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मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, प्रेस की आज़ादी का अर्थ यह नहीं कि उसे कानून से ऊपर समझा जाए -पत्रकार पर आरोप लगे हैं, तो जांच ज़रूरी, मीडिया हाउस भी पत्रकारिता के मूल सिंद्धांतो का पालन करें- Rajasthan High court

Rajasthan High Court on Media Ethics: Press Freedom Does Not Mean Freedom Above Law, FIR Against Journalist Ashish Dave Not Quashed

Zee Media की ओर से राजस्थान के पूर्व चैनल हेड आशीष दवे के खिलाफ दर्ज कराई गई एफआईआर को रद्द करने से हाईकोर्ट ने किया इंकार

जयपुर, 26 नवंबर
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने मीडिया जगत से जुड़े एक अहम मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि उसे कानून से ऊपर समझा जाए। यदि किसी पत्रकार पर आपराधिक आरोप लगे हैं, तो जांच आवश्यक है।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा है कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ “सत्य, निष्पक्षता और जिम्मेदारी” के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत एफआईआर दर्ज होने के बाद “मिनी ट्रायल” नहीं कर सकती; यह जांच एजेंसी का काम है कि आरोप सही हैं या नहीं।

यह रिपोर्टेबल जजमेंट राजधानी जयपुर में ज़ी मीडिया की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर से जुड़े मामले में दिया गया है।

ज़ी मीडिया कंपनी ने अपने पूर्व चैनल हेड (Zee Rajasthan Zee 24 Ghanta) रहे आशीष दवे के खिलाफ जयपुर के अशोक नगर थाने में मामला दर्ज कराया था। कंपनी ने आरोप लगाया था कि दवे ने अपने पद का दुरुपयोग कर बाहरी व्यक्तियों पर दबाव बनाया और चैनल के नाम पर ब्लैकमेलिंग जैसी गतिविधियाँ कीं।

शिकायत में कहा गया था कि दवे ने “नकारात्मक खबरें प्रसारित करने की धमकी” देकर विभिन्न संस्थानों से रकम मांगी और चैनल के नाम का अनुचित उपयोग किया।

मीडिया जनता की आवाज़, लेकिन

जस्टिस अनुप कुमार ढंड की एकलपीठ ने अपने 22 पेज के रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और उसे आजादी मिली हुई हैं.

हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि “मीडिया जनता की आवाज़ है, लेकिन यह अधिकार जिम्मेदारी के साथ आता है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने कहा कि लेकिन प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि उसे कानून से ऊपर समझा जाए; यदि किसी पत्रकार पर आपराधिक आरोप लगे हैं, तो जांच आवश्यक है.

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर प्रा. लि. बनाम महाराष्ट्र राज्य, कप्तान सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए कहा कि एफआईआर तभी रद्द हो सकती है जब उसमें कोई अपराध न बनता हो या मामला पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण हो.

हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोप संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं इसलिए जांच एजेंसी को जांच जारी रखने की अनुमति दी जाती है.

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पूर्व चैनल हैड को यह छूट दी हैं कि जांच की निष्पक्षता पर संदेह है, तो वे संबंधित जांच अधिकारी को प्रतिनिधित्व दे सकते हैं.

शक्ति के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ​देश में वर्तमान में मीडिया की अहम जिम्मेदारी और भूमिका को लेकर भी बड़ी बात कही हैं.

हाइकोर्ट ने कहा कि भारत में मीडिया का प्रभाव बहुत व्यापक है — यह सामाजिक मुद्दों को सामने लाता है, समस्याओं को उजागर करता है और कई बार सरकार की नीतिगत निर्णय प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है.

मीडिया, चाहे इलेक्ट्रॉनिक हो या प्रिंट, सामान्यतः लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। मीडिया अपने सभी रूपों में जनता को जागरूक और सूचित रखने का गंभीर दायित्व निभाता है.

कोर्ट ने कहा कि इसका प्रभाव दूरगामी होता है — यह केवल लोगों तक शारीरिक रूप से नहीं पहुँचता, बल्कि उनके विचारों और मानसिकता को भी प्रभावित करता है।

मीडिया गलत या पक्षपाती, अप्रमाणित जानकारी ना दे

हाईकोर्ट ने कहा कि इतनी बड़ी शक्ति के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी आती है. मीडिया के पास सूचना की विशाल मात्रा होती है, इसलिए यह उसकी जिम्मेदारी है कि वह जनता को कोई भी तथ्यात्मक रूप से गलत, पक्षपाती या अप्रमाणित जानकारी न दे.

