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सफेदपोश अपराध गैर-हिंसक होते हुए भी समाज के लिए अधिक खतरनाक और घातक, ऐसे मामले राष्ट्र को नुकसान पहुंचाते हैं- Rajasthan Highcourt

Rajasthan High Court on Media Ethics: Press Freedom Does Not Mean Freedom Above Law, FIR Against Journalist Ashish Dave Not Quashed

10.65 करोड़ के टैक्स घोटाले में ट्रायल कोर्ट के गिरफ्तारी वारंट का आदेश बरकरार, याचिका खारिज

जयपुर, 13 नवंबर 2025

Rajasthan Highcourt ने 10.65 करोड़ रुपये के इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) घोटाले के आरोपी व्यापारी निर्मल कुमार शर्मा को बड़ा झटका देते हुए उसके खिलाफ ट्रायल कोर्ट से जारी गिरफ्तारी वारंट के आदेश को उचित ठहराया है।

Rajasthan Highcourt ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आर्थिक अपराधों में आरोपी को केवल इसलिए राहत नहीं दी जा सकती कि अपराध मजिस्ट्रेट द्वारा ट्रायल किए जा रहे हैं और इस तरह के मामलों में अधिकतम सजा पाँच वर्ष की है।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए आरोपी व्यापारी की याचिका को खारिज कर दिया।

Rajasthan Highcourt ने कहा कि 10.65 करोड़ रुपये के फर्जी ITC से जुड़े आरोप “गंभीर आर्थिक अपराध” की श्रेणी में आते हैं और ऐसे मामलों में अदालत की दृष्टि हमेशा कठोर तथा सार्वजनिक हित के अनुरूप होनी चाहिए।

याचिकाकर्ता आरोपी व्यापारी ने ट्रायल कोर्ट द्वारा उसके खिलाफ जारी किए गए गिरफ्तारी वारंट को जमानती वारंट में बदलने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी।

समाज के लिए अधिक घातक

जस्टिस अनूप कुमार ढंड की अदालत ने आर्थिक अपराध को देश और समाज के लिए अधिक घातक बताते हुए कहा कि आर्थिक अपराधों का प्रभाव सामान्य अपराधों से अधिक गंभीर है।

Highcourt ने सुप्रीम कोर्ट के वाई.एस. जगनमोहन रेड्डी बनाम CBI (2013), निम्मगड्डा प्रसाद (2013), रोहित टंडन बनाम ED (2018) सहित कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा:

“गहरे षड्यंत्र और बड़ी सार्वजनिक धनराशि के नुकसान वाले आर्थिक अपराधों को अत्यंत गंभीरता से देखा जाना चाहिए।”

“ऐसे अपराध सोच-समझकर व्यक्तिगत लाभ के लिए किए जाते हैं, समाज पर इनके प्रभाव अत्यंत व्यापक होते हैं।”

Highcourt ने कहा कि सफेदपोश अपराध “गैर-हिंसक होते हुए भी समाज के लिए अधिक खतरनाक” हैं।

Highcourt ने कहा कि करोड़ों रुपये के नुकसान वाले अपराध देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार हैं और ऐसे आरोपितों के प्रति सामान्य अपराधों जैसी उदारता या नरमी नहीं दिखाई जा सकती।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता निर्मल कुमार शर्मा की ओर से अधिवक्ता राहुल खंडेलवाल ने अदालत में दलील दी कि जांच के दौरान याचिकाकर्ता को कभी गिरफ्तार नहीं किया गया।

याचिका में कहा गया कि निचली अदालत ने संज्ञान लेने के तुरंत बाद सीधे गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए, जो अवैध है।

याचिका में कहा गया कि आरोपित टैक्स चोरी मात्र 6 लाख रुपये की है, इसलिए गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है।

यह भी कहा गया कि मामले में याचिकाकर्ता अदालत में उपस्थित होने को तैयार था।

बचाव पक्ष ने राजस्थान हाईकोर्ट के हालिया पी.सी. पुरोहित बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले का हवाला दिया जिसमें समन/जमानती वारंट का सिद्धांत स्थापित किया गया था।

