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अधिवक्ता परिषद् अधिवेशन का दूसरा दिन: महिला वकीलों की चुनौतियां और संगठन विस्तार पर विशेषज्ञों का बड़ा मंथन

Convention Focuses on Women Advocates, Organizational Growth, and Stronger Justice System

जोधपुर/बालोतरा। राजस्थान के बालोतरा में आयोजित अधिवक्ता परिषद् के राष्ट्रीय अधिवेशन के दूसरे दिन विशेष चार –सत्रों का आयोजन किया गया.

इन सत्रों में महिला अधिकारों, संगठन विस्तार और न्यायिक प्रणाली को अधिक सुदृढ़ व समावेशी बनाने पर गंभीर विमर्श किया गया.

अधिवेशन का प्रमुख सत्र “वीमेन एडवोकेट्स एट वर्क प्लेस: इश्यूज एंड चैलेंजेज” रहा, जिसमें मद्रास हाईकोर्ट की जस्टिस अनीथा सुमथ मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुईं।

जस्टिस अनीथा सुमथ सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि महिला अधिवक्ता आज भी कार्यस्थल और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने के लिए निरंतर संघर्ष कर रही हैं।

जस्टिस सुमथ ने जोर देकर कहा कि समानता केवल कानून की पुस्तकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसे व्यवहार में भी उतारा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका केवल बहस तक सीमित न रहे, बल्कि वे नेतृत्व की जिम्मेदारी भी संभालें, ताकि न्याय-व्यवस्था में वास्तविक अर्थों में लैंगिक समानता स्थापित हो सके।

इस सत्र को अधिवक्ता परिषद् के उपाध्यक्ष परिमल भाई पाठक, उपाध्यक्ष मीरा ताई और राखी शर्मा ने भी अपने विचार साझा किए।

वक्ताओं ने महिला अधिवक्ताओं के समक्ष आने वाली पेशेवर चुनौतियों—जैसे सुरक्षा, कार्यस्थल का वातावरण, पारिवारिक दायित्वों का संतुलन और नेटवर्किंग के सीमित अवसर—पर विस्तार से चर्चा की।

अधिवेशन के दूसरे महत्वपूर्ण सत्र में आयाम बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें अधिवक्ता परिषद् के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्रीहरि बोरिकर मुख्य वक्ता रहे।

उन्होंने संगठन को मजबूत करने के लिए अनुभव और ऊर्जा के समन्वय पर बल दिया।

बोरिकर ने कहा कि पुराने, अनुभवी कार्यकर्ताओं के अनुभव को नए और ऊर्जावान सदस्यों के साथ जोड़कर ही संगठन को ‘मैग्नेट’ की तरह आकर्षक और प्रभावी बनाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि वास्तविक परिवर्तन अनुभव से उपजता है और जो लोग संगठनात्मक पथ पर पहले चल चुके हैं, वही नई पीढ़ी के लिए सशक्त मार्गदर्शक बन सकते हैं।

श्रीहरि बोरिकर ने संगठन विस्तार के साथ-साथ सामाजिक दायित्वों पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि एक मजबूत न्यायिक व्यवस्था तभी संभव है, जब उसमें नागरिकों का विश्वास हो और संवैधानिक मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई दे।

अधिवक्ता परिषद् अधिवेशन का दूसरा दिन: महिला वकीलों की चुनौतियां और संगठन विस्तार पर विशेषज्ञों का बड़ा मंथन

जोधपुर/बालोतरा। राजस्थान के बालोतरा में आयोजित अधिवक्ता परिषद् के राष्ट्रीय अधिवेशन के दूसरे दिन विशेष चार –सत्रों का आयोजन किया गया.

इन सत्रों में महिला अधिकारों, संगठन विस्तार और न्यायिक प्रणाली को अधिक सुदृढ़ व समावेशी बनाने पर गंभीर विमर्श किया गया.

अधिवेशन का प्रमुख सत्र “वीमेन एडवोकेट्स एट वर्क प्लेस: इश्यूज एंड चैलेंजेज” रहा, जिसमें मद्रास हाईकोर्ट की जस्टिस अनीथा सुमथ मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुईं।

जस्टिस अनीथा सुमथ सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि महिला अधिवक्ता आज भी कार्यस्थल और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने के लिए निरंतर संघर्ष कर रही हैं।

जस्टिस सुमथ ने जोर देकर कहा कि समानता केवल कानून की पुस्तकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसे व्यवहार में भी उतारा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका केवल बहस तक सीमित न रहे, बल्कि वे नेतृत्व की जिम्मेदारी भी संभालें, ताकि न्याय-व्यवस्था में वास्तविक अर्थों में लैंगिक समानता स्थापित हो सके।

इस सत्र को अधिवक्ता परिषद् के उपाध्यक्ष परिमल भाई पाठक, उपाध्यक्ष मीरा ताई और राखी शर्मा ने भी अपने विचार साझा किए।

वक्ताओं ने महिला अधिवक्ताओं के समक्ष आने वाली पेशेवर चुनौतियों—जैसे सुरक्षा, कार्यस्थल का वातावरण, पारिवारिक दायित्वों का संतुलन और नेटवर्किंग के सीमित अवसर—पर विस्तार से चर्चा की।

अधिवेशन के दूसरे महत्वपूर्ण सत्र में आयाम बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें अधिवक्ता परिषद् के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्रीहरि बोरिकर मुख्य वक्ता रहे।

उन्होंने संगठन को मजबूत करने के लिए अनुभव और ऊर्जा के समन्वय पर बल दिया।

बोरिकर ने कहा कि पुराने, अनुभवी कार्यकर्ताओं के अनुभव को नए और ऊर्जावान सदस्यों के साथ जोड़कर ही संगठन को ‘मैग्नेट’ की तरह आकर्षक और प्रभावी बनाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि वास्तविक परिवर्तन अनुभव से उपजता है और जो लोग संगठनात्मक पथ पर पहले चल चुके हैं, वही नई पीढ़ी के लिए सशक्त मार्गदर्शक बन सकते हैं।

श्रीहरि बोरिकर ने संगठन विस्तार के साथ-साथ सामाजिक दायित्वों पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि एक मजबूत न्यायिक व्यवस्था तभी संभव है, जब उसमें नागरिकों का विश्वास हो और संवैधानिक मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई दे।

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