जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने श्रम कानूनों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25F का उल्लंघन पाए जाने मात्र से कर्मचारी की पुनर्नियुक्ति (री-इंस्टेटमेंट) स्वतः अनिवार्य नहीं हो जाती।
हाईकोर्ट ने कहा कि दैनिक वेतनभोगी, अस्थायी या अनुबंध पर कार्यरत कर्मचारियों के मामलों में, विशेषकर जब सेवा अवधि कम हो और विवाद के निपटारे में लंबा समय बीत चुका हो, पुनर्नियुक्ति के बजाय उचित मौद्रिक मुआवज़ा अधिक न्यायसंगत राहत हो सकती है।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट सत्य नारायण की ओर से दायर याचिका पर दिया है।
याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता सत्य नारायण को 21 जून 1997 को बीएसएनएल, बूंदी में दैनिक वेतन पर लगाया गया था।
उनकी नियुक्ति न तो किसी नियमित भर्ती प्रक्रिया के तहत थी और न ही किसी स्वीकृत पद पर।
31 जुलाई 1998 को सेवाएँ समाप्त होने के बाद उन्होंने औद्योगिक विवाद उठाया, जिस पर श्रम न्यायालय, कोटा ने 31 अगस्त 2010 को यह पाते हुए कि धारा 25F का पालन नहीं हुआ, पुनर्नियुक्ति के बजाय 60,000 रुपये का एकमुश्त मुआवज़ा देने का आदेश दिया था।
श्रम न्यायालय के आदेश से असंतुष्ट कर्मचारी ने राजस्थान हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर पुनर्नियुक्ति की मांग की।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता हितेश बागड़ी ने पैरवी करते हुए दलील दी कि जब एक बार अवैध प्रतिच्छेदन (रिट्रेंचमेंट) सिद्ध हो गया, तो सेवा निरंतरता सहित पुनर्नियुक्ति ही सामान्य और तार्किक राहत है।
इसके समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का भी हवाला दिया गया।
बीएसएनएल की दलील
बीएसएनएल की ओर से जवाब में कहा गया कि याचिकाकर्ता दैनिक वेतनभोगी था, उसकी सेवा अवधि अल्पकालिक थी और नियुक्ति किसी नियमित चयन प्रक्रिया से नहीं हुई थी।
साथ ही, सेवा समाप्ति और विवाद के निस्तारण के बीच लंबा अंतराल रहा, इस दौरान विभागीय परिस्थितियों में भी बदलाव आए।
दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 25F का उल्लंघन होने पर हटाना अवैध तो होता है, लेकिन राहत का स्वरूप मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले
सुप्रीम कोर्ट के बीएसएनएल बनाम भुरुमल (2014), रणबीर सिंह बनाम कार्यकारी अभियंता (2021) और अमित कुमार दुबे बनाम एम.पी.पी.के.वी.वी. कंपनी लिमिटेड (2025) जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि दैनिक वेतनभोगियों के मामलों में मशीनी रूप से पुनर्नियुक्ति उचित नहीं होती; बल्कि न्यायसंगत मुआवज़ा दिया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने पाया कि इस प्रकरण में न तो किसी दुर्भावना (मलाफाइड) कार्रवाई का प्रमाण है और न ही अनुचित श्रम व्यवहार का कोई निष्कर्ष।
याचिकाकर्ता ने सीमित अवधि तक ही कार्य किया था और विवाद के निस्तारण में काफी समय बीत चुका था।
ऐसे में पुनर्नियुक्ति का आदेश देना न केवल अनुपातहीन होगा, बल्कि स्थापित कानूनी स्थिति के भी विपरीत होगा।
इन तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने लेबर कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए, धारा 25F के उल्लंघन को मानते हुए भी राहत के रूप में पुनर्नियुक्ति से इनकार किया।
हाईकोर्ट ने लेबर कोर्ट द्वारा दिए गए 60,000 रुपये के मुआवज़े को संशोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम दिशा-निर्देशों के अनुरूप मुआवज़े की राशि बढ़ाकर प्रति वर्ष 1.5 लाख रुपये की दर से एकमुश्त मौद्रिक मुआवज़ा देने के आदेश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने उक्त राशि आठ सप्ताह के भीतर अदा करने के आदेश दिए हैं, अन्यथा 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देय होगा।