हाईकोर्ट ने कहा- ICAR एक्रीडिटेशन के लिए 6 साल की छूट से NOC की बाकी शर्तें खत्म नहीं होतीं
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने B.Sc. एग्रीकल्चर कोर्स चलाने वाले 7 निजी कृषि कॉलेजों की NOC बढ़ाने की मांग वाली याचिकाएं खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए इन कॉलेजों के अस्थायी NOC बढ़ाने से इनकार करने के सरकारी आदेशों में दखल देने से मना कर दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ICAR से मान्यता लेने के लिए 6 साल का समय मिलने का मतलब यह नहीं है कि कॉलेज बाकी जरूरी शर्तों को पूरा किए बिना NOC बढ़ाने का अधिकार मांग सकते हैं।
जस्टिस नूपुर भाटी ने SKD एग्रीकल्चर कॉलेज, श्री विनायक कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर समेत 7 संस्थानों की याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि कॉलेजों को निर्धारित शैक्षणिक मानकों, योग्य स्टाफ और अन्य जरूरी नियमों का पालन करना होगा।
दरअसल इ कॉलेजों ने सरकार के 10 अक्टूबर 2026 के आदेशों को चुनौती दी थी। इन आदेशों के जरिए शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए उनके अस्थायी NOC बढ़ाने से इनकार कर दिया गया था।
याचिकाकर्ता कॉलेजों की ओर से अधिवक्ता सी.एस. कोटवानी और चिन्मय शेखर ने पैरवी की। राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता नाथू सिंह राठौड़, अधिवक्ता अर्पित सामदरिया और दीपेश बेनीवाल ने पक्ष रखा।
7 निजी कृषि कॉलेजों ने दी थी सरकारी आदेशों को चुनौती
हाईकोर्ट में एसकेडी कृषि कॉलेज, श्री विनायक कृषि कॉलेज, श्री जीतेंद्र गोदारा का एसएलबीएस कृषि महाविद्यालय, श्रीनाथजी कृषि महाविद्यालय, एपेक्स कृषि एवं अनुसंधान संस्थान, ब्राइट करियर कृषि कॉलेज और सौरभ कृषि कॉलेज की ओर से याचिकाएं दायर की गई थीं।
इन कॉलेजों ने कृषि विभाग के 10 अक्टूबर 2026 के आदेशों को चुनौती दी थी। इन आदेशों के जरिए शैक्षणिक सत्र 2026-27 में प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों को प्रवेश देने के लिए अस्थायी NOC की अवधि बढ़ाने से इनकार किया गया था।
इन कॉलेजों ने हाईकोर्ट से मांग की थी कि उन्हें JET-2026 काउंसलिंग में शामिल होने दिया जाए, ताकि वे B.Sc. एग्रीकल्चर की सीटों पर विद्यार्थियों को एडमिशन दे सकें।
कॉलेजों का कहना था कि काउंसलिंग में शामिल होने की फीस जमा करने की आखिरी तारीख 19 अक्टूबर थी। अगर उन्हें अनुमति नहीं मिलती तो वे इस सत्र में विद्यार्थियों को प्रवेश नहीं दे पाते।
मामले की जल्द सुनवाई की जरूरत को देखते हुए हाईकोर्ट ने रविवार को विशेष अनुमति लेकर सुनवाई की। दोनों पक्षों की सहमति से कोर्ट ने बिना जवाब दाखिल कराए ही मामलों की अंतिम सुनवाई की।
कॉलेजों का तर्क- ICAR एक्रीडिटेशन के लिए अभी समय बाकी
याचिकाकर्ता कॉलेजों की ओर से दलील दी गई कि उन्हें पहले अस्थायी NOC जारी की गई थी और बाद के शैक्षणिक सत्रों में भी इसकी अवधि बढ़ाई जाती रही।
कॉलेजों का कहना था कि 2022 की कृषि नीति के क्लॉज 8.4 के तहत पहली अस्थायी NOC जारी होने से 6 शैक्षणिक वर्षों के भीतर ICAR से एक्रीडिटेशन हासिल करना जरूरी है।
