जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने कमर्शियल विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि तत्काल राहत की मांग के नाम पर प्री-इंस्टीट्यूशन मेडिएशन (Pre-Institution Mediation) यानी मुकदमा दायर करने से पहले मध्यस्थता की अनिवार्य प्रक्रिया से बचा नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि तत्काल राहत की जरूरत का आकलन मुकदमा दायर करते समय की परिस्थितियों के आधार पर होगा। बाद में अंतरिम राहत की अर्जी वापस लेने से यह नहीं माना जा सकता कि शुरुआत में राहत की जरूरत नहीं थी।
इसी आधार पर जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की डिवीजन बेंच ने याचिका खारिज कर दी।
याचिका में उदयपुर की कमर्शियल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें मेडिएशन नहीं कराने के आधार पर मुकदमा खारिज करने की मांग ठुकरा दी गई थी।
दरअसल, मामला दो कंपनियों के बीच बकाया भुगतान की वसूली से जुड़ा है। विवाद इस बात पर था कि प्री-इंस्टीट्यूशन मेडिएशन कराए बिना सीधे मुकदमा दायर करने पर केस खारिज किया जा सकता है या नहीं।
याचिकाकर्ता कर्गवल एंटरप्राइजेज की ओर से अधिवक्ता दीपिका पुरोहित ने पैरवी की। उन्होंने अधिवक्ता अनुज साहलोत की ओर से पक्ष रखा।
सामान की बकाया राशि के लिए दायर किया था मुकदमा
यह मामला कर्गवल एंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड और उदयपुर की वर्तिका इंजीनियरिंग कंपनी के बीच कारोबारी विवाद से जुड़ा है।
वर्तिका इंजीनियरिंग कंपनी पाइप, पाइप ब्रैकेट, नट-बोल्ट, रबर शीट और दूसरे औद्योगिक सामान का कारोबार करती है।
वर्तिका इंजीनियरिंग कंपनी का दावा था कि सामान की सप्लाई के बावजूद कर्गवल एंटरप्राइजेज ने ₹21,32,262 का भुगतान नहीं किया। भुगतान के लिए नोटिस देने के बाद भी रकम नहीं मिलने पर उसने कमर्शियल कोर्ट में मुकदमा दायर किया।
वर्तिका इंजीनियरिंग कंपनी ने कुल ₹27,46,353 की वसूली और उस पर 18% सालाना ब्याज देने की मांग की। मुकदमे के साथ ही उसने प्रतिवादी की संपत्ति कुर्क करने या बैंक गारंटी लेने की मांग भी की।
कंपनी ने संपत्ति बेचने की आशंका जताकर मांगी थी राहत
वर्तिका इंजीनियरिंग कंपनी ने कोर्ट में कहा कि प्रतिवादी अपनी संपत्ति बेच सकता है। ऐसा होने पर मुकदमे में उसके पक्ष में फैसला आने के बावजूद बकाया रकम वसूलना मुश्किल हो सकता है।
इसी आशंका के आधार पर कंपनी ने तत्काल अंतरिम राहत मांगी। उसका कहना था कि इसी वजह से उसने मुकदमा दायर करने से पहले मेडिएशन की प्रक्रिया नहीं अपनाई।
इसके जवाब में कर्गवल एंटरप्राइजेज ने आपत्ति जताई। उसका तर्क था कि अंतरिम राहत की अर्जी केवल अनिवार्य मेडिएशन से बचने के लिए लगाई गई थी।
उसने कहा कि मुकदमे में ऐसी कोई वास्तविक तात्कालिकता नहीं बताई गई थी, जिसके कारण मध्यस्थता की प्रक्रिया छोड़ना जरूरी होता।
मध्यस्थता नहीं कराने पर मुकदमा खारिज करने की मांग
कमर्शियल कोर्ट एक्ट, 2015 की धारा 12A के तहत, जिन कमर्शियल मुकदमों में तत्काल अंतरिम राहत की जरूरत नहीं होती, उनमें मुकदमा दायर करने से पहले प्री-इंस्टीट्यूशन मेडिएशन की प्रक्रिया अपनाना जरूरी है।
कर्गवल एंटरप्राइजेज ने इसी प्रावधान का हवाला देकर मुकदमा खारिज करने की मांग की। उसका कहना था कि वर्तिका इंजीनियरिंग कंपनी ने मध्यस्थता से बचने के लिए तत्काल राहत की मांग का सहारा लिया था।
बाद में वर्तिका इंजीनियरिंग कंपनी ने लोक अदालत में अपनी अंतरिम राहत की अर्जी वापस ले ली। इसके बाद कर्गवल एंटरप्राइजेज ने दलील दी कि जब राहत की अर्जी ही वापस ले ली गई, तो मेडिएशन से छूट देने का आधार भी नहीं बचता।
