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बार-बार और असमय तबादले राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मूल उद्देश्यों को कमजोर करते हैं, सत्र के बीच बड़े पैमाने पर तबादले करना अच्छे शासन (Good Governance) के सिद्धांतों के विपरीत है- Rajasthan Highcourtर्ट

Mid-Session Teacher Transfers Undermine Education Policy and Good Governance: Rajasthan High Court
समान मामलो में अलग अलग फैसले को लेकर RAT ट्रिब्यूनल जयपुर के रवैये पर भी हाईकोर्ट सख्त, अध्यक्ष- सदस्यों को ट्रेनिंग देने की सलाह

जयपुर।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शिक्षकों के तबादले शैक्षणिक सत्र के बीच किए जाना न केवल अनुचित है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था और विद्यार्थियों के हितों के प्रतिकूल भी है।

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार और प्रशासन को शैक्षणिक कैलेंडर की पूर्ण जानकारी होने के बावजूद सत्र के बीच बड़े पैमाने पर तबादले करना अच्छे शासन (Good Governance) के सिद्धांतों के विपरीत है।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि शिक्षक केवल एक कर्मचारी नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ होता है, और उसका स्थानांतरण केवल प्रशासनिक सुविधा के आधार पर नहीं, बल्कि छात्रों की शैक्षणिक निरंतरता को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि मध्य सत्र में तबादले से न केवल शिक्षक और उनके परिवार प्रभावित होते हैं, बल्कि हजारों विद्यार्थियों की पढ़ाई भी बाधित होती है।

जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट हरगोविंद मीणा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सामान्यतः ट्रांसफर सेवा की एक शर्त है और अदालतें इसमें हस्तक्षेप नहीं करतीं, लेकिन जब ट्रांसफर मनमाना, भेदभावपूर्ण और अत्यधिक कष्टदायक हो, तब न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।

इस मामले में याचिकाकर्ता शिक्षक को मात्र पाँच माह के भीतर पुनः लगभग 500 किलोमीटर दूर ट्रांसफर किया गया।

ट्रिब्यूनल के फैसले पर सवाल

हाईकोर्ट ने राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण (ट्रिब्यूनल) के रवैये पर भी कड़ी टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा कि समान तथ्यों वाले मामलों में अलग-अलग निर्णय देना न्यायिक निष्पक्षता के विपरीत है।

ट्रिब्यूनल ने कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट के शिल्पी बोस फैसले को नजरअंदाज कर राहत दी, जबकि याचिकाकर्ता के मामले में उसी फैसले के आधार पर राहत से इनकार किया गया, जो स्वीकार्य नहीं है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल जैसे संस्थानों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे समान मामलों में समान दृष्टिकोण अपनाएं, अन्यथा यह न्यायिक असंगति और पक्षपात का आभास देता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि वह ऐसी स्थिति में आंखें मूंदकर नहीं बैठ सकता, जब प्राथमिक न्यायिक मंच ही भेदभावपूर्ण तरीके से निर्णय दे।

शिक्षा नीति का उद्देश्य

अदालत ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता, स्थिरता और निरंतरता सुनिश्चित करना है, लेकिन बार-बार और असमय तबादले इस नीति के मूल उद्देश्यों को कमजोर करते हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि छात्रों के भविष्य से जुड़े मामलों में प्रशासनिक निर्णयों को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ लिया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द करते हुए शिक्षक के तबादले पर रोक लगाई और ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया कि वह अपील का निपटारा निष्पक्षता और मेरिट के आधार पर शीघ्र करे।

ये है मामला

मामला झालावाड़ जिले के सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल गारबोलिया में पदस्थापित प्राचार्य हरगोविंद मीणा से जुड़ा है।

याचिकाकर्ता की नियुक्ति वर्ष 1994 में शिक्षक ग्रेड-III के रूप में हुई थी। क्रमशः पदोन्नत होते हुए वे वर्ष 2022 में प्राचार्य बने।

अप्रैल 2025 में उनका तबादला एक स्कूल से दूसरे स्कूल में किया गया था, लेकिन महज पाँच माह बाद सितंबर 2025 में उन्हें पुनः लगभग 500 किलोमीटर दूर भरतपुर जिले के वीरमपुरा स्थित स्कूल में स्थानांतरित कर दिया गया।

इस आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने पहले ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया, जहां उनकी अंतरिम राहत याचिका खारिज कर दी गई।

याचिका में दलीलें

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि ट्रिब्यूनल ने समान परिस्थितियों वाले अन्य मामलों में तबादलों पर रोक लगाई है, लेकिन उनके मामले में सुप्रीम कोर्ट के शिल्पी बोस बनाम राज्य फैसले का हवाला देकर राहत से इनकार किया गया।

इसे भेदभावपूर्ण और मनमाना रवैया बताते हुए न्यायिक असंगति का आरोप लगाया गया।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि ट्रिब्यूनल ने एक ही दिन और लगभग समान तथ्यों वाले मामलों में अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाया।

कुछ मामलों में शिल्पी बोस के सिद्धांत को नजरअंदाज कर तबादलों पर रोक दी गई, जबकि याचिकाकर्ता के मामले में उसी फैसले के आधार पर राहत से इनकार कर दिया गया।

अदालत ने इस रवैये को गंभीर मानते हुए कहा कि समान परिस्थितियों में समान निर्णय न देना न्यायिक निष्पक्षता के विपरीत है।

शिक्षा व्यवस्था पर प्रभाव

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राजस्थान में शैक्षणिक सत्र जुलाई से अप्रैल तक चलता है और इस दौरान अगस्त–सितंबर में आंतरिक परीक्षाएं, नवंबर में अर्धवार्षिक परीक्षाएं तथा फरवरी–मार्च में वार्षिक परीक्षाएं होती हैं।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे समय में शिक्षकों, विशेष रूप से प्राचार्यों के तबादले से पूरे शैक्षणिक माहौल पर नकारात्मक असर पड़ता है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सितंबर 2025 में राज्य में 4,527 प्राचार्यों के सामूहिक तबादले किए गए, जिससे न केवल हजारों शिक्षक प्रभावित हुए, बल्कि उतने ही स्कूलों और विद्यार्थियों की पढ़ाई भी बाधित हुई।

आदेश पर रोक

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ट्रिब्यूनल के 4 नवंबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए तबादला आदेश और उससे संबंधित कार्यमुक्ति आदेश पर अंतिम निर्णय तक रोक लगा दी।

हाईकोर्ट ने साथ ही ट्रिब्यूनल को आदेश दिया कि वह याचिका का निस्तारण दो माह के भीतर गुण-दोष के आधार पर करे।

हाईकोर्ट ने कार्मिक विभाग से यह अपेक्षा जताई कि ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और सदस्यों को उचित प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि भविष्य में समान मामलों में एकरूपता और निष्पक्षता बनी रहे।

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