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आयुर्वेद, यूनानी व होम्योपैथी कम्पाउंडर भर्ती 2013: 12 साल से नियमित नियुक्ति की उम्मीद लगाए बैठे अभ्यर्थियों को हाईकोर्ट से बड़ा झटका

HC Upholds Govt’s Decision to Halt 2013 Compounder Appointments

हाईकोर्ट ने कहा पदों पर नियुक्ति रोकना राज्य सरकार का नीतिगत और तार्किक निर्णय, चयन सूची में नाम आने से नियुक्ति का कानूनी अधिकार नहीं

जोधपुर, 21 नवंबर

आयुर्वेद, यूनानी व होम्योपैथी कम्पाउंडर भर्ती–2013 में 12 साल से नियमित नियुक्ति की उम्मीद लगाए बैठे अभ्यर्थियों को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है।

राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में आयुर्वेद, यूनानी व होम्योपैथी कम्पाउंडर/नर्स ग्रेड जूनियर भर्ती–2013 में राज्य सरकार द्वारा शेष पदों पर नियुक्ति रोकने को उचित माना है।

राज्य सरकार ने भर्ती के लिए कुल 1005 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था, लेकिन सरकार ने केवल 313 अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी और शेष पदों को वित्त विभाग की असहमति के कारण एनआरएचएम के माध्यम से संविदा पर भरने का निर्णय लिया था।

जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस बिपिन गुप्ता की खंडपीठ ने भर्ती से संबंधित नियमित नियुक्ति को लेकर दायर सभी विशेष अपीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि चयन सूची में नाम आने मात्र से किसी अभ्यर्थी को नियुक्ति का कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।

सरकार का निर्णय नीतिगत

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने माना कि वित्त विभाग से अनुमोदन न मिलने के कारण शेष पदों पर नियुक्ति रोकना राज्य सरकार का नीतिगत और तार्किक निर्णय है, जिसमें अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यह सर्वविदित है कि सरकार पदों की संख्या घटाने या बढ़ाने का अधिकार रखती है, और इस भर्ती में भी विज्ञापन में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि रिक्त पदों की संख्या परिवर्तनीय होगी।

नियुक्ति की गारंटी नहीं

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी भर्ती में चयन सूची केवल पात्रता का प्रमाण है, नियुक्ति की गारंटी नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार सभी 1005 पदों पर नियुक्ति देने के लिए बाध्य नहीं थी।

कोर्ट ने कहा कि वित्तीय मामलों और नीतिगत निर्णयों में अदालत हस्तक्षेप नहीं करती, जब तक निर्णय मनमाना या अवैध न हो।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में सरकार का निर्णय तार्किक, रिकॉर्ड-आधारित और विधिसम्मत है।

1005 में से 313 पदों पर नियुक्ति

राज्य सरकार ने 7 जून 2013 को विज्ञापन जारी कर कुल 1005 पदों पर कम्पाउंडर/नर्स ग्रेड जूनियर की भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी। चयन प्रक्रिया पूरी होने पर चयन सूची में अपीलकर्ताओं के नाम भी शामिल थे।

लेकिन सरकार ने इनमें से केवल 313 अभ्यर्थियों को ही नियुक्ति दी और शेष पदों को वित्त विभाग की मंजूरी न मिलने के कारण एनआरएचएम (NRHM) के माध्यम से संविदा पर भरने का निर्णय लिया।

रतन लाल पूर्बिया व अन्य अभ्यर्थियों ने सरकार के इस निर्णय को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की.

पहले एकलपीठ में और फिर समीक्षा याचिका में भी, दोनों ही खारिज होने के बाद मामला विशेष अपील में पहुंचा।

हाईकोर्ट की एकलपीठ ने सरकार के फैसले पर सहमति जताई, जिसके बाद एकलपीठ के आदेश और उसके बाद की रिव्यू याचिका को चुनौती देते हुए अपील दायर की।

अभ्यर्थियों की दलील

हाईकोर्ट में अपील दायर कर अभ्यर्थियों ने दलील दी कि सरकार ने कुल 1005 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था।

चयन सूची में नाम जारी होने के बाद नियुक्ति देना आवश्यक है।

अधिवक्ता ने दलील दी कि वित्त विभाग की असहमति का कोई औचित्य नहीं है और नियुक्ति रोकना नियमों के विरुद्ध है।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता एन.एस. राजपुरोहित ने कहा कि सभी पदों को नियमित रूप से भरने से भारी वित्तीय भार पड़ता है.

बजट, प्रशासनिक आवश्यकताओं और पद उपयोगिता को देखते हुए ही यह निर्णय लिया गया. वित्तीय एवं नीतिगत निर्णयों के चलते केवल 313 पदों पर नियुक्ति देना ही उचित समझा गया.

राज्य ने कहा कि विभागीय स्तर पर विस्तृत समीक्षा के बाद ही ऐसा निर्णय लिया गया और यह पूरी तरह नीतिगत है.

हाईकोर्ट का आदेश

सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद खंडपीठ ने एकलपीठ के फैसले पर मुहर लगाते हुए सरकार के निर्णय को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएँ खारिज कर दीं।

खंडपीठ ने कहा चयन सूची में नाम नियुक्ति का अधिकार नहीं देता. कोर्ट ने दोहराया कि चयन सूची केवल पात्रता का प्रमाण है, न कि नियुक्ति की गारंटीण्

सरकार का निर्णय नीतिगत, तार्किक और वित्तीय पहलुओं पर आधारित हैं कोर्ट ने कहा कि जब निर्णय वित्तीय नीति पर आधारित हो और विवेकपूर्ण हो, तो अदालत आमतौर पर उसमें हस्तक्षेप नहीं करती.

कोर्ट ने कहा कि विज्ञापन में पहले से ही लिखा था – पदों की संख्या बढ़/घट सकती है, इसलिए 1005 पदों पर नियुक्ति को बाध्यकारी नहीं माना जा सकता

हाईकोर्ट ने कहा कि 313 नियुक्तियों पर सरकार का निर्णय सही क्योंकि वित्त विभाग की असहमति के चलते शेष पदों पर नियुक्ति न देना कारणयुक्त और विधिसम्मत है।

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