पति की मौत के बाद LIC ने नाम में अंतर के चलते मांगा था सक्सेशन सर्टिफिकेट, हाईकोर्ट ने पत्नी और बेटे के हक में चार सप्ताह में प्रमाणपत्र जारी करने के निर्देश दिए
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जीवन बीमा पॉलिसी में पत्नी का आधिकारिक नाम ‘कमला देवी’ के बजाय घरेलू नाम ‘रेखी’ दर्ज होने के आधार पर बीमा राशि रोकने के मामले में अहम फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट ने बाड़मेर की निचली अदालत का आदेश रद्द करते हुए पत्नी और नाबालिग बेटे के पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाणपत्र (सक्सेशन सर्टिफिकेट) जारी करने के निर्देश दिए हैं।
जस्टिस मनीष शर्मा ने कहा कि सिर्फ नॉमिनी के नाम में अंतर होने से कानूनी वारिसों का अधिकार खत्म नहीं हो जाता। जब दस्तावेजों से व्यक्ति की पहचान और मृतक से रिश्ता साबित हो रहा हो, तो नाम का अंतर बीमा राशि पाने में बाधा नहीं बन सकता।
दरअसल कमला देवी के पति ने ₹1 लाख की जीवन बीमा पॉलिसी ली थी, जिसमें पत्नी का नाम ‘कमला देवी’ के बजाय ‘रेखी’ दर्ज हो गया था।
पति की मृत्यु के बाद LIC ने नाम के अंतर के आधार पर बीमा राशि का भुगतान रोक दिया और सक्सेशन सर्टिफिकेट लाने को कहा। कमला देवी और उनके बेटे ने इसके लिए कोर्ट में आवेदन किया, लेकिन निचली अदालत ने उनकी अर्जी खारिज कर दी थी।
अब हाईकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश रद्द करते हुए आदेश दिया है कि जरूरी औपचारिकताएं और कोर्ट फीस जमा होने के बाद चार सप्ताह के भीतर सक्सेशन सर्टिफिकेट जारी किया जाए।
मामले में अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता राजेश पुनिया और LIC की ओर से अधिवक्ता शगुन माथुर और शिवम शर्मा ने पैरवी की।
पॉलिसी में पत्नी का नाम ‘रेखी’, लेकिन आधिकारिक नाम कमला देवी है
मामला बाड़मेर जिले के रौजी की ढाणी निवासी कमला देवी और उनके नाबालिग बेटे से जुड़ा है। कमला देवी की शादी किशनाराम से 2010 में हुई थी। दोनों का बेटा 1 जनवरी 2012 को पैदा हुआ। किशनाराम ने ₹1 लाख की जीवन बीमा पॉलिसी ली थी और उसमें अपनी पत्नी को नॉमिनी बनाया था।
हालांकि, पॉलिसी से जुड़े दस्तावेजों में पत्नी का आधिकारिक नाम कमला देवी लिखने के बजाय उनका घरेलू नाम ‘रेखी’ दर्ज हो गया। परिवार और सामाजिक दायरे में कमला देवी को इसी नाम से बुलाया जाता था।
पति की मौत के बाद नाम में अंतर के चलते LIC ने रोक दिया था भुगतान
किशनाराम की 11 दिसंबर 2019 को मृत्यु हो गई। इसके बाद कमला देवी और उनके बेटे ने पॉलिसी के तहत मिलने वाली बीमा राशि का दावा किया, लेकिन LIC ने नाम में अंतर होने के कारण भुगतान रोक दिया।
LIC ने कहा कि पॉलिसी में नॉमिनी का नाम ‘रेखी’ दर्ज है, जबकि क्लेम करने वाली महिला का आधिकारिक नाम कमला देवी है।
ऐसे में बीमा राशि जारी करने के लिए सक्सेशन सर्टिफिकेट जरूरी है। यानी LIC ने कमला देवी से सक्षम कोर्ट से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र लाने को कहा।
लोअर कोर्ट ने भी आवेदन खारिज कर दिया था
LIC की आपत्ति के बाद कमला देवी और उनके बेटे ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 372 के तहत बाड़मेर की कोर्ट में सक्सेशन सर्टिफिकेट जारी करने के लिए आवेदन दिया।
आवेदन के संबंध में अखबार में सार्वजनिक सूचना भी प्रकाशित कराई गई, लेकिन किसी अन्य व्यक्ति ने उनके दावे पर आपत्ति नहीं की।
LIC ने कोर्ट में जवाब दाखिल कर कहा कि पॉलिसी में नॉमिनी का नाम ‘रेखी’ है, जबकि बीमा राशि का दावा करने वाली महिला के दस्तावेजों में नाम कमला देवी है। निगम ने कहा कि भुगतान के लिए औपचारिक उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जरूरी था।
कमला देवी ने कोर्ट में अपना आधार कार्ड, वोटर आईडी, बैंक पासबुक, पति का मृत्यु प्रमाणपत्र, बीमा पॉलिसी और बेटे का आधार कार्ड पेश किया। उन्होंने गवाही में भी बताया कि परिवार और सामाजिक परिवेश में उन्हें रेखी नाम से पुकारा जाता है।
