नई दिल्ली:
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक हम फैसला सुनाते हुए कहा कि पत्नी द्वारा पति को उसके माता-पिता से अलग रहने के लिए मजबूर करना मानसिक क्रूरता है।
अदालत ने यह भी माना कि लगातार सार्वजनिक अपमान, पुलिस बुलाना और बच्चे को पिता से दूर करना जैसे कदम रिश्ते को असहनीय बना देते हैं.
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति को दी गई तलाक की डिक्री को बरकरार रखा और पत्नी की अपील खारिज कर दी।
मामला क्या था?
हाईकोर्ट में एक पत्नी ने 21 जनवरी, 2023 के दिल्ली की एक फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत पति के पक्ष में तलाक का आदेश दिया था.
पति ने पत्नी के कई कृत्यों के कारण गंभीर मानसिक पीड़ा का हवाला देते हुए तलाक के लिए याचिका दायर की थी।
पति ने कोर्ट में बताया कि शादी के कुछ ही महीनों बाद पत्नी ने संयुक्त परिवार में रहने से इनकार कर दिया। उसने लगातार दबाव बनाया कि वह मां और बहन से अलग होकर नया घर बसाए।
पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने सामाजिक समारोहों और यहां तक कि उसके कार्यस्थल पर भी उसे अपमानित किया। कई बार पुलिस को घर बुलाकर उसने माहौल बिगाड़ा, जिससे परिवार की गरिमा प्रभावित हुई।
पति ने कहा कि पत्नी ने बेटे को उससे दूर कर दिया और मिलने तक नहीं दिया। हाईकोर्ट ने इसे “क्रूरता का चरम रूप” माना।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार रखा
अदालत ने माना कि बार-बार इस तरह की हरकतें न केवल तनाव बढ़ाती हैं, बल्कि पति के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डालती हैं।
पत्नी ने दावा किया कि उसे सास और ननद से अपमान सहना पड़ा और घर का माहौल उसके लिए प्रतिकूल था। उसने कहा कि वह रिश्ते को बचाने की कोशिश कर रही थी और यहां तक कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए याचिका भी दायर की। लेकिन अदालत ने पाया कि पत्नी ने अदालत में अपनी बात मजबूती से नहीं रखी और कई बार दिए गए मौके का उपयोग भी नहीं किया।
अदालत ने माना कि पति के आरोप पुख़्ता और भरोसेमंद सबूतों से साबित होते हैं। पत्नी का लगातार आचरण मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। इसलिए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार रखते हुए पति को दी गई तलाक की डिक्री की पुष्टि कर दी।