कोलकाता, 15 सितंबर
सालों की कानूनी लड़ाई के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया हैं कि पति चाहे बेरोज़गार हो, लेकिन अगर वह सक्षम है तो पत्नी को गुज़ारा भत्ता (Maintenance) देना उसकी जिम्मेदारी है.
हाईकोर्ट ने गुज़ारा भत्ते से जुड़े फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मामले में पत्नी को राहत दी है.
CrPC की धारा 125
महिला का विवाह वर्ष 2012 में विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुआ था। विवाह पंजीकरण के बाद भी दोनों साथ नहीं रहे और वैवाहिक विवाद लगातार बढ़ते गए। पत्नी ने आरोप लगाया कि पति और उसका परिवार उसे वैवाहिक घर में जगह नहीं दे रहे थे और तलाक का दबाव बना रहे थे.
जिसके बाद पत्नी ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत ₹10,000 मासिक गुज़ारा भत्ता कि मांग की.
साथ ही दोनों पक्षों के बीच घरेलू हिंसा, धारा 498A और विवाह अमान्य करने जैसी कई कार्यवाहियां भी चलीं.
फैमिली कोर्ट ने 8 जून 2023 को पत्नी की अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी कि पति बेरोज़गार है और गुज़ारा देने में सक्षम नहीं है.
फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौति देते हुए पत्नी ने कोलकोता हाईकोर्ट में याचिका दायर की.
हाईकोर्ट की टिप्पणी
जस्टिस अजय कुमार मुखर्जी ने फैमिली कोर्ट के फैसले में तर्क को न केवल “अकल्पनीय” बल्कि “कानून की गलत व्याख्या” करार देते हुए कहा कि
“सक्षम पति अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने से इंकार नहीं कर सकता.
बेरोज़गारी जानबूझकर चुना गया विकल्प भी हो सकती है, इसे पत्नी से जिम्मेदारी टालने की ढाल नहीं बनाया जा सकता.
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि धारा 125 CrPC का उद्देश्य केवल न्यूनतम जीवनयापन सुनिश्चित करना नहीं है, बल्कि पत्नी को पति की स्थिति और स्तर के अनुरूप जीवन देना है.
कोर्ट ने कहा कि पत्नी के पास मामूली आय होना पति की जिम्मेदारी को समाप्त नहीं करता।
प्रतिमाह गुजारा भत्ता
कोलकोता हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए पति को निर्देश दिया कि वह मूल आवेदन की तारीख से पत्नी को ₹4,000 प्रति माह गुज़ारा भत्ता दे.
हाईकोर्ट ने बकाया राशि को 31 अक्टूबर 2026 तक 12 किस्तों में अदा करने का आदेश दिया हैं.