26 नवंबर 2025 को दोपहर 2 बजे व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने के आदेश; गंभीर आरोपों से जुड़े रिकॉर्ड भी करना होगा पेश
जयपुर, 20 नवंबर
राजस्थान हाईकोर्ट ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का गौरव बढ़ा चुके पैराएथलीट निहाल सिंह की नियुक्ति में लंबी देरी को गंभीरता से लेते हुए राज्य के आबकारी आयुक्त और वित्त सचिव को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने के आदेश दिए हैं।
जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने दोनों अधिकारियों को 26 नवंबर को दोपहर 2 बजे अदालत में मौजूद रहने और नियुक्ति में देरी से संबंधित संपूर्ण रिकॉर्ड पेश करने के निर्देश दिए।
चयन के बाद भी नियुक्ति नहीं मिली
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता तनवीर अहमद ने अदालत को बताया कि निहाल सिंह, 26 वर्षीय अंतरराष्ट्रीय पैरा शूटर, 41% लोकोमोटर दिव्यांगता के बावजूद पेरिस पैरालंपिक्स 2024, एशियन पैरा गेम्स 2023 सहित कई वर्ल्ड पैरा शूटिंग चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
वह अब तक 20 से अधिक अंतरराष्ट्रीय पदक—जिनमें वर्ल्ड चैंपियनशिप गोल्ड भी शामिल है—जीत चुके हैं।
अदालत को बताया गया कि युवा एवं खेल विभाग ने निहाल को वर्ष 2017 के ‘आउट-ऑफ-टर्न अपॉइंटमेंट टू स्पोर्ट्स मेडल विनर्स नियम’ के तहत कैटेगरी A में चयनित किया था।
इसी के आधार पर 29 सितंबर 2023 को उनकी नियुक्ति सहायक आबकारी अधिकारी (प्रिवेंटिव) पद पर करने की अनुशंसा आबकारी विभाग को भेजी गई।
नियमों के अनुसार, यदि उस समय कोई रिक्ति उपलब्ध न हो, तो पद का डीम्ड क्रियेशन अनिवार्य था।
इसके बावजूद 21 माह बीत जाने के बाद भी आबकारी विभाग ने नियुक्ति आदेश जारी नहीं किए।
दिव्यांग आयोग के आदेश की भी अवहेलना
अदालत को यह भी बताया गया कि आबकारी विभाग ने स्वयं राज्य दिव्यांग आयोग के समक्ष स्वीकार किया था कि पिछले 3 वर्षों से दिव्यांगजनों के लिए पदों की पहचान की प्रक्रिया प्रारंभ ही नहीं की गई—जो RPwD Act, 2016 की धारा 33 व 34 और राजस्थान नियम 2018 के नियम 5 व 6 का स्पष्ट उल्लंघन है।
निहाल की शिकायत पर राज्य दिव्यांग आयुक्त ने 12 नवंबर 2024 को विस्तृत आदेश पारित करते हुए तत्काल नियुक्ति देने और पदों की पहचान प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए थे।
लेकिन न तो नियुक्ति दी गई, और न ही आदेश की पालना की गई।
भेदभावपूर्ण रवैया बताया
अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि इसी नियम के तहत अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी अवनि लेखरा, सुंदर गुर्जर, और देवेन्द्र झाझड़िया को ACF पद पर नियुक्ति दी जा चुकी है—जबकि वह पद भी नियुक्ति के समय PwD के लिए पहचाना हुआ नहीं था।
इस आधार पर निहाल के प्रति विभाग का रवैया भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताया गया।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
रिकॉर्ड व बहस सुनने के बाद जस्टिस अशोक कुमार जैन ने माना कि प्रशासनिक उदासीनता के कारण याचिकाकर्ता को गंभीर अन्याय, आर्थिक नुकसान और मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा है।
अदालत ने कहा कि नियम स्पष्ट होने और दिव्यांग आयोग के आदेश मौजूद होने के बावजूद नियुक्ति में देरी गैरकानूनी और अनुचित प्रतीत होती है।
अंत में हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि आबकारी आयुक्त और वित्त सचिव व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह स्पष्ट करें कि एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी को अब तक नियुक्ति क्यों नहीं दी गई।