हालांकि, उदयपुर की कमर्शियल कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2025 को यह मांग खारिज कर दी। इसके बाद कर्गवल एंटरप्राइजेज ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
तत्काल राहत की मांग मेडिएशन से बचने का बहाना नहीं हो सकत-हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वास्तविक तात्कालिकता के बिना अंतरिम राहत की मांग को धारा 12A से बचने का जरिया नहीं बनाया जा सकता। सिर्फ राहत की अर्जी लगा देने से मध्यस्थता की अनिवार्य प्रक्रिया से छूट नहीं मिल जाती।
हाईकोर्ट ने माना कि यह देखना जरूरी है कि मुकदमा दायर करते समय तत्काल राहत की वास्तविक जरूरत थी या नहीं। इसके लिए मामले के तथ्यों, दस्तावेजों और उस समय मौजूद परिस्थितियों की जांच करनी होगी।
इस मामले में वर्तिका इंजीनियरिंग कंपनी ने आशंका जताई थी कि प्रतिवादी अपनी संपत्ति बेच सकता है। इससे भविष्य में उसके पक्ष में फैसला आने पर रकम की वसूली प्रभावित हो सकती थी।
बाद में अर्जी वापस लेने से शुरुआती जरूरत खत्म नहीं होती
हाईकोर्ट ने कहा कि तत्काल राहत की जरूरत का आकलन मुकदमा दायर किए जाने के समय की परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए। बाद में हुई घटनाओं से शुरुआती स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता।
इस मामले में वर्तिका इंजीनियरिंग कंपनी ने लोक अदालत में कार्यवाही के दौरान अंतरिम राहत की अर्जी वापस ले ली थी। बाद में उसे प्रतिवादी की संपत्ति बेचे जाने की आशंका नहीं रही, इसलिए उसने अर्जी आगे नहीं बढ़ाई।
हाईकोर्ट ने कहा कि बाद में परिस्थितियां बदलने से यह साबित नहीं होता कि मुकदमा दायर करते समय तत्काल राहत की जरूरत नहीं थी। तात्कालिकता को बाद की घटनाओं के आधार पर खारिज करना न्याय के उद्देश्य के विपरीत होगा।
‘बाद की घटनाओं से मुकदमा खारिज करना कानून की मंशा के खिलाफ’
हाईकोर्ट ने यह भी समझाया कि अगर बाद में अंतरिम राहत की जरूरत नहीं रहने के आधार पर मुकदमा खारिज करने की अनुमति दे दी जाए, तो पक्षकारों को फिर से मध्यस्थता की प्रक्रिया में भेजना पड़ सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी व्याख्या कानून बनाने के उद्देश्य और धारा 12A की मंशा के अनुरूप नहीं होगी। मुकदमा दायर करते समय मौजूद परिस्थितियों को नजरअंदाज करके बाद की घटनाओं के आधार पर फैसला नहीं किया जा सकता।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि तत्काल राहत मांगने वाली हर अर्जी स्वीकार कर ली जाएगी। कोर्ट को यह जांचना होगा कि राहत की जरूरत वास्तविक है या केवल अनिवार्य मध्यस्थता से बचने के लिए ऐसा किया गया है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान कर्गवल एंटरप्राइजेज की ओर से सुप्रीम कोर्ट के पाटिल ऑटोमेशन प्राइवेट लिमिटेड बनाम रखेजा इंजीनियर्स प्राइवेट लिमिटेड और यामिनी मनोहर बनाम टी.के.डी. कीर्ति फैसलों का हवाला दिया गया।
दलील दी गई कि प्री-इंस्टीट्यूशन मेडिएशन अनिवार्य है। साथ ही, तत्काल राहत मांगने के अपवाद की वास्तविकता की जांच होनी चाहिए।
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस कानूनी सिद्धांत को स्वीकार किया, लेकिन मौजूदा मामले में मुकदमा दायर करते समय की परिस्थितियों को अहम माना।
डिवीजन बेंच ने कर्गवल एंटरप्राइजेज की याचिका खारिज कर दी और कमर्शियल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।
हालांकि, हाईकोर्ट ने बकाया रकम के मूल विवाद पर फैसला नहीं दिया। उसने केवल यह तय किया कि बाद में अंतरिम राहत की अर्जी वापस लेने के आधार पर मुकदमा खारिज किया जा सकता है या नहीं।