उनका तर्क था कि संबंधित कॉलेजों के लिए यह अवधि अभी पूरी नहीं हुई थी। ऐसे में एक्रीडिटेशन नहीं मिलने के आधार पर NOC बढ़ाने से इनकार करना समय से पहले उठाया गया कदम है।
कॉलेजों ने यह भी कहा कि उनकी शुरुआती NOC वर्ष 2022 की नीति लागू होने से पहले जारी हुई थी, इसलिए नई नीति को पुराने मामलों पर लागू नहीं किया जाना चाहिए।
कॉलेजों का कहना था कि यह समय अभी पूरा नहीं हुआ था, इसलिए सरकार उनके NOC बढ़ाने से इनकार नहीं कर सकती थी।
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार हर साल निरीक्षण के लिए 70 हजार रुपये लेती है और विश्वविद्यालयों में संबद्धता के लिए 20 से 22 लाख रुपये से अधिक खर्च होते हैं। ऐसे में कॉलेजों के बुनियादी ढांचे और खर्च को देखते हुए NOC रोकना मनमाना है।
सरकार ने किया विरोध- नियमों के उल्लंघन की वजहें बताईं
राज्य सरकार की ओर से इन दलीलों का विरोध किया गया। सरकार ने कहा कि कॉलेजों को 2023-24 से 2025-26 तक अस्थायी NOC इस शर्त के साथ दी गई थी कि वे 2022 की कृषि नीति के प्रावधानों का पालन करेंगे।
सरकार का कहना था कि संबंधित कॉलेजों ने ICAR एक्रीडिटेशन के लिए आवेदन नहीं किया था और ICAR के निर्धारित मानकों के अनुसार योग्य शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक स्टाफ की नियुक्ति भी नहीं की थी।
कुछ कॉलेजों के मामले में कर्मचारियों को बैंक के जरिए वेतन देने, कर्मचारी भविष्य निधि (PF) और कर्मचारी बीमा से जुड़ी कटौतियां करने, बायोमेट्रिक उपस्थिति दर्ज करने और कॉलेज की वेबसाइट पर छात्रों की पूरी जानकारी उपलब्ध कराने जैसी शर्तों का पालन नहीं पाया गया।
सरकार ने यह भी बताया कि कॉलेजों ने नीति लागू होने के बाद शर्तों का पालन करने के संबंध में शपथपत्र दिए थे। इनमें यह स्वीकार किया गया था कि नियमों का पालन नहीं होने पर सरकार NOC रद्द करने या नियमानुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगी।
2022 की कृषि नीति में क्या हैं NOC बढ़ाने के नियम?
हाईकोर्ट ने कृषि नीति के क्लॉज 8 पर गौर किया। इसके क्लॉज 8.2 के अनुसार, जिन संस्थानों की अस्थायी NOC के 4 साल पूरे हो चुके हैं, उनकी NOC अधिकतम 2 साल के लिए बढ़ाई जा सकती है। हालांकि, इसके लिए निर्धारित शर्तें पूरी करना जरूरी है।
इन शर्तों में ICAR एक्रीडिटेशन के लिए आवेदन करना, निर्धारित मानकों के मुताबिक योग्य स्टाफ नियुक्त करना, शैक्षणिक गतिविधियों का संतोषजनक संचालन और जरूरी भवन व बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध होना शामिल है।
इसके अलावा स्टाफ को बैंक के जरिए वेतन देना, PF और कर्मचारी बीमा से संबंधित नियमों का पालन करना, बायोमेट्रिक उपस्थिति दर्ज करना, विद्यार्थियों के लिए जरूरी सुविधाएं बनाए रखना और कॉलेज की वेबसाइट पर प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों की पूरी जानकारी अपडेट करना भी जरूरी है।
नीति के क्लॉज 8.4 में पहली अस्थायी NOC जारी होने से 6 शैक्षणिक वर्षों के भीतर ICAR एक्रीडिटेशन प्राप्त करने की शर्त है। इसी प्रावधान के आधार पर कॉलेजों ने राहत मांगी थी।
हाईकोर्ट ने कहा- 6 साल की अवधि से बाकी शर्तों में छूट नहीं
