जयपुर, 27 नवंबर
राजस्थान में वकीलों की संस्थाओं के चुनाव लंबे समय तक विवादों, दोहरी सदस्यता, बाहरी दबाव और अनियमितताओं से प्रभावित रहे। चुनावी पारदर्शिता और निष्पक्षता की इस कमी को एक ऐतिहासिक फैसले ने नई दिशा दी—‘वन बार, वन वोट’ ने.
लेकिन इस बदलाव के पीछे बार के ही चार अधिवक्ताओं का निरंतर संघर्ष और दृढ़ता थी.
उनमें से एक बड़ा नाम हैं बलराम जाखड़: वह अधिवक्ता जिनके प्रयासों ने लिखी नई शुरुआत
राजस्थान में ‘वन बार, वन वोट’ व्यवस्था लागू करवाने का श्रेय मुख्य रूप से चार अधिवक्ताओं को जाता हैं उनमें भी बलराम जाखड़ एक मजबूत अधिवक्ता के रूप में सामने आए.
उनकी याचिका, सतत प्रयास, कानूनी लड़ाई और बार राजनीति में शुचिता लाने के संकल्प ने वह बदलाव लाया जिसकी वर्षों से आवश्यकता महसूस की जा रही थी।
बलराम जाखड़ ने अदालत के समक्ष यह मुद्दा उठाया कि—
वकील अनेक बार एसोसिएशनों की सदस्यता लेकर कई जगह वोट डालते थे, इससे चुनावों पर अनावश्यक प्रभाव पड़ता था, समूहबाजी बढ़ती थी और निष्पक्ष चुनाव प्रणाली कमजोर हो रही थी.
उनकी पहल पर दायर याचिका ने राजस्थान हाईकोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए प्रेरित किया और फिर आया वह फैसला जिसने अधिवक्ता राजनीति का स्वरूप बदल दिया।
क्या है ‘वन बार, वन वोट’ का सिद्धांत?
इस सिद्धांत के तहत—
एक वकील केवल एक ही बार एसोसिएशन का सदस्य हो सकता है। उसी एसोसिएशन में उसे मतदान का अधिकार मिलेगा।
दोहरी/तीहरी सदस्यता और अवैध मतदान स्वतः समाप्त हो गया। इस नियम ने मतदाता सूची को साफ किया और चुनावों की गरिमा बढ़ाई।
हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए कि सभी बार एसोसिएशन अपनी सदस्यता सूची अपडेट करें, एक वकील एक समय में केवल एक बार का सदस्य माना जाएगा, इससे चुनावों की पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित होगी.