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मौखिक संपत्ति सौदे का मुकदमा खारिज करने से राजस्थान हाईकोर्ट का इनकार, कहा- सिर्फ विक्रेता की दलील पर शुरुआत में नहीं होगा खारिज, समझौते की वैधता ट्रायल में होगी तय

LIC Cannot Deny Insurance Claim Over Name Mismatch, Rajasthan High Court Rules

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने उदयपुर में जमीन की बिक्री के मौखिक समझौते से जुड़े विवाद में विक्रेता की सिविल रिवीजन याचिका खारिज कर दी है।

विक्रेता ने खरीदार का मुकदमा शुरुआत में ही खारिज करने की मांग की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें खरीदार का मुकदमा खारिज करने की अर्जी नामंजूर की गई थी।

जस्टिस मनीष शर्मा ने कहा कि समझौता रद्द करने का नोटिस कानूनी रूप से सही था या नहीं और खरीदार को समझौता रद्द करने के खिलाफ अलग से राहत मांगनी चाहिए थी या नहीं, इन सवालों का फैसला दोनों पक्षों की दलीलें और सबूत देखने के बाद ही किया जा सकता है।

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट हर्ष मेहता ने अधिवक्ता संजय नाहर और मुकेश माहेश्वरी के साथ पैरवी की। वहीं, प्रतिवादी की ओर से सीनियर एडवोकेट राजेश जोशी ने अधिवक्ता जयदीप सिंह सलूजा के साथ पक्ष रखा।

जमीन बेचने के लिए हुआ था मौखिक समझौता

मामला उदयपुर के अंबेरी गांव में भूखंडों की बिक्री से जुड़ा है। महेश चंद्र शर्मा जमीन के विक्रेता हैं, जबकि राजकुमार पामेचा खरीदार हैं। राजकुमार ने कोर्ट में मुकदमा दायर कर कहा कि दोनों के बीच 3 अक्टूबर 2025 को जमीन बेचने का मौखिक समझौता हुआ था।

समझौते के मुताबिक, एक साल के भीतर जमीन की रजिस्ट्री कराई जानी थी, यानी इसके लिए 3 अक्टूबर 2026 तक का समय तय था।

राजकुमार पामेचा ने कोर्ट से मांग की कि महेश चंद्र शर्मा मौखिक समझौते के मुताबिक जमीन की रजिस्ट्री उनके नाम कराएं।

साथ ही, उन्होंने कोर्ट से ऐसा आदेश देने की मांग की, जिससे मुकदमे का फैसला होने तक जमीन पर उनके दावे को सुरक्षित रखा जा सके और महेश चंद्र शर्मा ऐसा कोई कदम न उठाएं, जिससे उनके अधिकार प्रभावित हों।

नोटिस भेजकर विक्रेता ने समझौता रद्द करने की बात कही

दरअसल विवाद तब शुरू हुआ, जब विक्रेता महेश चंद्र शर्मा ने 7 मई 2026 को कानूनी नोटिस भेजकर मौखिक समझौता एकतरफा रद्द करने की बात कही।

इसके जवाब में खरीदार राजकुमार पामेचा ने 14 मई 2026 को कहा कि समझौते के मुताबिक, जमीन की रजिस्ट्री के लिए 3 अक्टूबर 2026 तक का समय तय था।

ऐसे में उनका कहना था कि तय अवधि पूरी होने से पहले समझौता रद्द नहीं किया जा सकता। इसके बाद उन्होंने कोर्ट में समझौते के मुताबिक जमीन की बिक्री पूरी कराने के लिए मुकदमा दायर किया।

विक्रेता ने क्यों मांगा मुकदमा खारिज करने का आदेश?

खरीदार राजकुमार पामेचा ने जमीन के मौखिक समझौते के मुताबिक रजिस्ट्री कराने की मांग करते हुए ट्रायल कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। इसका नोटिस मिलने के बाद विक्रेता महेश चंद्र शर्मा ने मुकदमे को शुरुआत में ही खारिज करने के लिए अर्जी लगाई।

उन्होंने सिविल प्रोसीजर कोड (CPC) के Order VII Rule 11 के तहत दलील दी कि खरीदार का मुकदमा कानून के हिसाब से आगे नहीं चल सकता।

महेश चंद्र शर्मा का कहना था कि उन्होंने 7 मई 2026 को कानूनी नोटिस भेजकर मौखिक समझौता रद्द कर दिया था। ऐसे में खरीदार केवल जमीन की रजिस्ट्री कराने की मांग नहीं कर सकता था।

उसे समझौता रद्द करने के फैसले को भी कोर्ट में चुनौती देनी चाहिए थी। विक्रेता का तर्क था कि जब खरीदार ने समझौता रद्द करने के फैसले को गलत और अमान्य घोषित करने की मांग नहीं की, तो उसका मुकदमा खारिज किया जाना चाहिए।

हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने 14 जुलाई 2026 को उनकी इस दलील को स्वीकार नहीं किया और मुकदमा शुरुआत में ही खारिज करने की अर्जी नामंजूर कर दी। साथ ही, महेश चंद्र शर्मा पर ₹1,000 का खर्च लगाने का आदेश दिया।

इस फैसले से असहमत होकर उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।

विक्रेता ने हाईकोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

राजस्थान हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान विक्रेता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों का हवाला दिया गया। इनमें I.S. Sikandar (Dead) by LRs vs. K. Subramani & Ors. और R. Kandasamy (Since Dead) & Ors. vs. T.R.K. Sarawathy & Anr. शामिल हैं।

