प्रियंका बोराना
हम रोज़ाना असंख्य लोगों से मिलते हैं, अनगिनत दृश्य देखते हैं और ढेरों बातें सुनते हैं। जीवन हमें हर क्षण नई-नई कहानियाँ दिखाता है। लेकिन लिखने या कुछ करने की प्रेरणा के लिए अक्सर बस एक पंक्ति, एक क्षण या एक छोटी-सी घटना ही पर्याप्त होती है।
ऐसा ही मेरे साथ हुआ, जब इंस्टाग्राम पर मेरी नज़र रुख्माबाई पर लिखी एक छोटी-सी पोस्ट पर पड़ी। यह न कोई शोध था, न कोई लंबा लेख—बस उनके साहस पर लिखी कुछ पंक्तियाँ।
लेकिन उन पंक्तियों ने मुझे भीतर तक प्रेरित कर दिया।
As a lawyer, I found myself inspired at that very moment.
यहाँ थी 11 वर्ष की एक बच्ची, औपनिवेशिक (colonial) भारत में, जिसकी शादी उससे कहीं बड़े पुरुष से कर दी गई थी—और उसने थोपे गए जीवन को ठुकरा दिया।
जब अदालत ने उसे नसीहत दी कि या तो पति के साथ जाओ या जेल की सज़ा भुगतो, तब उसने निर्भीक होकर जेल का मार्ग चुना। उसी चयन ने उसे भारत में स्त्रियों की गरिमा की पहली गूंजती हुई आवाज़ बना दिया.
उसकी अवज्ञा ने 1891 के Age of Consent Act को जन्म देने में योगदान दिया। मेरे लिए यह कहानी केवल क़ानून की नहीं थी-यह अदम्य साहस की गाथा थी। उसने यह स्मरण कराया कि अधिकार कभी उपहार में नहीं मिलते, उन्हें संघर्ष और त्याग से अर्जित करना पड़ता है।
बाल विवाह से परे साहस की गाथा
कुछ वर्ष पूर्व की ही घटना है। बूंदी ज़िले की दो बहनें, जो अब भी स्कूल जाती थीं, अगली सुबह कक्षा में लौटीं तो माँग में सिंदूर और हाथों में चूड़ियाँ थीं। पिछली रात उनकी शादी कर दी गई थी।
अध्यापकों ने तुरंत पहचान लिया, लेकिन स्वीकार किया कि एक बार रस्में पूरी हो जाएँ तो रोक पाना असंभव होता है। यही है गाँवों में बाल विवाह की कटु सच्चाई-कभी चोरी-छिपे, कभी उत्सवों की आड़ में, ताकि कोई हस्तक्षेप न कर सके।
परिवार प्रायः एक साथ कई बेटियों की शादी कर देते हैं और छोटी बहनों को घर पर रोककर रखते हैं, जब तक वे ‘ससुराल जाने योग्य’ न हो जाएँ। परिवार की दृष्टि में यह परंपरा है, परंतु बेटियों के लिए यह उनके स्वप्न और स्वतंत्रता का अवसान है।
क़ानून वर्षों से मौजूद है
बाल विवाह निषेध अधिनियम 18 वर्ष से कम उम्र की शादी को अपराध घोषित करता है। लेकिन ‘गौना’ जैसी प्रथाएँ इस सीमा को धुंधला कर देती हैं।
आँकड़े चौंकाते हैं-20 से 24 वर्ष की लगभग हर चौथी भारतीय महिला की शादी 18 वर्ष से पूर्व हो चुकी थी। राजस्थान तो प्रायः शीर्ष पर रहता है। गरीबी, दहेज का बोझ और ‘इज़्ज़त’ खोने का भय आज भी माता-पिता को ऐसे निर्णय की ओर धकेलता है।

रुख्माबाई की अवज्ञा तो बस आरंभ थी। साहस फिर प्रकट हुआ जब सावित्रीबाई फुले ने गहनों की जगह किताबें उठाईं और गालियाँ, पत्थर और कीचड़ सहते हुए भी लड़कियों को शिक्षा देने निकलीं।
जब सरोजिनी नायडू और कस्तूरबा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम में समाज की दीवारें भेद दीं। स्वतंत्र भारत में भी वही जज़्बा अनवरत रहा।
1990 के दशक में राजस्थान की भंवरी देवी ने बाल विवाह का प्रतिरोध किया।
उनकी आवाज़ भले ही समुदाय ने दबा दी, लेकिन उसी से विशाखा गाइडलाइंस अस्तित्व में आईं-कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ भारत का पहला ठोस ढाँचा।
दहेज-विरोधी संशोधन, IPC की धारा 498A, निर्भया के बाद आपराधिक संशोधन कानून-ये सब स्त्रियों की पीड़ा और प्रतिरोध की ही उपज हैं।
