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BREAKING NEWS: दिल्ली आए बिना लद्दाख के वकील अब सुप्रीम कोर्ट में रख सकेंगे अपना पक्ष! CJI सूर्यकांत का बड़ा ऐलान, क्षेत्र के सभी मामले एक दिन होंगे सूचीबद्ध

BREAKING: CJI Surya Kant’s Big Assurance for Ladakh Lawyers: All Region-Related Cases to Be Listed on a Single Day in Supreme Court

लद्दाख में हाईकोर्ट की पीठ का उद्घाटन कर CJI ने दिया बड़ा आश्वासन; वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई, लेह-कारगिल के वकीलों और पक्षकारों का बचेगा समय-पैसा

लेह, लद्दाख। न्याय के लिए अब लद्दाख के लोगों को लंबी दूरी, दुर्गम पहाड़ी रास्तों और भारी खर्च की बाधाओं से जूझने की जरूरत कम होगी।

देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने रविवार को लेह में जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट की लद्दाख बेंच का उद्घाटन करते हुए एक बड़ा ऐलान किया।

उन्होंने आश्वासन दिया कि पर्याप्त वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाएं उपलब्ध होने के बाद लद्दाख से संबंधित सभी मामलों को सुप्रीम कोर्ट में एक ही दिन सूचीबद्ध किया जाएगा और उनकी सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए भी की जाएगी।

इस व्यवस्था का उद्देश्य लेह और कारगिल के अधिवक्ताओं को सुप्रीम कोर्ट में अपने मामलों की पैरवी के लिए दिल्ली आने की अनिवार्यता से राहत देना है।

समय और यात्रा पर खर्च

इससे मुकदमों से जुड़े पक्षकारों का समय और यात्रा पर होने वाला खर्च भी बच सकेगा।

CJI ने स्पष्ट किया कि लद्दाख की भौगोलिक दूरी उसके नागरिकों और देश की सर्वोच्च अदालत के बीच बाधा नहीं बननी चाहिए।

रविवार को लेह के मेलांगथांग स्थित हाईकोर्ट परिसर में आयोजित उद्घाटन समारोह में CJI जस्टिस सूर्यकांत ने न्याय तक पहुंच को न्यायपालिका की वास्तविक सफलता का आधार बताया।

उन्होंने कहा कि न्यायिक संस्थाओं का उद्देश्य केवल अदालतें स्थापित करना नहीं, बल्कि उन्हें आम नागरिकों के लिए सुलभ बनाना है।

सुप्रीम कोर्ट में लद्दाख के मामलों के लिए अलग दिन, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से होगी पैरवी

CJI जस्टिस सूर्यकांत ने अपने संबोधन में कहा कि लद्दाख बेंच के अधिवक्ताओं के लिए पर्याप्त वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाएं उपलब्ध होने के बाद सुप्रीम कोर्ट लद्दाख से आने वाले सभी मामलों को एक ही दिन सूचीबद्ध करेगा।

इन मामलों की सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भी की जाएगी।

इस पहल से लेह और कारगिल के अधिवक्ता लद्दाख में रहते हुए ही सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी दलीलें रख सकेंगे। अभी तक दिल्ली पहुंचने के लिए लंबी यात्रा करनी पड़ सकती थी, जिससे वादकारियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता था।

CJI ने कहा कि वह चाहते हैं कि लेह और कारगिल बार एसोसिएशन के अधिवक्ता लद्दाख छोड़े बिना सुप्रीम कोर्ट में मामलों की पैरवी कर सकें।

इससे पक्षकारों को राष्ट्रीय राजधानी तक आने-जाने में लगने वाले समय और धन की बचत होगी।

यह व्यवस्था विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, जिनके लिए लंबी यात्रा करना आर्थिक, शारीरिक या भौगोलिक कारणों से कठिन है।

‘हाईकोर्ट खुद लद्दाख पहुंचा, अब लोगों को दर्रे पार कर अदालत नहीं जाना पड़ेगा’

CJI ने लद्दाख में न्यायिक संस्थान की स्थापना के महत्व को रेखांकित करते हुए क्षेत्र की भौगोलिक कठिनाइयों का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि करीब एक सदी तक लद्दाख की सेवा करने वाला हाईकोर्ट ग्रेट हिमालय के दूसरी ओर स्थित रहा।

सर्दियों में परिस्थितियां ऐसी हो जाती थीं कि हवाई यात्रा ही अदालत तक पहुंचने का एकमात्र व्यावहारिक साधन रह जाती थी।

उन्होंने कहा कि विधवाओं को पेंशन संबंधी लाभ प्राप्त करने, बच्चों से दोबारा मिलने की मांग करने वाली माताओं और बीमा दावों के लिए संघर्ष कर रहे वरिष्ठ नागरिकों के लिए हाईकोर्ट तक पहुंचना बेहद महंगा साबित हो सकता था।

कई बार यात्रा का खर्च ही वकील की फीस से अधिक हो जाता था। कुछ लोग तो इसी वजह से हाईकोर्ट तक पहुंच ही नहीं पाते थे।

CJI ने इस बदलाव का महत्व बताते हुए कहा कि अब हाईकोर्ट लोगों से पहाड़ी दर्रे पार करके अपने पास आने की अपेक्षा करने के बजाय स्वयं लद्दाख पहुंचा है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय तक पहुंच का सिद्धांत तभी सार्थक होगा, जब न्यायिक संस्थाएं नागरिकों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उनके करीब आएंगी।

2019 में लद्दाख बना केंद्रशासित प्रदेश, लेकिन दूरी की चुनौती बरकरार रही

लद्दाख वर्ष 2019 में केंद्रशासित प्रदेश बना। इसके बाद जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के नाम में भी लद्दाख शामिल हुआ और यह जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट कहलाया।