मीडिया पेशेवरों से अपेक्षा की जाती है कि वे किसी को धमकी, भय या जबरन वसूली जैसे तरीकों से नुकसान न पहुँचाएँ। इसमें यह भी शामिल है कि वे ऐसा कोई सामग्री प्रकाशित या प्रसारित न करें जो उत्पीड़न या मानहानि का कारण बने.

मीडिया हाउस पत्रकारिता के मूल सिंद्धांतो का पालन करें

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने इस रिपोर्टेबल जजमेंट में देश के मीडिया पेशेवरों, मीडिया संस्थानों और संगठनों को संबोधित करते हुए कहा हैं कि उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों — सत्य, सटीकता और निष्पक्षता — का पालन करें.

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि उन्हें गलत रिपोर्टिंग के भय या दबाव से किसी को धमकाकर कुछ भी प्राप्त करने का प्रयास नहीं करना चाहिए.

कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने से जनता का भरोसा बनता है और मीडिया अपने द्वारा प्रसारित सूचना के लिए जवाबदेह रहता है.

जनता की आवाज़

जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने कहा कि मीडिया को “जनता की आवाज़” कहा जाता है क्योंकि यह नागरिकों को अपनी राय, विचार और चिंताओं को सरकार तथा आम जनता तक पहुँचाने का एक मंच प्रदान करता है.

हाईकोर्ट ने कहा कि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है और यह देश के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

”इसलिए यह कहना उचित है कि स्वतंत्र प्रेस किसी भी लोकतंत्र के अस्तित्व, विकास और सुशासन की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए अनिवार्य तत्व है।”

एफआईआर रद्द करने की याचिका

पूर्व चैनल हेड आशीष दवे ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर रद्द करने का अनुरोध किया था।

उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वी. आर. बजवा ने दलील दी कि एफआईआर में कोई स्पष्ट अपराध नहीं बनता और किसी भी तथाकथित “पीड़ित” ने व्यक्तिगत शिकायत दर्ज नहीं कराई है।

अधिवक्ता ने कहा कि “मानहानि” (Defamation) का मामला दंडनीय नहीं बल्कि गैर-संज्ञेय है। कंपनी की “गुडविल” को संपत्ति नहीं माना जा सकता, अतः “धोखाधड़ी” या “आपराधिक विश्वासघात” के प्रावधान इस मामले में लागू नहीं होते।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों — भजनलाल बनाम हरियाणा राज्य और कप्तान सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य — का हवाला देते हुए कहा कि यह एफआईआर “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।

राज्य सरकार का विरोध

मामले में याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद और सरकारी अधिवक्ता राजेश चौधरी ने कहा कि याचिकाकर्ता एक वरिष्ठ पत्रकार और चैनल प्रमुख थे, जिन पर पद के दुरुपयोग के ठोस आरोप हैं।

सरकार ने बताया कि कंपनी को कई शिकायतें मिलीं कि उन्होंने विज्ञापनदाताओं और व्यावसायिक संस्थाओं से धन की मांग कर नकारात्मक खबरें प्रसारित करने की धमकी दी। यह मामला “येलो जर्नलिज्म” और “ब्लैकमेलिंग” की श्रेणी में आता है, जिसकी गहन जांच आवश्यक है।

हाईकोर्ट का आदेश

जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने अपने 22 पेज के रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और उसे मिली स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ आती है।

कोर्ट ने टिप्पणी की —

“मीडिया जनता की आवाज़ है, लेकिन यह अधिकार जिम्मेदारी के साथ आता है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने आगे कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि उसे कानून से ऊपर समझा जाए; यदि किसी पत्रकार पर आपराधिक आरोप लगे हैं, तो जांच आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों – नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर प्रा. लि. बनाम महाराष्ट्र राज्य और कप्तान सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य – का हवाला देते हुए कहा कि एफआईआर तभी रद्द हो सकती है जब उसमें कोई अपराध न बनता हो या मामला पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण हो।

अदालत ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोप संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं, इसलिए जांच एजेंसी को जांच जारी रखने की अनुमति दी जाती है।

साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि यदि उन्हें जांच की निष्पक्षता पर संदेह है, तो वे संबंधित जांच अधिकारी को प्रतिनिधित्व दे सकते हैं।

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