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‘नसबंदी फेल होने पर डॉक्टर की लापरवाही साबित करना जरूरी’, राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार की याचिकाएं स्वीकार कर लोक अदालत के मुआवजे के आदेश किए रद्द; योजना के तहत आवेदन कर सकेंगी महिलाएं

Failed Sterilisation Does Not Automatically Prove Medical Negligence: Rajasthan High Court Cancels Compensation Orders

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने नसबंदी ऑपरेशन के बाद महिला के गर्भवती होने के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए उदयपुर की स्थायी लोक अदालत के मुआवजा देने के आदेश रद्द कर दिए हैं।

जस्टिस मुकेश राजपुरोहित ने राज्य सरकार की ओर से दायर दो याचिकाएं स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि नसबंदी ऑपरेशन के बाद गर्भ ठहरने भर से डॉक्टर की लापरवाही साबित नहीं होती। डॉक्टर को जिम्मेदार ठहराने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि ऑपरेशन की विफलता उसकी लापरवाही के कारण हुई।

ये मामले फेफली बाई उर्फ फेफी बाई और देवली से जुड़े थे। दोनों मामलों में स्थायी लोक अदालत ने 3 मई 2013 को मुआवजे के आदेश दिए थे, जिन्हें राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हालांकि, कोर्ट ने प्रभावित महिलाओं को राज्य सरकार की संबंधित योजना के तहत मुआवजे के लिए आवेदन करने की छूट दी है।

नसबंदी के बाद गर्भवती होने पर मांगा था मुआवजा

ये दोनों मामले फेफली बाई उर्फ फेफी बाई और देवली से जुड़े हैं। दोनों महिलाओं ने नसबंदी ऑपरेशन के बाद गर्भधारण होने के आधार पर मुआवजे की मांग की थी।

उदयपुर की स्थायी लोक अदालत ने 3 मई 2013 को उनके पक्ष में आदेश पारित किए थे। राज्य सरकार ने इन आदेशों को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए इन्हें रद्द करने और महिलाओं की ओर से पेश आवेदन खारिज करने की मांग की थी।

सरकार की मांग थी कि लोक अदालत का आदेश रद्द किया जाए और महिलाओं की ओर से पेश आवेदन खारिज किए जाएं।

हाईकोर्ट के सामने विवाद का मुख्य सवाल यह था कि क्या नसबंदी ऑपरेशन के बाद गर्भ ठहरने भर से डॉक्टर को लापरवाही का जिम्मेदार मानकर मुआवजा देने का आदेश दिया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने इस सवाल पर पहले के न्यायिक फैसलों और सुप्रीम कोर्ट के निर्धारित सिद्धांतों के आधार पर विचार किया।

हाईकोर्ट ने कहा- डॉक्टर की लापरवाही के ठोस सबूत जरूरी

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नसबंदी ऑपरेशन के बाद गर्भधारण होने मात्र से डॉक्टर की लापरवाही साबित नहीं होती। डॉक्टर को जिम्मेदार ठहराने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि ऑपरेशन की विफलता उसकी लापरवाही के कारण हुई।

हाईकोर्ट ने कहा कि परमानेंट लोक अदालत ने डॉक्टर की लापरवाही के संबंध में पर्याप्त सबूत और स्पष्ट निष्कर्ष के बिना मुआवजे का आदेश दिया था। केवल ऑपरेशन के सफल नहीं होने के आधार पर डॉक्टर को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे मामलों में यह देखना जरूरी है कि डॉक्टर की लापरवाही के आरोप को साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य मौजूद हैं या नहीं।

‘प्राकृतिक कारणों से भी फेल हो सकता है ऑपरेशन’

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के State of Punjab v. Shiv Ram और State of Haryana v. Raj Rani मामलों में दिए गए फैसलों का हवाला दिया।

