जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने राजस्थान विश्वविद्यालय की VC अल्पना कटेजा की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ता की बोना फाइड्स (निष्कपट मंशा) पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने कुलपति के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के लिए 5 लाख रुपये की शर्त रखी है।
एकलपीठ ने याचिकाकर्ता प्रोफेसर महिपाल सिंह सिहाग को सात दिन के भीतर 5 लाख रुपये की लागत राजस्थान हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष जमा कराने के आदेश दिए हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि राशि एक सप्ताह में हाईकोर्ट रजिस्ट्रार के समक्ष जमा नहीं की जाती है, तो याचिका स्वतः खारिज मानी जाएगी।
हाईकोर्ट ने इस मामले में निजी उपयोग को लेकर जनहित याचिका दायर करने पर सवाल खड़ा किया है।
कोर्ट ने कहा कि जनहित याचिका के नाम पर दाखिल याचिकाओं का उपयोग यदि निजी दुर्भावना, उत्पीड़न या प्रचार के लिए किया जा रहा हो, तो उसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
ये है पूरा मामला
प्रोफेसर महिपाल सिंह सिहाग ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर राजस्थान विश्वविद्यालय की कुलगुरु अल्पना कटेजा की नियुक्ति को चुनौती दी।
याचिका में क्वो वारंटो (Quo Warranto) की मांग की गई थी, जिसमें यह अनुरोध किया गया कि अदालत यह जांच करे कि संबंधित अधिकारी किस अधिकार से उस पद पर आसीन हैं।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि कुलगुरु की नियुक्ति के समय उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की जानकारी छुपाई गई, जिससे वे इस पद के लिए अयोग्य हो जाती हैं।
याचिका में अल्पना कटेजा के नियुक्ति आदेश दिनांक 25 सितंबर 2023 को शून्य और अमान्य घोषित करने की भी मांग की गई।
राज्य सरकार और विश्वविद्यालय की दलीलें
राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद ने मामले की सुनवाई के दौरान जनहित याचिका को लेकर विरोध किया।
मामले में कुलगुरु अल्पना कटेजा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर. एन. माथुर तथा विश्वविद्यालय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ए. के. शर्मा ने पैरवी की।
प्रतिवादियों की ओर से कोर्ट में कहा गया कि याचिकाकर्ता एक क्रॉनिक लिटिगेंट (आदतन मुकदमेबाज़) हैं, जो लगातार विश्वविद्यालय और उसके अधिकारियों के खिलाफ मुकदमे दायर करते रहे हैं।
सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि पिछले तीन वर्षों में याचिकाकर्ता ने 28 से अधिक रिट और आपराधिक याचिकाएँ दायर की हैं, जिनका उद्देश्य प्रशासन को परेशान करना और निजी प्रतिशोध निकालना प्रतीत होता है।
आपराधिक मामलों का भी हवाला
सुनवाई के दौरान सरकार और अल्पना कटेजा की ओर से कोर्ट में कहा गया कि याचिकाकर्ता स्वयं कई आपराधिक मामलों में आरोपी हैं। कुछ मामलों में उन्हें सजा भी हो चुकी है, जबकि कई मुकदमे अभी विचाराधीन हैं।
याचिकाकर्ता के खिलाफ चोमू और जयपुर मेट्रो क्षेत्र की विभिन्न अदालतों में दर्ज आपराधिक मुकदमों की जानकारी दी गई।
सरकार और कुलगुरु की ओर से दलील दी गई कि ऐसे व्यक्ति द्वारा नैतिकता और पारदर्शिता के आधार पर किसी संवैधानिक पदाधिकारी की नियुक्ति को चुनौती देना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
नियुक्ति के 2 साल बाद याचिका
हाईकोर्ट में यह भी दलील दी गई कि कुलगुरु की नियुक्ति के जिस आदेश को चुनौती दी गई है, वह सितंबर 2023 का है, जबकि याचिका लगभग दो वर्ष की देरी से दायर की गई।
याचिका में न तो देरी का कोई संतोषजनक कारण बताया गया और न ही देरी माफी का अनुरोध किया गया है।
अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने ही खिलाफ चल रहे मामलों और विश्वविद्यालय से जुड़े पूर्व विवादों को याचिका में उजागर नहीं किया।
आरोपों को बताया निराधार
अल्पना कटेजा के अधिवक्ता ने अदालत में कहा कि जिन आपराधिक मामलों का हवाला देकर कुलगुरु को अयोग्य ठहराने का प्रयास किया गया, उनमें या तो अदालत द्वारा संज्ञान नहीं लिया गया था या फिर संबंधित घटनाएँ नियुक्ति प्रक्रिया से पूर्व की थीं अथवा उनके संज्ञान में नहीं थीं।
एक मामले में तो 400 से अधिक लोगों को आरोपी बनाया गया था, जिसे अदालत ने पूरी तरह निराधार मानते हुए खारिज कर दिया था। ऐसे में तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना अदालत को गुमराह करने का प्रयास माना गया।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले डॉ. प्रेमचंद्रन कीझोथ बनाम चांसलर, कानपुर विश्वविद्यालय (AIR 2024 SC 135) का हवाला देते हुए कहा कि क्वो वारंटो की रिट केवल उन्हीं मामलों में जारी की जा सकती है, जहां नियुक्त व्यक्ति वैधानिक योग्यता नहीं रखता हो या नियुक्ति स्पष्ट रूप से कानून या नियमों के विपरीत हो।
एकलपीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में याचिका का जनहित में और bona fide होना आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता की मंशा संदिग्ध हो और याचिका निजी दुर्भावना से प्रेरित हो, तो ऐसी याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।
5 लाख रुपये की लागत क्यों?
हाईकोर्ट ने कहा कि मामले के तथ्यों, याचिकाकर्ता के आचरण और बार-बार मुकदमेबाज़ी को देखते हुए यह आवश्यक है कि याचिकाकर्ता पहले अपनी बोना फाइड्स साबित करे। इसी उद्देश्य से 5 लाख रुपये की लागत जमा कराने का निर्देश दिया गया।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह राशि दंड नहीं बल्कि एक फिल्टर के रूप में है, ताकि कोर्ट का समय वास्तविक और गंभीर मामलों में ही व्यय हो।