मैरी कॉम जैसी खिलाड़ियों ने वर्ग और लिंग की दीवारें तोड़ीं। लक्ष्मी अग्रवाल ने अपने घाव को अभियान बना दिया और एसिड हमलों के ख़िलाफ़ कठोर क़ानून बने।
निर्भया कांड ने पूरे राष्ट्र की आत्मा को झकझोर डाला और नए आपराधिक प्रावधान सामने आए।
हाल ही में, #MeToo आंदोलन ने दशकों पुरानी चुप्पी तोड़ी। सुप्रीम कोर्ट में महिला अफ़सरों ने स्थायी कमीशन के लिए मुक़दमा जीता और सेना में समानता का नया अध्याय लिखा।
हरियाणा की लड़कियों ने सुरक्षित परिवहन की माँग कर अपनी शिक्षा बचाई। दिशा रवि जैसी जलवायु कार्यकर्ताओं ने यह दिखाया कि साहस अब केवल लिंग का प्रश्न नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति का भी है।
भारत से परे, रोज़ा पार्क्स का बस में सीट न छोड़ना 1955 में अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन का शंखनाद था। मलाला यूसुफ़ज़ई गोली खाने के बाद भी शिक्षा की आवाज़ बनीं।
यह सब कहानियाँ साबित करती हैं कि साहस की कोई सीमा या सरहद नहीं होती—यह परिवर्तन की सार्वभौमिक भाषा है।
हम कितनी दूर आ गए हैं
इन गाथाओं से स्पष्ट है कि साहस ने महिलाओं के लिए सुरक्षा का दायरा केवल बाल विवाह तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उससे कहीं आगे बढ़ा दिया है।
आज हमारे पास शिक्षा का अधिकार है, घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न से सुरक्षा के प्रावधान हैं, कार्यस्थलों पर आंतरिक शिकायत समितियों की अनिवार्यता है, एसिड की बिक्री पर नियंत्रण है, और सहमति को व्यक्तिगत गरिमा का केंद्रीय स्तंभ मानने वाले कानून मौजूद हैं।
फिर भी आँकड़े हमें यह याद दिलाते हैं कि चुनौतियाँ अब भी शेष हैं। वर्ष 2022 में ही महिलाओं के विरुद्ध 4,45,000 से अधिक अपराध दर्ज हुए—यानी हर घंटे लगभग 51 मामले।
इनमें से सबसे अधिक 31.4% मामले पति अथवा रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के थे, 19.2% अपहरण से जुड़े, 18.7% शील भंग के प्रयास से और 7.1% बलात्कार से। ये संख्याएँ न केवल चिंता उत्पन्न करती हैं, बल्कि यह भी दर्शाती हैं कि अब महिलाएँ चुप्पी तोड़कर आवाज़ उठा रही हैं और अपराध अदृश्य नहीं रह पा रहे।
राजस्थान जैसे प्रदेश अब भी उच्च आँकड़ों में गिने जाते हैं, जिससे स्थानीय सरकारों और समाज दोनों पर कार्यवाही का दबाव बढ़ा है।
सकारात्मक पक्ष
प्रवर्तन तंत्र भी बदल रहा है। 790 फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालयों (जिनमें से 408 POCSO अदालतें हैं) की स्थापना हुई है और इनमें अब तक 2,87,000 से अधिक मामलों का निस्तारण किया जा चुका है।
बड़े शहरों में Safe City Projects शुरू हुए हैं ताकि सार्वजनिक स्थानों को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाया जा सके। डिजिटल माध्यमों पर महिला हेल्पलाइन और शिकायत पोर्टल भी सक्रिय हैं। यह सब मिलकर दिखाता है कि अब तंत्र विरोध में नहीं, बल्कि समर्थन में खड़ा है।
रुख्माबाई के समय अदालत ने उसकी गरिमा को रौंदते हुए जेल की धमकी दी थी। आज वही न्याय-व्यवस्था महिला की सुरक्षा और गरिमा की रक्षक बन गई है।
यह परिवर्तन केवल कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि समाज के दृष्टिकोण में भी क्रांतिकारी बदलाव का संकेत है। अब संघर्ष केवल अस्तित्व का नहीं, बल्कि समानता और आत्मसम्मान का है। यही बदलाव गहरा और निर्णायक है।