जस्टिस नूपुर भाटी ने कहा कि कॉलेजों ने 6 साल की अवधि वाले प्रावधान पर जोर दिया, लेकिन NOC बढ़ाने के लिए अलग से निर्धारित शर्तों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का कहना कि, क्लॉज 8.2 और क्लॉज 8.4 को साथ पढ़ना होगा। एक्रीडिटेशन हासिल करने की समयसीमा और अस्थायी NOC बढ़ाने की शर्तें अलग-अलग हैं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल एक्रीडिटेशन हासिल करने की समयसीमा समाप्त नहीं होने के आधार पर कॉलेज NOC बढ़ाने का अधिकार नहीं मांग सकते।
उन्हें NOC के विस्तार के लिए जरूरी दूसरी शर्तें भी पूरी करनी होंगी। एक्रीडिटेशन के लिए समय मिलना अपने आप में अन्य नियमों से छूट नहीं देता।
नीति लागू होने के बाद कॉलेजों ने दिए थे शपथपत्र- हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने कॉलेजों की इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि 2022 की नीति को उन पर पूर्वव्यापी तरीके से लागू किया जा रहा है।
हाईकोर्ट ने कहा कि नीति के क्लॉज 35 में स्पष्ट है कि यह तत्काल प्रभाव से लागू होगी और पहले से संचालित निजी कृषि कॉलेजों के NOC से जुड़े आवेदनों पर भी इसके प्रावधान लागू होंगे।
हाईकोर्ट ने गौर किया कि नीति लागू होने के बाद कॉलेजों ने शर्तों के पालन का शपथपत्र दिया था और बाद में इन्हीं शर्तों को चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब संस्थानों ने शर्तों के अधीन NOC का लाभ स्वीकार किया, तो वे बिना किसी ठोस कानूनी आधार के संबंधित जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हट सकते।
कॉलेज यह भी साबित नहीं कर पाए कि वे नीति की शर्तें पूरी करने में असमर्थ क्यों रहे। कोर्ट ने कहा कि केवल यह कहकर नियमों से छूट नहीं मांगी जा सकती कि उनका पालन करना मुश्किल हो रहा है।
हालांकि, शपथपत्र देने मात्र से कोई गैरकानूनी प्रावधान वैध नहीं हो जाता, नीति और उसकी शर्तों की वैधता का आकलन लागू कानूनी व्यवस्था के अनुसार ही होगा।
हाइकोर्ट ने कहा- शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि निजी कॉलेजों को पहले NOC या संबद्धता मिल जाने से यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वे आगे भी जरूरी शर्तें पूरी किए बिना संचालन की अनुमति मांग सकें। पेशेवर शिक्षा देने वाले संस्थानों में योग्य शिक्षक, जरूरी सुविधाएं और तय शैक्षणिक मानक होना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य’ फैसले का भी जिक्र किया।
इसमें कहा गया था कि शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने का अधिकार अपने आप मान्यता या विश्वविद्यालय की संबद्धता पाने का अधिकार नहीं देता। इसके लिए निर्धारित शर्तों का पालन करना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने सभी सातों याचिकाएं खारिज की
हाईकोर्ट ने माना कि NOC नहीं बढ़ने से कॉलेजों और विद्यार्थियों पर असर पड़ सकता है, लेकिन केवल काउंसलिंग की अंतिम तारीख नजदीक होने के आधार पर जरूरी शर्तों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने माना कि सातों कॉलेज सरकार के आदेशों में दखल देने का कोई ठोस आधार नहीं बता सके। कोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज कर दीं और कोई लागत नहीं लगाई।