विक्रेता के पक्ष ने इन फैसलों के आधार पर दलील दी कि समझौता रद्द किए जाने के बाद खरीदार को केवल रजिस्ट्री कराने की मांग करने के बजाय, समझौता रद्द करने के फैसले को भी चुनौती देनी चाहिए थी।

हालांकि, हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों को मौजूदा मामले के तथ्यों से अलग माना। कोर्ट के अनुसार, यहां समझौते के तहत रजिस्ट्री कराने के लिए 3 अक्टूबर 2026 तक का समय था, जबकि विक्रेता ने 7 मई 2026 को ही समझौता रद्द करने का नोटिस भेज दिया था।

ऐसे में समझौता रद्द करना कानूनी रूप से सही था या नहीं और खरीदार के लिए अलग से घोषणा की मांग करना जरूरी था या नहीं-इन सवालों का फैसला दोनों पक्षों की दलीलें और सबूत देखने के बाद ही किया जा सकता है।

खरीदार ने कहा- दोनों पक्षों के सबूत देखने जरूरी

हाईकोर्ट में खरीदार राजकुमार पामेचा की ओर से कहा गया कि समझौता रद्द करने का फैसला सही था या नहीं, यह जांचना जरूरी है।

साथ ही, क्या समझौते में तय समय को जरूरी शर्त माना गया था और क्या समझौता रद्द करने के नोटिस को अलग से चुनौती देना जरूरी था, इन बातों पर भी सुनवाई के दौरान विचार होना चाहिए।

खरीदार की ओर से दलील दी गई कि केवल विक्रेता के इस दावे के आधार पर मुकदमा शुरुआत में ही खारिज नहीं किया जा सकता कि समझौता रद्द हो चुका है। पहले दोनों पक्षों को अपनी बात रखने और सबूत पेश करने का मौका मिलना चाहिए।

‘सिर्फ शिकायत के आधार पर शुरुआत में ही मुकदमा खारिज नहीं कर सकते‘

जस्टिस मनीष शर्मा ने कहा कि मुकदमे की शुरुआत में ही उसे खारिज करने की मांग पर विचार करते समय कोर्ट को सबसे पहले खरीदार की ओर से मुकदमे में बताई गई बातों को देखना होता है।

केवल विक्रेता की दलीलों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि खरीदार का मुकदमा आगे नहीं चलना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में यह तय करना जरूरी है कि विक्रेता ने समझौता रद्द करने के लिए जो नोटिस भेजा था, वह कानूनी रूप से सही था या नहीं।

साथ ही, यह भी देखना होगा कि क्या विक्रेता तय एक साल की अवधि पूरी होने से पहले समझौता रद्द कर सकता था।

एक और सवाल यह है कि क्या खरीदार के लिए समझौता रद्द करने के फैसले को गलत घोषित कराने के लिए कोर्ट से अलग से राहत मांगना जरूरी था।

हाईकोर्ट ने कहा कि इन सभी सवालों का फैसला दोनों पक्षों की दलीलें और सबूत देखने के बाद ही हो सकता है। इसलिए खरीदार का मुकदमा शुरुआत में ही खारिज करना सही नहीं होगा।

समझौते की अवधि और रद्द करने के नोटिस पर भी होगा विचार

हाईकोर्ट ने समझौते में तय समय और उसे रद्द करने के नोटिस के बीच के अंतर पर भी गौर किया। समझौते के मुताबिक, जमीन की रजिस्ट्री के लिए 3 अक्टूबर 2026 तक का समय तय था, जबकि विक्रेता ने 7 मई 2026 को ही नोटिस भेजकर समझौता रद्द करने की बात कही थी।

इसके जवाब में खरीदार ने 14 मई 2026 को आपत्ति जताई थी और कहा था कि तय अवधि पूरी होने से पहले समझौता रद्द नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने माना कि ऐसे में यह जांचना जरूरी है कि विक्रेता का फैसला कानून के मुताबिक सही था या नहीं और समझौते की शर्तों का क्या मतलब था। इन बातों को समझने के लिए दोनों पक्षों के दस्तावेज और सबूत देखने होंगे।

विक्रेता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी हवाला दिया गया था, लेकिन हाईकोर्ट ने माना कि मौजूदा मामले में विवादित तथ्यों की जांच जरूरी है। इसलिए इन सवालों पर सुनवाई किए बिना खरीदार का मुकदमा शुरुआत में ही खारिज नहीं किया जा सकता।

ऐसे में यह तय करने के लिए कि समझौता रद्द करना कानूनी रूप से सही था या नहीं और क्या खरीदार को अलग से घोषणा की मांग करनी जरूरी थी, दोनों पक्षों की दलीलें और सबूत देखना जरूरी होगा। इन सवालों का फैसला मुकदमे की शुरुआती सुनवाई में नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की, अब ट्रायल में होगा फैसला

हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने खरीदार का मुकदमा खारिज करने की मांग नामंजूर करते समय उचित कारण दिए थे। उसके आदेश में ऐसी कोई गंभीर कानूनी गलती नहीं मिली, जिसके आधार पर हाईकोर्ट को दखल देना पड़े।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने महेश चंद्र शर्मा की सिविल रिवीजन याचिका खारिज कर दी गई।

इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि हाईकोर्ट ने मौखिक समझौते को रद्द करने की कार्रवाई को गलत घोषित कर दिया है या खरीदार को जमीन का मालिक मान लिया है।

हाईकोर्ट ने केवल यह तय किया है कि इन सवालों पर बिना दोनों पक्षों के सबूत और दलीलें सुने मुकदमा शुरुआती स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता। अब समझौते की वैधता और उससे जुड़े विवादों पर ट्रायल कोर्ट में सुनवाई के दौरान फैसला होगा।

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