अनकहा सफ़र
जब मैं इन सभी यात्राओं पर विचार करती हूँ, तो यह सूत्र स्पष्ट दिखाई देता है—क़ानून ने कभी स्वयं बदलना नहीं सीखा। इसे हमेशा उन लोगों ने आगे बढ़ाया जिन्होंने अन्याय का सामना करने का साहस दिखाया।
रुख्माबाई का बाल विवाह से इंकार, सावित्रीबाई फुले का शिक्षा के लिए संघर्ष, भंवरी देवी का गाँव में अकेले खड़ा होना, या दिल्ली की अदालत में निर्भया की माँ का न्याय की माँग करना—हर साहसी कदम ने व्यवस्था को आगे बढ़ने के लिए बाध्य किया।
कभी-कभी इन साहस की कहानियों को लिखते हुए मेरे भीतर एक विचित्र द्वंद्व पैदा होता है। मैं रुख्माबाई की प्रशंसा करती हूँ कि उन्होंने उस समय अपनी सच्चाई कही जब स्वयं कानून उनके विरुद्ध खड़ा था। उनमें अपनी कहानी निर्भीक होकर कहने की शक्ति थी।
“बड़ी अजीब बात है… मैं लिख तो रही हूँ, पर अपनी कहानी लिखने की हिम्मत अब तक नहीं जुटा पाई।” शायद यही स्मरण भी है—कि समय अवश्य बदला है, पर पूर्णत: नहीं। साहस आज भी आसान नहीं है।
चुप्पी अब भी अधिक सुरक्षित है। और शायद यही कारण है कि रुख्माबाई की कहानी आज और भी महत्वपूर्ण हो जाती है—क्योंकि वह हमें दिखाती है कि हमें क्या बनना चाहिए, भले ही हम अभी वहाँ तक न पहुँचे हों।
यह कोई कठोर वक्तव्य नहीं, बस एक छोटा-सा विचार है, जो मुझे रुख्माबाई और उन अनेक स्त्रियों की कहानियाँ पढ़ते समय आया जिन्होंने अपने स्थान से डटकर संघर्ष किया। मेरा उद्देश्य किसी की आस्था या भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि केवल यह याद दिलाना है कि जो सही है, उसे सही कहा जाए और जो ग़लत है, उसे ग़लत स्वीकार किया जाए।
यदि ये शब्द उन कुछ लोगों तक पहुँच सकें जो अब भी अपनी सच्चाई कहने की हिम्मत खोज रहे हैं, तो शायद उन्हें यह सांत्वना मिले कि वे अकेले नहीं हैं। अतीत की कहानियाँ हमें बोझ देने के लिए नहीं, बल्कि मार्गदर्शन करने के लिए होती हैं। और यदि वे हमें कुछ सिखाती हैं, तो यही—
“खड़ा होना कभी आसान नहीं होता, किंतु सदैव उचित होता है।”
प्रियंका बोराणा
राजस्थान हाईकोर्ट की युवा और प्रतिष्ठित अधिवक्ता, जिनका नाम लगातार उभरता हुआ देखा जा रहा है। वे आपराधिक, वैवाहिक और दीवानी मामलों में विशेषज्ञता रखती हैं और अपने गंभीर दृष्टिकोण और न्याय के प्रति समर्पण के लिए जानी जाती हैं। प्रियंका बोराणा जोधपुर हाईकोर्ट की लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी कमिटी की सदस्य भी हैं और विशेष रूप से महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर अपनी बेबाक राय और संवेदनशील दृष्टिकोण के लिए पहचानी जाती हैं।
यहां दिए जाने वाले विचार लेखक के निजी विचार हैं.
नोट: अगर आप भी कानून और न्याय से जुड़े किसी पहलू पर अपनी राय साझा करना चाहते हैं, तो इस विशेष लेख में आपका स्वागत है। यहाँ प्रकाशित होने से पहले आपके विचार आपके अपने होंगे, लेकिन प्रकाशित होने के बाद ये दुनिया की आवाज़ बन सकते हैं। फर्क नहीं पड़ता कि आप एक छात्र हैं, गृहिणी, नौकरीपेशा, आम नागरिक, अधिवक्ता या जज। यदि आपका उद्देश्य समाज में सकारात्मकता और न्याय के विचारों को बढ़ावा देना है, तो आपका यहाँ हार्दिक स्वागत है। lawsandlegals24@gmail.com