सरकार का जवाब

राज्य सरकार और CGST विभाग की ओर से अधिवक्ता अमित गुप्ता (PP), अक्षय भारद्वाज और बनवारीलाल ठाकर ने जवाब दिया कि 10 करोड़ से अधिक की चोरी एक गंभीर अपराध है।

सीजीएसटी विभाग ने कहा कि यह मामला “साधारण टैक्स चोरी” नहीं, बल्कि 10.65 करोड़ रुपये से अधिक का गंभीर आर्थिक अपराध है।

विभाग ने कहा कि आरोपी के खिलाफ गहन साक्ष्य उपलब्ध हैं कि उसने फर्जी फर्में बनाकर बड़े पैमाने पर ITC पास किया।

अधिवक्ता ने कहा कि अदालत द्वारा संज्ञान लेने के बाद गिरफ्तारी वारंट जारी करना पूरी तरह सही प्रक्रिया है।

अधिवक्ता ने वर्ष 2021 के गिर्धर गोपाल बजोरिया बनाम राजेश कुमार शर्मा समेत कई मामलों का हवाला देते हुए कहा कि इसी प्रकार की स्थिति में हाईकोर्ट गिरफ्तारी वारंट को सही ठहरा चुका है।

अधिवक्ता ने पी.सी. पुरोहित केस के संबंध में कहा कि यह निर्णय पूर्व निर्णयों पर विचार किए बिना दिया गया, इसलिए यह इस मामले में लागू नहीं होता।

नकली फर्मों के जरिए करोड़ों का घोटाला

CGST और केंद्रीय आबकारी विभाग की टैक्स एवेज़न शाखा की शिकायत में आरोप है कि निर्मल कुमार शर्मा ने फर्जी और गैर-मौजूद फर्में बनाकर इनपुट टैक्स क्रेडिट सिस्टम के जरिए करोड़ों रुपये का सरकारी कोष को नुकसान पहुंचाया।

विभाग ने कहा कि आरोपी ने कागज़ों में सप्लाई दिखाकर 10,65,23,833 रुपये का फर्जी ITC क्लेम किया।

विभाग का यह भी आरोप है कि जांच के दौरान आरोपी को गिरफ्तार करने के कई अवसर थे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह जांच में सहयोग से बचता रहा।

जमानत का विकल्प नहीं

Highcourt ने अपने फैसले में कहा कि “गिरफ्तारी वारंट को जमानती वारंट में बदलने की याचिका वस्तुतः एंटिसिपेटरी बेल की तरह है, जिसे वारंट प्रक्रिया के माध्यम से स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

Highcourt ने कहा कि हर मामला अपने तथ्यों पर तय होता है और सिर्फ इसलिए कि अपराध मजिस्ट्रेट द्वारा सुने जाने योग्य है, आरोपी को स्वतः राहत नहीं मिल सकती।

Highcourt ने कहा कि आरोप की गंभीरता, साक्ष्य की प्रकृति, समाज पर प्रभाव और आरोपी का आचरण अधिक महत्वपूर्ण हैं।

संगठित आर्थिक अपराध

फर्जी बिलिंग और फर्जी कंपनियाँ बनाना संगठित आर्थिक अपराध है, जिससे सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान होता है।

ऐसे मामलों में गिरफ्तारी वारंट जारी करना पूरी तरह उचित और आवश्यक है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में पी.सी. पुरोहित फैसला लागू नहीं होता।

याचिका खारिज, गिरफ्तारी वारंट बहाल

सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि गंभीर आर्थिक अपराधों में नरमी उचित नहीं है। आरोपित के खिलाफ संज्ञान सही ढंग से लिया गया है और गिरफ्तारी वारंट जारी करने में निचली अदालत द्वारा कोई त्रुटि नहीं की गई है।

Highcourt ने घोटाले के आरोपी निर्मल कुमार शर्मा की याचिका को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है.

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