सकता।

10 साल की सजा के खिलाफ अपील, हाईकोर्ट ने निलंबित किया कारावास

याचिकाकर्ता सुखदेव सिंह, कुलदीप सिंह और बुट्टा सिंह को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संख्या-1, अनूपगढ़, जिला श्रीगंगानगर ने 27 जनवरी 2026 को दोषी ठहराया था।

ट्रायल कोर्ट ने तीनों को आईपीसी की धारा 307 के तहत अधिकतम 10 वर्ष के कारावास और 20,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

इसके अतिरिक्त, तीनों को आईपीसी की धाराओं 323/34, 324/34, 325/34 और 326/34 के तहत भी दंडित किया था।

इस फैसले को चुनौती देते हुए तीनों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की और अपील के अंतिम निर्णय तक सजा निलंबित करने की मांग की।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अब इन तीनों की अपील मंजूर करते हुए सजा को निलंबित कर दिया है।

दो FIR, दोनों पक्षों को चोटें-अदालत ने इन तथ्यों को माना महत्वपूर्ण

मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि घटना को लेकर दो अलग-अलग FIR दर्ज हुई थीं और दोनों में घटना के अलग-अलग विवरण दिए गए थे।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि घटना की पृष्ठभूमि में पड़ोसी पक्षों के बीच जमीन को लेकर विवाद था।

घटना में दोनों पक्षों को चोटें आई थीं। इसके अलावा, दूसरे पक्ष के सदस्यों के खिलाफ भी आरोपपत्र दाखिल किया गया था और उन्हें अंततः आईपीसी की धारा 325 के तहत दोषी ठहराया गया था।

अदालत ने इन तथ्यों को प्रथम दृष्टया इस दलील के समर्थन में महत्वपूर्ण माना कि घटना एकतरफा हमला नहीं भी हो सकती है और दोनों पक्षों के बीच मारपीट हुई हो सकती है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन परिस्थितियों से अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा रहा है। यह तय करने के लिए कि घटना की शुरुआत किसने की और वास्तविक हमलावर कौन था, अपील की अंतिम सुनवाई में साक्ष्यों का विस्तार से परीक्षण करना होगा।

‘दूसरे पक्ष के हमले का विरोध करने या आत्मरक्षा की दलील पूरी तरह निराधार नहीं’

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता दुर्गेश खत्री ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने मामले के तथ्यों और साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया।

अधिवक्ता ने कहा कि यह भी संभव है कि दूसरे पक्ष ने पहले हमला किया हो और याचिकाकर्ताओं ने हमले का विरोध करने अथवा अपनी रक्षा करने के प्रयास में कथित कृत्य किए हों।

जस्टिस फरजंद अली ने आदेश में कहा कि मौजूदा चरण पर इस दलील को पूरी तरह निराधार नहीं कहा जा सकता।

हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि दोनों पक्षों के बयान, चोटों की प्रकृति, घटना का स्थान और वास्तविक हमलावर की पहचान जैसे सवालों पर अंतिम निर्णय अपील की सुनवाई के दौरान ही किया जाएगा।

आपराधिक अपीलों में देरी भी सजा निलंबन पर विचार का आधार

हाईकोर्ट ने सजा निलंबन के कानूनी सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए दोषसिद्धि से पहले मिलने वाली जमानत और दोषसिद्धि के बाद सजा निलंबन के बीच अंतर स्पष्ट किया।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Muna Bisoi v. State of Odisha (16 फरवरी 2026) और Kashmira Singh v. State of Punjab, (1977) 4 SCC 291, के फैसलों का हवाला दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आपराधिक अपील के निस्तारण में लंबा समय लग रहा है और देरी दोषसिद्ध व्यक्ति के कारण नहीं है, तो यह सजा निलंबित करने के पक्ष में एक महत्वपूर्ण आधार हो सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक अपीलों का लंबित रहना और उनके शीघ्र निस्तारण की अनिश्चितता भी मामले की परिस्थितियों के साथ विचारणीय है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सजा निलंबन के स्तर पर अपील के गुण-दोष पर अंतिम निष्कर्ष देना आवश्यक नहीं है। इस चरण पर यह देखना पर्याप्त है कि अपील में उठाए गए आधार प्रथम दृष्टया गंभीर और विचारणीय हैं या नहीं।

50 हजार का व्यक्तिगत मुचलका, दो जमानतदारों की शर्त

हाईकोर्ट ने तीनों की सजा अपील के अंतिम निस्तारण तक निलंबित करते हुए प्रत्येक को 50,000 रुपये का व्यक्तिगत मुचलका और 25,000 रुपये की राशि के दो जमानतदार पेश करने का आदेश दिया।

राहत मिली, लेकिन दोषसिद्धि पर अंतिम फैसला बाकी

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपील में उठाए गए मुद्दे गंभीर हैं और साक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन के बाद दोषसिद्धि या सजा में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

इसी आधार पर सजा निलंबित करने का आदेश दिया गया। हाईकोर्ट ने तीनों को बरी नहीं किया है और न ही निचली अदालत की दोषसिद्धि को रद्द किया है।

आदेश केवल अपील लंबित रहने के दौरान सजा निलंबित करने और निर्धारित शर्तों पर जमानत देने से संबंधित है।

दोषसिद्धि की वैधता और घटना के वास्तविक तथ्यों पर अंतिम निर्णय आपराधिक अपील के निस्तारण के समय होगा।

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