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“नीति परिवर्तन” या “प्रशासनिक सुविधा” के नाम पर वादा कर तोड़ नहीं सकते सरकारी संस्थान – राजस्थान हाईकोर्ट

“Policy Change” Cannot Justify Breaking Promises, Says Rajasthan High Court; RIICO Told to Execute Lease Deed

25 साल पुराने भूमि आवंटन विवाद में राजस्थान हाईकोर्ट से रीको को बड़ा झटका, निलामी से आवंटित भूमि को रद्द करने पर फटकार

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम लिमिटेड (RIICO) को एक लंबे समय से लंबित भूमि आवंटन विवाद में बड़ा झटका देते हुए उसकी दोनों विशेष अपीलों को खारिज कर दिया है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि RIICO अपने ही वादे से पीछे नहीं हट सकता और उसे आवंटी के पक्ष में बिना किसी और देरी के लीज डीड निष्पादित करनी होगी।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राज्य या उसके उपक्रम भी कानून और अपने ही वादों से ऊपर नहीं हो सकते।

हाईकोर्ट ने कहा कि

जब कोई सरकारी संस्था स्पष्ट आश्वासन देकर किसी नागरिक को कानूनी कार्यवाही वापस लेने के लिए प्रेरित करती है, तो बाद में उससे मुकरना न केवल अनुचित बल्कि न्याय के मूल सिद्धांतों के भी विपरीत है।

हाईकोर्ट ने कहा कि

सार्वजनिक संस्थाओं को “नीति परिवर्तन” या “प्रशासनिक सुविधा” के नाम पर अपने पूर्व निर्णयों से पलटने की अनुमति नहीं दी जा सकती, विशेषकर तब जब दूसरा पक्ष वर्षों से आर्थिक और कानूनी नुकसान झेल चुका हो।

25 साल से जारी विवाद

मामला वर्ष 2001 में जयपुर जिले के आमेर तहसील स्थित अकेरा डूंगर क्षेत्र की लगभग 13 एकड़ भूमि के आवंटन से जुड़ा है।

RIICO द्वारा इस भूमि के लिए औद्योगिक और गैर-औद्योगिक प्रयोजनों हेतु निविदा आमंत्रित की गई थी।

बोली प्रक्रिया में एम/एस करम भूमि एस्टेट्स ने गैर-औद्योगिक प्रयोजन के लिए रिज़र्व प्राइस से लगभग चार गुना अधिक बोली लगाई थी, इसके बावजूद RIICO ने बोली स्वीकार नहीं की और पुनः निविदा प्रक्रिया शुरू कर दी।

निलामी से पलटा RIICO

RIICO के इस निर्णय को चुनौती देते हुए फर्म ने दीवानी वाद दायर किया, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित कर नई निविदा पर रोक लगा दी।

इसके बाद RIICO ने स्वयं निर्णय लेते हुए फर्म की बोली स्वीकार की और वर्ष 2001 में पूरी राशि जमा करवा ली गई।

भूमि का सीमांकन भी कर दिया गया, लेकिन इसके बावजूद वर्षों तक लीज डीड निष्पादित नहीं की गई।

बाद में दीवानी वाद, प्रथम अपील और द्वितीय अपील की प्रक्रिया चली।

वर्ष 2011 में RIICO की इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कमेटी (IDC) ने स्पष्ट निर्णय लिया कि यदि फर्म अपनी द्वितीय अपील वापस ले ले, तो लीज डीड निष्पादित कर दी जाएगी।

इस आश्वासन पर भरोसा करते हुए फर्म ने हाईकोर्ट में लंबित द्वितीय अपील वापस ले ली।

वादा कर तोड़ दिया

हालांकि, अपील वापस लेने के बावजूद RIICO ने न केवल लीज निष्पादन में देरी की, बल्कि वर्ष 2015 में अचानक आवंटन रद्द कर दिया और जमा राशि लौटाने का निर्णय ले लिया।

इस आदेश को चुनौती देते हुए फर्म ने एकलपीठ में रिट याचिका दायर की, जिसे स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने RIICO के रद्दीकरण आदेश को अवैध ठहराया।

एकलपीठ के आदेश के खिलाफ RIICO ने डिवीजन बेंच में दो विशेष अपीलें दायर कीं, जिन पर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने फैसला सुनाया.

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह मामला Promissory Estoppel (वचनबद्धता सिद्धांत) का है।

अदालत ने कहा कि जब किसी सरकारी संस्था ने स्पष्ट आश्वासन देकर किसी पक्ष को कानूनी कार्यवाही वापस लेने के लिए प्रेरित किया हो, तो वह बाद में अपने ही वादे से पीछे नहीं हट सकती।

अदालत ने यह भी कहा कि RIICO ने न केवल पूरी राशि स्वीकार की, बल्कि आवंटी से अपील वापस भी करवाई।

ऐसे में बाद में यह कहना कि कोई वैध अनुबंध नहीं बना, स्वीकार्य नहीं है। हाईकोर्ट ने इसे “सरकारी संस्था द्वारा अपने ही निर्णय से पलटने का प्रयास” करार दिया।

पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन की दलील खारिज

RIICO ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों का हवाला देते हुए सार्वजनिक संसाधनों के आवंटन में Public Trust Doctrine की दलील दी, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे इस मामले में लागू करने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि यहां न तो आवंटी की कोई चूक है और न ही प्रक्रिया में कोई अनियमितता, बल्कि पूरा विवाद RIICO के आंतरिक निर्णयों और वादों से जुड़ा है।

अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने दोनों अपीलों को खारिज करते हुए RIICO को निर्देश दिया कि वह बिना किसी और देरी के आवंटी के पक्ष में लीज डीड निष्पादित करे।

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