टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

दुष्कर्म और पॉक्सो मामलों की पत्रकारिता के दौरान बरते सावधानी, दैनिक भास्कर को राजस्थान हाईकोर्ट का नोटिस

Rajasthan High Court Issues Notice to Dainik Bhaskar Over Disclosure of Minor Rape Victim’s Identity

नाबालिग पीड़िता की पहचान उजागर करने के मामले में सीबीआई जांच की मांग, जांच रिपोर्ट पेश करने पर अस्थायी रोक

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने देश के प्रतिष्ठित दैनिक अखबार दैनिक भास्कर के संपादकों के खिलाफ पॉक्सो से जुड़े एक मामले में सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका पर नोटिस जारी किए हैं।

लॉ स्टूडेंट शुभांगी सिंह की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह आदेश दिया है।

मामले के अनुसार दैनिक भास्कर के पाली एडिशन में एक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के केस की रिपोर्टिंग के दौरान पीड़िता की पहचान उजागर करने का आरोप है।

नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता की पहचान उजागर किए जाने से जुड़े मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई तक जांच के परिणाम प्रस्तुत करने पर रोक लगा दी है।

याचिका में राज्य पुलिस पर पक्षपातपूर्ण और निष्पक्षता से परे जांच करने के आरोप लगाते हुए मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपने की मांग की है।

याचिका में कहा गया है कि दैनिक समाचार समूह के पाली संस्करण और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित समाचार में नाबालिग पीड़िता की पहचान से जुड़ी संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक की गई, जो कानूनन गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।

हाईकोर्ट का आदेश

जस्टिस फरजंद अली ने राज्य के अधिवक्ता को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को अपना जवाब ई-मेल के माध्यम से उपलब्ध कराएं।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने प्रतिवादी संख्या 2 से 5-जिनमें समाचार समूह के वरिष्ठ पदाधिकारी और संपादकीय जिम्मेदार शामिल हैं-को नोटिस जारी करने के आदेश दिए हैं।

इन नोटिसों की वापसी की तिथि 5 फरवरी 2026 निर्धारित की गई है।

हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई तक जांच के परिणाम या निष्कर्ष अदालत के समक्ष पेश नहीं करने के आदेश दिए हैं।

क्या है पूरा मामला

याचिका के अनुसार वर्ष 2024 को पाली दैनिक भास्कर में नाबालिग पीड़िता की पहचान उजागर कर दी गई थी, जो पॉक्सो अधिनियम, किशोर न्याय अधिनियम और भारतीय दंड कानूनों का स्पष्ट उल्लंघन है।

याचिकाकर्ता का आरोप है कि उन्होंने वैधानिक दायित्व के तहत तुरंत पुलिस को सूचना दी, लेकिन लंबे समय तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई।

बाद में विशेष पॉक्सो न्यायालय के आदेश के बाद ही प्राथमिकी दर्ज हुई, इसके बावजूद जांच में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि जांच वही पुलिस अधिकारी कर रहे हैं, जिन पर पहले से ही लापरवाही और मिलीभगत के आरोप हैं, जिससे निष्पक्ष जांच की संभावना पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।

दुष्कर्म और POCSO मामलों की पत्रकारिता में बरती जाने वाली सावधानियाँ

जानिए क्या हैं नियम, कानून और मीडिया की जिम्मेदारी (Under BNS)

दुष्कर्म (Rape) और बच्चों से संबंधित यौन अपराध (POCSO Act) जैसे संवेदनशील मामलों की रिपोर्टिंग पत्रकारिता की सबसे चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक है।

एक छोटी सी लापरवाही न केवल पीड़ित की निजता और गरिमा को ठेस पहुँचा सकती है, बल्कि कानूनन अपराध भी बन सकती है।

ऐसे मामलों में पत्रकारों को संवेदनशीलता, कानून की जानकारी और नैतिकता-तीनों का संतुलन साधना आवश्यक है।

पीड़ित की पहचान उजागर करना पूर्णतः प्रतिबंधित

IPC से BNS तक का कानूनी प्रावधान

पहले भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 228A के तहत यौन अपराधों में पीड़िता की पहचान उजागर करना दंडनीय अपराध था। अब IPC के स्थान पर लागू भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 में यही प्रावधान BNS की धारा 72 के तहत समाहित कर दिया गया है।

BNS की धारा 72 -दुष्कर्म या किसी भी यौन अपराध की पीड़िता/पीड़ित का नाम, उपनाम, फोटो, वीडियो, स्केच, पता, स्कूल, गांव, माता-पिता का नाम या कोई भी ऐसा विवरण जिससे उसकी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष पहचान हो सके, प्रकाशित करना अपराध है।