इसके बावजूद अतिरिक्त जिला न्यायाधीश संख्या-1, बाड़मेर ने 7 जुलाई 2022 को सक्सेशन सर्टिफिकेट का आवेदन खारिज कर दिया। इसके खिलाफ कमला देवी और उनके बेटे ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की।
हाईकोर्ट ने कहा- नाम का अंतर वारिस होने का अधिकार खत्म नहीं करता
जस्टिस मनीष शर्मा ने मामले में कहा कि नॉमिनी के नाम में अंतर को ऐसा दोष नहीं माना जा सकता, जिससे कानूनी वारिसों को उत्तराधिकार के अधिकार से वंचित कर दिया जाए। नाम में अंतर पहचान से जुड़ा सवाल हो सकता है, लेकिन यह अपने-आप में वारिस होने की पात्रता खत्म नहीं करता।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब दस्तावेजों और मौखिक बयान से पहचान और रिश्ते की पुष्टि हो रही हो, तो नाम के अंतर जैसी तकनीकी बात के कारण वास्तविक अधिकारों को नहीं रोका जा सकता।
आधार कार्ड, वोटर आईडी और बैंक पासबुक को माना अहम
हाईकोर्ट ने गौर किया कि कमला देवी ने अपनी पहचान साबित करने के लिए आधार कार्ड, वोटर आईडी और बैंक पासबुक जैसे दस्तावेज पेश किए थे। उनके बेटे रामा राम का आधार कार्ड भी रिकॉर्ड पर था।
कमला देवी ने अपने बयान में बताया था कि परिवार में उन्हें ‘रेखी’ नाम से बुलाया जाता है। कोर्ट ने कहा कि इस बयान का विरोध करने के लिए दूसरी ओर से कोई सबूत पेश नहीं किया गया। ऐसे में पहचान और रिश्ते से जुड़े दस्तावेजों को नजरअंदाज कर आवेदन खारिज करना सही नहीं था।
‘नॉमिनी होना मालिकाना हक मिलने के बराबर नहीं’
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘सरबती देवी बनाम उषा देवी‘ का भी जिक्र किया। इस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि बीमा पॉलिसी में नॉमिनी का नाम दर्ज होने से उसे बीमा राशि पर अपने आप पूर्ण मालिकाना हक नहीं मिल जाता।
कोर्ट ने समझाया कि नॉमिनी की भूमिका बीमा कंपनी से राशि प्राप्त करने के लिए अधिकृत व्यक्ति की होती है। बीमा राशि पर अंतिम अधिकार मृतक के उत्तराधिकारियों का हो सकता है और उसका निर्धारण लागू उत्तराधिकार कानून के अनुसार किया जाता है।
इसलिए नॉमिनी के नाम में अंतर के आधार पर कानूनी वारिसों का दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा- पत्नी और बेटा प्रथम श्रेणी के कानूनी वारिस
इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि कृष्णाराम की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी और नाबालिग बेटा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत प्रथम श्रेणी के कानूनी वारिस हैं।
पॉलिसी के तहत मिलने वाली रकम भी किशनाराम की संपत्ति का हिस्सा थी, जिस पर कानूनी वारिसों का दावा बनता है। इसलिए पॉलिसी में पत्नी का घरेलू नाम दर्ज होने की तकनीकी वजह से उनका दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने 4 सप्ताह में प्रमाणपत्र जारी करने का दिया आदेश
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के उन निष्कर्षों को सही नहीं माना, जिनके आधार पर कमला देवी और उनके बेटे का आवेदन खारिज किया गया था।
जस्टिस मनीष शर्मा ने बाड़मेर के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश संख्या-1 को आदेश दिया कि जीवन बीमा पॉलिसी संख्या 107744058 के तहत देय ₹1 लाख की बीमा राशि और अन्य स्वीकार्य लाभों के लिए कमला देवी और उनके बेटे के पक्ष में सक्सेशन सर्टिफिकेट जारी किया जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के 4 सप्ताह के भीतर जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने और निर्धारित कोर्ट फीस जमा होने के बाद प्रमाणपत्र जारी किया जाए।
प्रमाणपत्र LIC के सामने पेश होने पर निगम को स्वीकार्य क्लेम राशि का भुगतान बिना अनावश्यक देरी के करना होगा।