जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील और मानवीय फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि गरीबी कोई अपराध नहीं है और किसी कैदी की आर्थिक अक्षमता को उसके पैरोल के संवैधानिक अधिकार के आड़े नहीं आने दिया जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी कैदी की गरीबी और जमानतदार (श्योरिटी) देने में असमर्थता पहले ही प्रमाणित हो चुकी हो, तो बार-बार उसी शर्त को थोपना कानून की अवहेलना, संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन और प्रशासनिक असंवेदनशीलता का परिचायक है।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस फरजंद अली की खंडपीठ ने ऐतिहासिक और रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए आजीवन कारावास की सजा काट रहे पाली जिले के कैदी खरताराम की याचिका पर यह फैसला सुनाया।
हाईकोर्ट ने खरताराम को न केवल जमानतदार की शर्त से मुक्त करते हुए पैरोल पर रिहा करने का आदेश दिया, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों में पालन के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश (Guidelines) भी जारी किए हैं।
चार बार कोर्ट का दरवाजा, वजह सिर्फ गरीबी
याचिकाकर्ता खरताराम हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद वर्ष 2014 से केंद्रीय कारागार, जोधपुर में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है।
अब तक वह 14 वर्ष 6 माह से अधिक की सजा (रिमिशन सहित) काट चुका है।
खास बात यह है कि इससे पहले वह तीन बार पैरोल पर रिहा हो चुका है—
पहली बार 2019 में 20 दिन, दूसरी बार 2020 में 30 दिन और तीसरी बार 2022 में 40 दिन।
इन तीनों ही अवसरों पर राजस्थान हाईकोर्ट ने उसकी गरीबी को देखते हुए जमानतदार की शर्त माफ कर दी थी और उसे केवल व्यक्तिगत बांड पर रिहा किया गया था।
फिर लगा दी शर्त
चौथी बार, वर्ष 2025 में, जिला पैरोल सलाहकार समिति ने 40 दिन की पैरोल स्वीकृत तो कर दी, लेकिन फिर से दो जमानतदार ₹25,000-₹25,000 के देने की शर्त लगा दी।
खरताराम इस शर्त को पूरा करने में असमर्थ था और मजबूर होकर उसने फिर से हाईकोर्ट को जेल से पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई। कैदी खरताराम के इस पत्र को हाईकोर्ट ने याचिका के रूप में स्वीकार किया।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी: मशीनी रवैया बर्दाश्त नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि यह बेहद चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब तीन बार अदालत जमानतदार की शर्त माफ कर चुकी है, तब भी चौथी बार वही शर्त मशीनी तरीके से दोहराई गई। कोर्ट ने इसे कानून के शासन (Rule of Law) के प्रति गंभीर उदासीनता बताया।
हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल सुधारात्मक और पुनर्वासात्मक प्रक्रिया का हिस्सा है, न कि कोई कृपा या दया।
यदि किसी गरीब कैदी के लिए पैरोल स्वीकृत होने के बावजूद ऐसी शर्तें लगा दी जाएं, जिन्हें वह पूरा ही नहीं कर सकता, तो यह व्यावहारिक रूप से पैरोल से इनकार करने के समान है।
पैरोल पर कानून और संवैधानिक दृष्टिकोण
हाईकोर्ट ने राजस्थान प्रिजनर्स रिलीज ऑन पैरोल रूल्स, 2021 का हवाला देते हुए कहा कि इन नियमों का उद्देश्य कैदियों के सदाचार को प्रोत्साहित करना, उनके परिवार और समाज से संबंध बनाए रखना और उन्हें समाज में पुनः समाहित करना है।
अदालत ने कहा कि पैरोल की शर्तें उचित, न्यायसंगत और युक्तिसंगत होनी चाहिए। अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) के तहत कैदी भी अपने मौलिक अधिकारों से पूरी तरह वंचित नहीं होते।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानतदार केवल यह सुनिश्चित करने का साधन है कि कैदी पैरोल अवधि पूरी होने पर जेल लौट आए—यह कोई लक्ष्य नहीं है। यदि साधन ही लक्ष्य को नष्ट कर दे, तो वह असंवैधानिक हो जाता है।
‘गरीबी अपराध नहीं’-गुजरात हाईकोर्ट का हवाला
राजस्थान हाईकोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के फुल बेंच के ऐतिहासिक फैसले नटिया जिरिया बनाम गुजरात राज्य का हवाला देते हुए कहा—
“गरीबी कोई अपराध नहीं है। यदि किसी व्यक्ति की गरीबी पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है, तो प्राधिकारी केवल अनुमति ही नहीं, बल्कि बाध्य है कि उसे व्यक्तिगत बांड पर रिहा करे।”
कोर्ट ने कहा कि मात्र ₹100 की जमानत भी कई गरीबों के लिए असमर्थनीय हो सकती है। ऐसे में गरीबी को पैरोल से वंचित करने का आधार बनाना संवैधानिक अन्याय है।
खरताराम के मामले में आदेश
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता खरताराम को बड़ी राहत देते हुए आदेश दिया कि उसे ₹50,000 के व्यक्तिगत बांड पर 40 दिन की स्वीकृत पैरोल पर तुरंत रिहा किया जाए।
हाईकोर्ट ने पैरोल कमेटी द्वारा लगाई गई दो जमानतदारों की शर्त पूरी तरह माफ करने के आदेश दिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि बार-बार ऐसी शर्तें लगाना न केवल कैदी का अपमान है, बल्कि उसकी मानवीय गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है।
भविष्य के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश
इस फैसले को केवल एक व्यक्ति तक सीमित न रखते हुए हाईकोर्ट ने सभी प्रशासनिक अधिकारियों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए।
हाईकोर्ट ने कहा है कि व्यक्तिगत बांड की राशि कैदी की आर्थिक स्थिति के अनुरूप होनी चाहिए, न कि दमनकारी।
यदि प्रथम पैरोल के समय कैदी गरीब पाया जाए, तो जमानतदार की शर्त न लगाई जाए।
यदि पहले किसी अवसर पर जमानतदार की शर्त माफ की जा चुकी है, तो आगे भी वही नीति अपनाई जाए, जब तक परिस्थितियां न बदलें।
ऐसे मामलों की जानकारी राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को दी जाए, ताकि भविष्य में गरीब कैदियों को स्वतः विधिक सहायता मिल सके।
इन निर्देशों को कोर्ट ने अनिवार्य बताते हुए कहा कि इनका पालन न करना न्यायिक अवमानना की श्रेणी में आ सकता है।