यह प्रतिबंध प्रिंट मीडिया, डिजिटल न्यूज पोर्टल, सोशल मीडिया, यूट्यूब, रील्स, व्हाट्सऐप फॉरवर्ड-सभी माध्यमों पर समान रूप से लागू होता है।

POCSO मामलों में और अधिक सख्ती

POCSO Act, 2012 बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया विशेष कानून है।
यदि पीड़ित 18 वर्ष से कम उम्र का बच्चा है, तो पहचान उजागर करना अत्यंत गंभीर अपराध माना जाता है।

POCSO Act की धारा 23 के तहत नाबालिग पीड़ित की पहचान उजागर करना या ऐसा कोई विवरण देना जिससे पहचान संभव हो, कानूनन दंडनीय है।

यहां तक कि रिपोर्ट में स्कूल का नाम, मोहल्ला, माता-पिता का पेशा या पारिवारिक पृष्ठभूमि बताना भी अप्रत्यक्ष पहचान (Indirect Identification) की श्रेणी में आ सकता है।

शब्द ही पत्रकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी

पत्रकारिता में शब्द केवल सूचना नहीं, बल्कि असर पैदा करते हैं। इसलिए पीड़ित का नाम, गांव, स्कूल, रिश्तेदारों का उल्लेख प्रतिबंधित है। इसकी जगह “नाबालिग पीड़िता”, “पीड़ित बच्चा”, “एक किशोरी”, “पीड़िता” जैसे सामान्य शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है।

यह न केवल पत्रकार को कानूनी सुरक्षा देता है, बल्कि पीड़ित की गरिमा और निजता भी बनाए रखता है।

सनसनीखेज शीर्षक और ग्राफिक विवरण से बचें

दुष्कर्म और यौन अपराधों से जुड़ी खबरों में अपराध के यौन या शारीरिक विवरण को बढ़ा-चढ़ाकर लिखना, चौंकाने वाले, उत्तेजक या भड़काऊ शीर्षक देना पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

ऐसे मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने स्पष्ट कहा है-“सूचना देना पत्रकारिता है, सनसनी फैलाना नहीं।”

आरोपी को दोषी ठहराने से पहले सावधानी अनिवार्य

भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है- “जब तक दोष सिद्ध न हो, आरोपी निर्दोष माना जाएगा।”

इसलिए रिपोर्टिंग में “दोषी”, “हैवान”, “अपराधी” की जगह “आरोपी”, “अभियुक्त”, “आरोपित व्यक्ति” लिखा जाना चाहिए।

क्योंकि यह Fair Trial (निष्पक्ष सुनवाई) के संवैधानिक अधिकार का सम्मान है।

POCSO मामलों में इन-कैमरा सुनवाई का सम्मान

POCSO मामलों की सुनवाई इन-कैमरा (बंद कमरे में) होती है। सुनवाई के दौरान सामने आए हर बयान या विवरण को ज्यों-का-त्यों प्रकाशित करना कानून का उल्लंघन हो सकता है।

पॉक्सो मामले में पत्रकार को केवल न्यायालय के आदेश, फैसले के कानूनी निष्कर्ष तक ही रिपोर्ट सीमित रखनी चाहिए।

सोशल मीडिया के दौर में अतिरिक्त सतर्कता बरतना आवश्यक है-

जैसे एक ट्वीट, रील या पोस्ट भी कानूनन “प्रकाशन” माना जाता है।

विशेष सावधानी रखें- पीड़ित से जुड़ा कोई भी फोटो या वीडियो, कोर्ट परिसर की ऐसी तस्वीरें जिनसे पहचान संभव हो, बिना सत्यापन वायरल कंटेंट साझा करना- डिजिटल प्लेटफॉर्म पर की गई गलती भी उतनी ही दंडनीय है जितनी अखबार में छपी खबर।

कानून उल्लंघन पर क्या सजा हो सकती है?

पीड़िता की पहचान उजागर करने पर BNS और POCSO के तहत सजा तक हो सकती है।

BNS धारा 72 के तहत 2 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना या दोनों सजाएँ हो सकती हैं।

वहीं POCSO Act के तहत कठोर कारावास, भारी जुर्माना; इसके अलावा डिजिटल कंटेंट हटाया जा सकता है, वेबसाइट, चैनल या सोशल मीडिया पेज ब्लॉक हो सकता है।

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की गाइडलाइंस

प्रेस काउंसिल ने मीडिया के लिए स्पष्ट निर्देश दिए हैं-पीड़ित के प्रति सम्मानजनक और संवेदनशील भाषा, पीड़ित को दोषी ठहराने वाली सोच को बढ़ावा न देना और रिपोर्टिंग का उद्देश्य न्याय, जागरूकता और जनहित होना चाहिए, न कि मनोरंजन।

सबसे अधिक लोकप्रिय