“जब पिता ही अपनी बेटी का शोषण करे, तो यह केवल एक अपराध नहीं बल्कि परिवार को सुरक्षित स्थान मानने की अवधारणा पर सीधा हमला है। यह अपराध सामान्य आपराधिकता से ऊपर है।”
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील और समाज को झकझोर देने वाले मामले में बड़ा और सख्त फैसला सुनाते हुए कहा है कि पिता द्वारा अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ किया गया बलात्कार आम अपराध से कहीं ऊपर का जघन्य अपराध है, जो पारिवारिक विश्वास, सामाजिक नैतिकता और मानवीय मूल्यों को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता-बेटी की भरोसेमंद गवाही ही दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है, और इसके लिए अतिरिक्त corroboration की अनिवार्यता नहीं है।
हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ में जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा शामिल आरोपी पिता मनोज की ओर से दायर अपील पर रिपोर्टेबल और ऐतिहासिक फैसला सुनाया हैं.
हाईकोर्ट ने आरोपी पिता के खिलाफ विशेष पोक्सो न्यायालय, डूंगरपुर द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए आरोपी पिता की अपील को खारिज कर दिया।
गंभीर, घृणित और अमानवीय
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब अपराधी वही व्यक्ति हो, जिस पर बच्चे की सुरक्षा और संरक्षण की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है, तब यह अपराध न केवल कानून के विरुद्ध बल्कि मानवीय मूल्यों और पारिवारिक विश्वास की जड़ों पर प्रहार करता है।
जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि यह अपराध गंभीर, घृणित और अमानवीय हैं.
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि
“जब पिता ही अपनी बेटी का शोषण करे, तो यह केवल एक अपराध नहीं बल्कि परिवार को सुरक्षित स्थान मानने की अवधारणा पर सीधा हमला है। यह अपराध सामान्य आपराधिकता से ऊपर है।”
रक्षाबंधन के दिन दुष्कर्म
डूंगरपुर जिले के वरदा थाना क्षेत्र में अगस्त 2022 में पीड़िता की मां रक्षाबंधन के अवसर पर अपने मायके गई हुई थी।
इसी दौरान आरोपी पिता ने घर में अकेली मौजूद अपनी नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म किया। बाद में पीड़िता ने रोते हुए अपनी मां को पूरी आपबीती बताई।
पीड़िता ने यह भी खुलासा किया कि यह कोई एक बार की घटना नहीं थी, बल्कि इससे पहले भी आरोपी ने उसकी मां की सर्जरी के दौरान इस तरह की हरकतें की थीं और उसे धमकाकर चुप रहने को मजबूर किया था।
सामाजिक डर, पारिवारिक दबाव और मानसिक आघात के कारण रिपोर्ट दर्ज कराने में कुछ देरी हुई, जिसे अदालत ने पूरी तरह स्वाभाविक और न्यायोचित माना।
ट्रायल कोर्ट का फैसला
विशेष पोक्सो अदालत, डूंगरपुर ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2), 376AB तथा पोक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए कठोरतम सजा सुनाई थी।
इसके खिलाफ आरोपी ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की।
अपील में दलीले
हाईकोर्ट में दायर कि गयी अपील में आरोपी की ओर से यह तर्क दिया गया कि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद था.
आरोपी ने इस मामले में डीएनए और एफएसएल रिपोर्ट नकारात्मक होने की बात कही.
बचाव पक्ष में कहा गया कि पीड़िता और उसकी मां की गवाही झूठी और प्रेरित है
पीड़िता की गवाही “सबसे मजबूत साक्ष्य”
हाईकोर्ट ने बहस सुनने के बाद कि पीड़िता की गवाही स्वाभाविक, सुसंगत और विश्वसनीय है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नाबालिग होने के बावजूद पीड़िता ने बिना किसी विरोधाभास के घटना का स्पष्ट विवरण दिया और उसकी गवाही में किसी प्रकार की बनावट या अतिशयोक्ति नहीं पाई गई।
कोर्ट ने कहा
“जब पीड़िता स्वयं अपने पिता के खिलाफ बयान दे रही है, तो यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि वह किसी झूठे आरोप के लिए ऐसा करेगी।”
कोर्ट ने यह भी माना कि ऐसे मामलों में केवल पीड़िता की गवाही ही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त हो सकती है, यदि वह भरोसेमंद हो।
डीएनए रिपोर्ट नकारात्मक
आरोपी ने डीएनए रिपोर्ट नकारात्मक होने को अपने पक्ष में प्रमुख आधार बताया, लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर यौन अपराध में डीएनए साक्ष्य का मिलना अनिवार्य नहीं है।
विशेषकर जब पीड़िता की गवाही, मेडिकल रिपोर्ट और परिस्थितिजन्य साक्ष्य एक-दूसरे की पुष्टि कर रहे हों।
मेडिकल जांच में पीड़िता के साथ यौन शोषण की पुष्टि हुई थी, जिसे अदालत ने महत्वपूर्ण सहायक साक्ष्य माना।
सहमति का सवाल ही नहीं
हाईकोर्ट ने सहमति के बिंदू पर दो टूक कहा कि पीड़िता 12 वर्ष से कम आयु की थी, ऐसे में सहमति का प्रश्न ही नहीं उठता।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114-A और पोक्सो अधिनियम की धारा 29 के तहत आरोपी के खिलाफ कानूनी अनुमान (presumption of guilt) स्वतः लागू होता है, जिसे आरोपी खंडित करने में पूरी तरह असफल रहा।
हाईकोर्ट ने कहा कि “यह अपराध परिवार की अवधारणा को ही तोड़ देता है”
“जब पिता ही अपनी बेटी का शोषण करे, तो यह केवल एक अपराध नहीं बल्कि परिवार को सुरक्षित स्थान मानने की अवधारणा पर सीधा हमला है। यह अपराध सामान्य आपराधिकता से ऊपर है।”
कोर्ट ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की नरमी न्याय के साथ विश्वासघात होगी।
पीड़िता को मुआवजा देने के निर्देश
हाईकोर्ट ने आरोपी पिता की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया कि पीड़िता को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) की योजना के तहत 7 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि न्याय केवल सजा तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पीड़िता के पुनर्वास और सम्मान की भी जिम्मेदारी राज्य की है।
Case Status
HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN AT JODHPUR
D.B. Criminal Appeal (DB) No. 41/2023
Manoj Versus State Of Rajasthan,
Reportable Judgment 08/01/2026
HON’BLE MR. JUSTICE VINIT KUMAR MATHUR
HON’BLE MR. JUSTICE CHANDRA SHEKHAR SHARMA