जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव में सरपंच और वार्डों के आरक्षण को चुनौती देने वाली 5 याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार करते हुए उन्हें खारिज कर दिया है।
जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी ने कहा कि जब चुनाव का कार्यक्रम घोषित हो चुका है और चुनाव प्रक्रिया शुरू हो गई है, तब आरक्षण आवंटन में बदलाव की मांग को लेकर कोर्ट इस स्तर पर हस्तक्षेप नहीं कर सकता। ऐसे विवादों के लिए चुनाव कानून में तय प्रक्रिया अपनानी होगी।
इन याचिकाओं में अलग-अलग ग्राम पंचायतों में आरक्षण तय करने के तरीके, जनसंख्या अनुपात और लॉटरी प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे।
हालांकि, हाईकोर्ट ने आरक्षण आवंटन की वैधता पर कोई फैसला नहीं दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाएं चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद इस स्तर पर सुनवाई योग्य नहीं होने के आधार पर खारिज की गई हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट मोती सिंह, आर.एस. चौधरी, जे.एस. भलेरिया, ऋषभ टायल और मनीष पटेल पेश हुए। वहीं, राज्य सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट एवं एडिशनल एडवोकेट जनरल राजेश पंवार, मोनल चुग और शैलेन्द्र ग्वाला ने पक्ष रखा।
अनुच्छेद 243-O के तहत चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप पर रोक’
जस्टिस नूपुर भाटी ने अपने आदेश में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243-O के तहत पंचायत चुनावों में कोर्ट के हस्तक्षेप पर रोक लगाई गई है। इसके तहत किसी पंचायत के चुनाव को चुनौती देने के लिए चुनाव याचिका का रास्ता अपनाना होगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि आरक्षण तय करने में जनसंख्या अनुपात गलत होने का आरोप लगाने भर से याचिकाकर्ताओं को चुनाव कार्यक्रम जारी होने के बाद भी कोर्ट में चुनौती देने का अधिकार नहीं मिल जाता।
इसकी वजह यह है कि पंचायत चुनाव का कार्यक्रम जारी होने के बाद चुनाव प्रक्रिया में कोर्ट के हस्तक्षेप पर संवैधानिक रोक लागू होती है। इसलिए कोर्ट के सामने सवाल यह नहीं था कि आरक्षण सही तय हुआ या गलत, बल्कि यह था कि चुनाव कार्यक्रम जारी होने के बाद इस चुनौती पर सुनवाई की जा सकती है या नहीं।
आरक्षण आवंटन और लॉटरी प्रक्रिया पर उठाए गए सवाल
राजस्थान में पंचायत चुनाव के लिए 24 सितंबर 2026 को सरपंच और वार्ड सदस्यों के पदों का आरक्षण तय किया गया था। इसके बाद जोधपुर, चूरू और बालोतरा की अलग-अलग ग्राम पंचायतों से जुड़े लोगों ने हाईकोर्ट में 5 याचिकाएं दाखिल कीं।
याचिकाकर्ताओं ने आरक्षण सूची, आदेश और लॉटरी प्रक्रिया को चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि आरक्षण तय करने में नियमों और जनसंख्या के आंकड़ों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया।
‘जिस पंचायत में OBC वोटर तक नहीं, वहां OBC सरपंच का पद आरक्षित’
जोधपुर जिले की ग्राम पंचायत मंगल नगर, पंचायत समिति सेखाला के मामले में याचिकाकर्ताओं ने आरक्षण प्रक्रिया पर आपत्ति जताई थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था ग्राम पंचायत के 7 वार्डों में कुल आबादी करीब 1,625 है और मतदाता सूची में 1,052 मतदाता दर्ज हैं। बूथ लेवल ऑफिसर के प्रमाण-पत्र के मुताबिक, पूरी ग्राम पंचायत में OBC वर्ग का कोई पंजीकृत मतदाता नहीं था।
यानी पूरी ग्राम पंचायत में OBC वर्ग का एक भी रजिस्टर्ड वोटर नहीं है, फिर भी सरपंच का पद OBC और वार्ड नंबर 1 को OBC महिला के लिए आरक्षित कर दिया गया। उनका तर्क था कि ऐसी स्थिति में इन सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए पात्र उम्मीदवार ही उपलब्ध नहीं होगा।
याचिकाकर्ताओं ने अधिकारियों से दोबारा लॉटरी कराने की मांग की थी। इसके लिए 25 सितंबर को अभ्यावेदन भी दिए गए, लेकिन उनकी मांग स्वीकार नहीं की गई। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
दूसरी पंचायतों में भी आरक्षण और जनसंख्या अनुपात पर आपत्ति
हाईकोर्ट के सामने केवल मंगल नगर का मामला नहीं था। कुल 5 याचिकाओं में अलग-अलग पंचायतों के आरक्षण आवंटन को चुनौती दी गई थी।
इनमें जोधपुर जिले की ग्राम पंचायत गडेरी, चूरू जिले की ग्राम पंचायत लूड़ी झाबर, पंचायत समिति सालवा खुर्द और बालोतरा जिले की ग्राम पंचायत माजीवाला से जुड़े विवाद भी शामिल थे।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि आरक्षण तय करते समय जनसंख्या के अनुपात और निर्धारित प्रक्रिया का सही तरीके से पालन नहीं किया गया।
कुछ मामलों में आरक्षण सूची और लॉटरी के नतीजों पर आपत्ति जताई गई, जबकि कुछ में सीटों का आरक्षण दोबारा तय करने की मांग की गई।
याचिकाकर्ताओं ने संबंधित आदेशों और आरक्षण सूची में बदलाव करने के साथ नए सिरे से लॉटरी कराने के निर्देश देने की मांग की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने चुनाव कार्यक्रम जारी होने के बाद इस स्तर पर आरक्षण आवंटन में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
‘चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता’
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दलील दी कि पंचायत चुनाव का कार्यक्रम जारी हो चुका है। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 243-O के तहत कोर्ट चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
उन्होंने कहा कि जब चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी हो, तब आरक्षण आवंटन बदलने की मांग को लेकर सुनवाई करने से चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले एन.पी. पोनुस्वामी बनाम रिटर्निंग ऑफिसर का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद उसे बीच में रोकने या बदलने से बचना चाहिए। चुनाव से जुड़े विवादों के लिए कानून में तय अलग प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जा सकता है।
3 अक्टूबर को जारी हो चुका था चुनाव कार्यक्रम
हाईकोर्ट ने आदेश देते हुए माना कि 3 अक्टूबर 2026 को चुनाव कार्यक्रम जारी हो चुका था। ऐसे में आरक्षण व्यवस्था में बदलाव का आदेश देने से घोषित चुनाव प्रक्रिया प्रभावित होती।
हाईकोर्ट ने आरक्षण आवंटन की वैधता पर नहीं दिया फैसला
हाईकोर्ट ने साफ किया कि 5 याचिकाएं खारिज करने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित पंचायतों में आरक्षण आवंटन सही था। कोर्ट ने न तो जनसंख्या के आंकड़ों को सही या गलत बताया और न ही आरक्षण रोस्टर की वैधता पर कोई फैसला दिया।
हाईकोर्ट ने केवल यह तय किया कि चुनाव कार्यक्रम जारी होने के बाद इन याचिकाओं पर सुनवाई की जा सकती है या नहीं। इसी आधार पर कोर्ट ने पांचों याचिकाएं सुनवाई योग्य नहीं मानते हुए खारिज कर दीं।