राजस्थान हाईकोर्ट में पक्षकार के फर्जी हस्ताक्षर से दायर कि गयी याचिका के मामले में हाईकोर्ट ने सख्त आदेश दिया और चेतावनी जारी की हैं.
जयपुर, 18 नवंबर
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक अहम आदेश में कहा है कि अदालत के रिकॉर्ड से छेड़छाड़ किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है और इस प्रकार की हरकत न्यायिक प्रक्रिया में जनता के भरोसे को कमजोर करती है।
जस्टिस अनुप कुमार धंड की एकलपीठ ने फर्जी हस्ताक्षरों के आधार पर दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि इस मामले की विस्तृत जांच जरूरी है और अदालत ऐसे गंभीर मुद्दों पर उदार दृष्टिकोण नहीं अपना सकती।
फर्जी हस्ताक्षर से दायर याचिका
मामला जयपुर के अशोक नगर थाने में अधिवक्ताओं और उनके क्लर्क के खिलाफ दर्ज एफआईआर से जुड़ा है।
कोटा निवासी राकेश जैन ने अशोक नगर थाना, जयपुर साउथ में वर्ष 2024 में धोखाधड़ी, जालसाजी और साजिश की धाराओं में मामला दर्ज कराया था।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि बिना अनुमति के अधिवक्ता ने उनके फर्जी हस्ताक्षर कर राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
कोटा की एक सिविल अदालत में चल रहे पारिवारिक विवाद के मुकदमे में तेजी लाने के उद्देश्य से उनके स्थानीय वकील द्वारा हाईकोर्ट में रिट पिटिशन दायर की गई थी।
हाईकोर्ट से आदेश भी जारी
इस याचिका को राजस्थान हाईकोर्ट ने फरवरी 2024 में निस्तारित करते हुए निचली अदालत को मुकदमे का जल्द निस्तारण करने का आदेश दिया था.
याचिका में शिकायतकर्ता का नाम राजकुमार सेठिया दर्ज था, लेकिन हस्ताक्षर राकेश जैन के थे।
गलती का अहसास होने पर एक क्लैरिफिकेशन आवेदन दायर किया गया, लेकिन उसमें भी खामियां रहने के कारण वह खारिज हो गया।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने धारा 340 CrPC के तहत कार्यवाही की मांग की, जिसे बाद में वापस ले लिया गया और एफआईआर दर्ज करा दी गई।
हाईकोर्ट रजिस्ट्रार की जांच
राजस्थान हाईकोर्ट ने जुलाई 2025 में रजिस्ट्रार (न्यायिक) को मामले की जांच का आदेश दिया।
जांच के दौरान 14 गवाहों के बयान लिए गए, जिनमें वकील, क्लर्क, ओथ कमिश्नर और संबंधित पक्ष शामिल थे।
जांच के बाद रजिस्ट्रार ने पाया कि स्थानीय वकील धमेंद्र कुमार श्रीवास्तव, अधिवक्ता शारदा गुर्जर, एडवोकेट क्लर्क ओमप्रकाश शर्मा और ओथ कमिश्नर सुंदरी देवी ने बिना तथ्यों की जांच किए दस्तावेजों पर गलत हस्ताक्षर स्वीकार किए और सत्यापन किया।
रिपोर्ट में कहा गया कि यह “गंभीर लापरवाही और नियमों का उल्लंघन” है तथा अधिवक्ता-क्लर्क द्वारा सत्यापन करना अत्यंत अनुचित है।
अधिवक्ता न्यायालय के अधिकारी: कोर्ट
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अधिवक्ता न्यायालय के अधिकारी होते हैं और न्याय प्रणाली उन पर गहरे विश्वास पर आधारित रहती है।
कोर्ट ने कहा कि वकीलों या उनके क्लर्कों द्वारा गलत हस्ताक्षर या दस्तावेज दाखिल करना “न्यायपालिका के प्रति गंभीर अवमाननापूर्ण रवैया” है।
जस्टिस अनुप कुमार धंड ने कहा कि यदि ऐसी प्रथाओं को बढ़ावा मिला तो न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा टूट जाएगा।
उन्होंने कहा कि इस चरण पर यह कहना संभव नहीं है कि किसने धोखाधड़ी की, लेकिन इतनी गंभीर गड़बड़ी के बाद एफआईआर को रद्द करना समाज को गलत संदेश देगा।
जांच जारी रखने के निर्देश
हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए जांच अधिकारी (IO) को जांच जारी रखने का आदेश दिया. कोर्ट ने निर्देश दिया कि IO रजिस्ट्रार की रिपोर्ट के आधार पर स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करें।
अदालत ने कहा कि यदि किसी के खिलाफ संज्ञेय अपराध बनता है तो भविष्य की कार्रवाई से पहले BNS की धारा 35 के तहत नोटिस दिया जाए।
यदि पाया जाए कि फरवरी 2024 के आदेश से किसी को हानि नहीं पहुंची, तो IO अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट कर सकता है।
साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच अधिकारी या कोई भी अदालत हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित न हो और कानून के अनुसार स्वतंत्र निर्णय ले।
अधिवक्ताओं और क्लर्कों को चेतावनी
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने फैसले के अंत में अधिवक्ताओं और क्लर्कों को स्पष्ट चेतावनी जारी की।
कोर्ट ने सुझाव दिया कि सिविल, रिट और क्रिमिनल सभी शाखाओं में स्टांप रिपोर्टर सेक्शन में नोटिस चिपकाया जाए, जिसमें यह चेतावनी हो कि—
यदि वकीलों के क्लर्क किसी भी आवेदन, याचिका, हलफनामे या वकालतनामे पर गलत हस्ताक्षर करेंगे तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।
अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था की पवित्रता बनाए रखने के लिए ऐसे सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं।