12 साल पुराने हत्या के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला, भुगती हुई सजा के आधार पर तत्काल रिहा करने का आदेश, शराब पीने से टोका तो की थी हत्या
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने एक 12 वर्ष पुराने आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए हत्या के दोषी आरोपी की सजा कम करते हुए भुगती हुई सजा के आधार पर रिहा करने का आदेश दिया है।
सार्वजनिक स्थान पर शराब पीने से रोकने पर आरोपी ने एक व्यक्ति के सिर पर लोहे के सरिये से वार कर मौत के घाट उतार दिया था।
हाईकोर्ट ने IPC की धारा 302 के तहत दी गई आजीवन कारावास की सजा को बदलकर धारा 304 भाग-1 (गैर-इरादतन हत्या) में परिवर्तित करने का फैसला दिया है।
जिसके आधार पर जेल में काटी गई 12 साल से अधिक सजा को पर्याप्त मानते हुए तत्काल रिहाई के आदेश दिए हैं।
यह फैसला जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने करण सिंह की ओर से दायर आपराधिक अपील की सुनवाई करते हुए दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल एक वार या अचानक हुए विवाद में हुई मौत को हर हाल में हत्या नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि इरादा, परिस्थिति, हथियार, चोट का स्थान और घटना की पृष्ठभूमि निर्णायक होती है।
इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि यह मामला गैर-इरादतन हत्या की श्रेणी में आता है।
बाड़मेर में 2013 में हत्या
10 अक्टूबर 2013 की रात बाड़मेर के महावीर पार्क में एक मामूली विवाद ने हिंसक रूप ले लिया।
शिकायतकर्ता चुन्नीलाल के अनुसार, उनका भतीजा कीरिट पार्क में बैठा था, जहां एक युवक सार्वजनिक स्थान पर शराब का सेवन कर रहा था। इस पर आपत्ति जताने को लेकर दोनों के बीच कहासुनी हो गई।
विवाद के बाद कुछ समय तक स्थिति सामान्य रही, लेकिन करीब 15–25 मिनट बाद कीरिट गंभीर रूप से घायल अवस्था में मिला।
उसे तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान चार दिन बाद उसकी मौत हो गई।
पुलिस ने मामले में पहले धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत एफआईआर दर्ज की, लेकिन कीरिट की मृत्यु के बाद आरोप को बढ़ाकर धारा 302 (हत्या) कर दिया गया।
आजीवन कारावास की सजा
पुलिस जांच के बाद इस मामले में आरोपी करण सिंह को गिरफ्तार किया गया।
आरोप था कि उसने लोहे की सरिया से सिर पर वार किया, जिससे गंभीर चोटें आईं।
बाड़मेर के एडीजे कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए वर्ष 2017 में उसे धारा 302 IPC के तहत आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई।
एडीजे कोर्ट के फैसले को आरोपी ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।
बचाव पक्ष की दलील
आरोपी की ओर से अपने बचाव में दलील दी गई कि यह मामला पूर्व नियोजित हत्या का नहीं है और आरोपी व मृतक एक-दूसरे को पहले से नहीं जानते थे।
बचाव में कहा गया कि इस मामले में पूर्व शत्रुता या आपराधिक मंशा साबित नहीं हुई है। घटना अचानक हुए विवाद का परिणाम थी और पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है।
याचिका का विरोध
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक ने याचिका का विरोध करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और कहा कि सिर जैसे संवेदनशील अंग पर लोहे की सरिया से हमला करना हत्या के इरादे को दर्शाता है।
इरादा नहीं, ज्ञान का मामला
सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि मृतक और आरोपी के बीच कोई पुरानी रंजिश नहीं थी।
मामले में विवाद अचानक हुआ और घटना पूर्व नियोजित नहीं थी।
हाईकोर्ट ने आरोपी की उम्र को लेकर कहा कि घटना के समय आरोपी की उम्र लगभग 19 वर्ष थी और वह पहली बार अपराध में लिप्त हुआ था।
हाईकोर्ट ने कहा कि मृतक की मृत्यु तत्काल नहीं हुई, बल्कि चार दिन बाद इलाज के दौरान हुई।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियुक्त के कृत्य में हत्या का स्पष्ट इरादा (intention) साबित नहीं होता, लेकिन उसे यह ज्ञान (knowledge) अवश्य था कि उसके कृत्य से मृत्यु हो सकती है।
सजा को किया कम, रिहा करने का आदेश
हाईकोर्ट ने आरोपी को धारा 302 से मुक्त करते हुए धारा 304 भाग-1 के तहत दोषी ठहराया। साथ ही यह भी माना कि आरोपी 12 वर्षों से अधिक समय जेल में बिता चुका है और लंबे समय तक विचाराधीन और सजायाफ्ता कैदी रहा है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सुधार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। जिसके आधार पर जेल में काटी गई 12 साल से अधिक सजा को पर्याप्त मानते हुए तत्काल रिहाई के आदेश दिए हैं।