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निर्दोष लोगों को अदालतों में न घसीटा जाए, उन्हें गलत मुकदमों का सामना न करना पड़े और वे प्रक्रिया के बोझ तले थक न जाएं-Justice U U Lalit 

Full Speech: Former CJI U.U. Lalit Advocates Balanced Justice, Warns Against Misuse of Laws at Ekam Nyaay Conference

पुरूषो पर महिलाओं के झुठे मुकदमों को लेकर नई दिल्ली में आयोजित कॉन्फ्रेस में पूर्व सीजेआई जस्टिस यू.यू. ललित का पूरा भाषण पढ़िए..

जस्टिस यू.यू. ललित

हमारे देश के पुलिस अधिकारी या जांच अधिकारी उस स्तर की प्रोफेशनल ट्रेनिंग, उपकरण या शिक्षा से लैस नहीं हैं, जिसकी उन्हें आवश्यकता है और जिसके वे हकदार हैं.

प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार के निर्णय में भी यह कहा गया था कि हमें पुलिस बल में “जांच शाखा” को सामान्य “कानून-व्यवस्था” शाखा से अलग करना चाहिए.

हमारे देश में दोषसिद्धि (conviction) की दर कभी 20% से अधिक नहीं रही है। पाँच में से चार अभियुक्त बरी हो जाते हैं.

क्या हम ऐसे लोगों को हिरासत में नहीं ले रहे हैं जो बाद में निर्दोष साबित होते हैं, या जिनके खिलाफ अपराध सिद्ध ही नहीं होता?

ऐसे में समाज कहाँ खड़ा है? क्या हमारा दायित्व नहीं है कि हम अपनी व्यवस्था को इस तरह सुरक्षित बनाएं कि निर्दोष व्यक्ति को जीवनभर न्याय के लिए भटकना न पड़े?

समाज का नैतिक और कानूनी दायित्व है कि ऐसे व्यक्तियों को न्याय मिले — यही एकम न्याय की भावना है।

दीपिका नारायण भारद्वाज ने जो कहा – हम महिला विरोधी नहीं, न्याय समर्थक हैं” – यही इस विचार का मूल है.

हमारे समाज में जहाँ सीता मइयां हैं, वहीं शूर्पणखाएं भी हैं। इसलिए समाज के रूप में हमें सतर्क रहना होगा और अपनी न्यायिक व्यवस्था को इस प्रकार मजबूत बनाना होगा कि निर्दोष लोगों को अदालतों में न घसीटा जाए, उन्हें गलत मुकदमों का सामना न करना पड़े और वे प्रक्रिया के बोझ तले थक न जाएं।

हमारी न्यायशास्त्र की स्थिति यह है कि धारा 376 (बलात्कार) जैसे मामलों में पीड़िता के बयान को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है – यह उचित भी है.

लेकिन यदि आरोप झूठा साबित होता है, तो झूठे आरोप लगाने वाले पर कार्रवाई के लिए दूसरा मुकदमा चलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए.

अदालत का अध्यक्षीय अधिकारी उसी मुकदमे में यह निष्कर्ष दे सके कि अभियोग झूठा था और झूठा आरोप लगाने वाले को दंडित किया जाए।

ऐसे सुरक्षा प्रावधान हर स्तर पर होने चाहिए – जांच के दौरान, मुकदमे की सुनवाई के दौरान, और मजिस्ट्रेट की पूछताछ के दौरान।

अक्सर देखा जाता है कि युवक-युवतियाँ परस्पर सहमति से संबंध बनाते हैं, फिर किसी कारणवश संबंध टूट जाता है और एक-दो साल बाद यह शिकायत आती है कि “इस व्यक्ति ने शादी का झूठा वादा करके मेरा शोषण किया।” ऐसे मामलों में कुछ सच्चाई भी हो सकती है, लेकिन कई बार इनमें grey shades यानी संदेह की स्थिति भी होती है.

ऐसे में प्रणाली को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी निर्दोष व्यक्ति को बिना कारण गिरफ्तार न किया जाए।

ऐसे मामलों में यह भी सोचना चाहिए कि आरोपी पुरुष की गिरफ्तारी से जांच की प्रगति में क्या योगदान होगा?

कई बार घटनाएँ एक-दो साल पुरानी होती हैं, फिर भी पुलिस दिन-प्रतिदिन ऐसे मामलों में लोगों को गिरफ्तार कर उनकी स्वतंत्रता छीन लेती है.

ये ऐसे विषय हैं जिन पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। एकम न्याय कॉन्फ्रेंस जैसे आयोजन वास्तव में समाज की जरूरत हैं – ये समय की मांग हैं। यही वो मंच हैं जहाँ इन महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यान दिया जा सकता है और सुधार की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकते हैं।

मुझे विश्वास है कि यह अमृत मंथन समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाएगा, समाज के कल्याण और न्याय के उद्देश्य की पूर्ति करेगा। मैं आयोजकों इस महत्वपूर्ण कॉन्फ्रेंस के आयोजन के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ.

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