इन फैसलों के मुताबिक, नसबंदी ऑपरेशन के बाद गर्भधारण होने के पीछे डॉक्टर की लापरवाही के अलावा प्राकृतिक कारण भी हो सकते हैं। मेडिकल प्रक्रिया सही तरीके से पूरी होने के बावजूद कुछ मामलों में ऑपरेशन सफल नहीं होता।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि डॉक्टर को तभी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जब ऑपरेशन की विफलता उसकी लापरवाही के कारण हुई हो।

यदि लापरवाही साबित नहीं होती, तो केवल नसबंदी ऑपरेशन के बाद गर्भधारण होने के आधार पर डॉक्टर को मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। ऐसी स्थिति में राज्य की जिम्मेदारी भी अपने आप तय नहीं हो जाती।

पहले के फैसले में भी यही सिद्धांत अपनाया गया था

सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के वकीलों ने बताया कि राजस्थान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच इसी तरह के विवाद पर Smt. Ramila v. Chief Medical & Health Officer & Ors. मामले में 15 जनवरी 2014 को फैसला सुना चुकी है।

दोनों पक्षों ने मौजूदा याचिकाओं का निपटारा भी उसी फैसले के आधार पर करने का अनुरोध किया।

उस मामले में भी नसबंदी ऑपरेशन के बाद गर्भधारण होने पर मुआवजे का आदेश रद्द किया गया था, क्योंकि डॉक्टर की लापरवाही साबित नहीं हुई थी। हाईकोर्ट ने माना कि केवल ऑपरेशन की विफलता को लापरवाही मान लेना उचित नहीं है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुराने फैसले में राज्य सरकार की योजना के तहत मुआवजे के लिए आवेदन करने का विकल्प दिया गया था। इसका अर्थ यह नहीं था कि हर ऐसे मामले में सरकार मुआवजा देने के लिए बाध्य होगी।

पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत पहले से भुगतान की गई रकम वापस नहीं लेने का सवाल भी अलग परिस्थितियों में उठा था। मौजूदा मामलों में सरकार ने मुआवजे की रकम जारी नहीं की थी, इसलिए वह स्थिति यहां लागू नहीं होती।

बिना सबूत डॉक्टर को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते-हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने पुराने फैसले के सिद्धांतों के आधार पर माना कि डॉक्टर की लापरवाही के ठोस सबूत के बिना परमानेंट लोक अदालत मुआवजे का आदेश नहीं दे सकती। कोर्ट ने नसबंदी ऑपरेशन की विफलता और डॉक्टर की लापरवाही को एक ही बात मानने से इनकार किया।

इसी आधार पर जस्टिस मुकेश राजपुरोहित ने राज्य सरकार की दोनों याचिकाएं स्वीकार करते हुए स्थायी लोक अदालत के आदेशों में हस्तक्षेप करना उचित माना। कोर्ट ने 3 मई 2013 को पारित दोनों आदेश रद्द कर दिए।

मुआवजे के लिए योजना के तहत आवेदन कर सकेंगी महिलाएं

हाईकोर्ट ने मुआवजे के लिए महिलाओं का विकल्प पूरी तरह बंद नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि दोनों महिलाएं नसबंदी ऑपरेशन की विफलता से संबंधित राज्य सरकार की लागू योजना के तहत भुगतान पाने के लिए उचित कदम उठा सकती हैं।

ऐसे किसी आवेदन पर संबंधित योजना के प्रावधानों और कानून के अनुसार विचार किया जाएगा। इसका मतलब है कि स्थायी लोक अदालत के पुराने आदेश रद्द होने के बावजूद महिलाएं सरकारी योजना के तहत मुआवजे का दावा कर सकती हैं, लेकिन भुगतान अपने आप सुनिश्चित नहीं होगा।

इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नसबंदी ऑपरेशन के बाद गर्भधारण होना अपने आप में डॉक्टर की लापरवाही का प्रमाण नहीं है।

मुआवजे के लिए लापरवाही साबित करना जरूरी है, जबकि सरकारी योजना के तहत दावा करने का विकल्प अलग से उपलब्ध रह सकता है।

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