हालांकि, CJI ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि किसी न्यायालय के नाम में किसी क्षेत्र का उल्लेख होना और वहां के लोगों के लिए न्यायालय तक पहुंच आसान होना दो अलग-अलग बातें हैं।

उन्होंने कहा कि लद्दाख के नागरिकों के लिए वास्तविक बदलाव तभी संभव था, जब न्यायिक व्यवस्था उनकी भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित होती। नई बेंच इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

लद्दाख बेंच का लाभ केवल लेह तक सीमित नहीं रहना चाहिए। CJI ने कहा कि यह बेंच कारगिल के लोगों की भी उतनी ही है और इसकी सफलता तभी मानी जाएगी, जब पूरे क्षेत्र के नागरिक इसे अपना न्यायिक संस्थान महसूस करें।

गांव-गांव तक न्याय पहुंचाने के लिए तकनीक बनेगी हथियार

CJI जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि हाईकोर्ट की पीठ स्थापित होना न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत है, लेकिन आगे की जिम्मेदारी तकनीक और कानूनी सहायता को प्रभावी तरीके से इस्तेमाल करने की है।

उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और मोबाइल पर संदेशों के माध्यम से मुकदमों की तारीखों तथा अन्य न्यायिक प्रक्रियाओं की जानकारी उपलब्ध कराने की संभावनाओं पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि दूरदराज के गांवों में रहने वाले नागरिकों को हर छोटी-बड़ी न्यायिक प्रक्रिया के लिए लंबी दूरी तय करने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए। ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, जिससे वे अपने दस्तावेज जमा करने, मुकदमे की स्थिति जानने और सुनवाई में भाग लेने जैसी सुविधाओं का लाभ अपने क्षेत्र में रहकर उठा सकें।

हालांकि, उन्होंने तकनीक के इस्तेमाल में एक महत्वपूर्ण सावधानी भी बताई।

तकनीक उन लोगों के लिए नई बाधा नहीं बननी चाहिए, जिन्हें कंप्यूटर या डिजिटल सेवाओं का पर्याप्त ज्ञान नहीं है। ऐसे नागरिकों की सहायता के लिए ई-सेवा केंद्रों और अन्य सुविधा केंद्रों को प्रभावी बनाया जाना चाहिए।

कानूनी सहायता का दायरा बढ़ाने पर जोर, गांवों में लगेंगे जागरूकता शिविर

CJI ने कहा कि न्याय तक पहुंच केवल अदालतों और तकनीकी सुविधाओं तक सीमित नहीं है।

कानूनी सहायता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, ताकि जरूरतमंद नागरिक अपने अधिकारों को समझ सकें और उनका लाभ उठा सकें।

उन्होंने गांवों में कानूनी जागरूकता शिविर आयोजित करने, पैरा-लीगल स्वयंसेवकों की भूमिका मजबूत करने और जरूरतमंद लोगों को निःशुल्क वकील उपलब्ध कराने पर जोर दिया।

इसके साथ ही उन्होंने लोक अदालतों के माध्यम से विवादों के समाधान और अपराध के पीड़ितों को समय पर मुआवजा दिलाने की आवश्यकता भी रेखांकित की।

CJI के अनुसार, हाईकोर्ट की विधिक सेवा समिति और लद्दाख विधिक सेवा प्राधिकरण को मिलकर उन लोगों तक पहुंचना चाहिए, जो अभी भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

उन्होंने न्याय तक पहुंच के मूल सिद्धांत को रेखांकित करते हुए कहा कि इसकी शुरुआत अदालत परिसर से नहीं, बल्कि वादकारी के दरवाजे से होती है।

लद्दाख के अधिवक्ताओं और भावी न्यायाधीशों के लिए भी नई संभावनाएं

CJI जस्टिस सूर्यकांत ने उम्मीद जताई कि लद्दाख बेंच की स्थापना से क्षेत्र में कानूनी पेशे को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

इससे स्थानीय अधिवक्ताओं को न्यायिक कार्यों में भागीदारी के अधिक अवसर मिल सकते हैं और आने वाले समय में लद्दाख से नई पीढ़ी के कानूनी पेशेवर उभर सकते हैं।

उन्होंने आशा व्यक्त की कि भविष्य में क्षेत्र से ऐसे प्रतिभाशाली लोग भी सामने आएंगे, जो न्यायाधीश के रूप में न्यायिक व्यवस्था की सेवा कर सकें।

CJI ने इससे पहले मार्च में लेह और कारगिल में नए जिला न्यायालय परिसरों के उद्घाटन का उल्लेख करते हुए कहा कि लद्दाख में न्यायिक संस्थाओं को लोगों के करीब लाने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।

उद्घाटन समारोह में न्यायपालिका और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी रहे मौजूद

लेह में आयोजित समारोह में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अरुण पल्ली, जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी, भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी तथा लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना मौजूद रहे।

लद्दाख बेंच की स्थापना के लिए राष्ट्रपति ने 28 अगस्त 2026 को सर्किट बेंच स्थापित करने की अनुमति देने वाला विनियमन जारी किया था।

अब इसके उद्घाटन के साथ क्षेत्र में न्यायिक पहुंच को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।
अपनी भौगोलिक परिस्थितियों से अकेले संघर्ष नहीं करना चाहिए; न्यायिक व्यवस्था को भी उनके करीब पहुंचने के लिए तकनीक, कानूनी सहायता और बेहतर संस्थागत सुविधाओं का सहारा लेना होगा।

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