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पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोपी को हाईकोर्ट से जमानत, राजस्थान पुलिस की बड़ी चूक पर फूटा कोर्ट का गुस्सा, मजिस्ट्रेट-अभियोजक की भूमिका पर सवाल!

Rajasthan High Court Grants Bail to Alleged Spy Over Illegal Arrest Procedure, Slams Police and Magistrate

हाईकोर्ट बोला- लिखित Grounds of Arrest दिए बिना गिरफ्तारी अवैध; जांच अधिकारी, PP और मजिस्ट्रेट पर कार्रवाई के निर्देश, DGP और चीफ जस्टिस को भेजा आदेश

जयपुर। पाकिस्तान से कथित संपर्क और सैन्य प्रतिष्ठानों की संवेदनशील जानकारी साझा करने जैसे गंभीर आरोपों में गिरफ्तार आरोपी को राजस्थान हाईकोर्ट ने जमानत दे दी है।

लेकिन यह राहत आरोपों की कमजोरी नहीं, बल्कि राजस्थान पुलिस और अभियोजन की बड़ी कानूनी चूक के कारण मिली।

राजस्थान हाईकोर्ट ने जासूसी के आरोपी को जमानत देते हुए साफ कहा कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित रूप में “Grounds of Arrest” नहीं देना संविधान और कानून का खुला उल्लंघन है, जिससे गिरफ्तारी ही अवैध हो जाती है।

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच के जस्टिस प्रवीर भटनागर की एकलपीठ ने यह बड़ा फैसला सुनाते हुए न केवल आरोपी झाबरा राम को जमानत दी, बल्कि जांच अधिकारी, लोक अभियोजक और रिमांड देने वाले मजिस्ट्रेट की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर टिप्पणी की।

हाईकोर्ट ने आदेश की कॉपी DGP राजस्थान, निदेशक अभियोजन और राज्य की सभी अधीनस्थ अदालतों को भेजने के आदेश दिए हैं।

ये है मामला

मामला CID सिक्योरिटी थाना, जयपुर में दर्ज FIR नंबर 01/2026 से जुड़ा है।

पोकरण के सांकड़ा निवासी झाबरा राम (28) को 30 जनवरी 2026 को राजस्थान इंटेलिजेंस ने जैसलमेर से पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया था।

आरोप था कि झाबरा राम पिछले डेढ़ साल से भारतीय सेना की गोपनीय जानकारियां पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI को भेज रहा था।

जांच में यह दावा किया गया था कि हर टास्क के बदले उसे 5 से 10 हजार रुपये तक का भुगतान किया जाता था।

आरोपी के मोबाइल से ISI हैंडलर्स के साथ हुई चैट और अन्य डिजिटल सबूत भी बरामद किए गए हैं।

आरोपी झाबरा राम के खिलाफ Official Secrets Act, 1923 की धाराओं 3 और 9 तथा BNS की धाराओं 152 और 238(b) के तहत केस दर्ज किया गया था।

जांच एजेंसी का दावा था कि आरोपी पाकिस्तान के हैंडलर्स से व्हाट्सऐप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से संपर्क में था और उसने सैन्य प्रतिष्ठानों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी साझा की।

जासूसी के आरोपी याचिकाकर्ता की दलीलें

राजस्थान हाईकोर्ट में दायर जमानत याचिका में आरोपी झाबरा राम की ओर से अधिवक्ता आर.बी. शर्मा गंथोला ने हाईकोर्ट में दलीलें पेश करते हुए कहा कि पूरे मामले में गिरफ्तारी की प्रक्रिया संविधान और कानून के विपरीत अपनाई गई।

बचाव पक्ष का मुख्य तर्क यह था कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित रूप में “Grounds of Arrest” उपलब्ध नहीं कराए गए, जबकि यह आरोपी का संवैधानिक और वैधानिक अधिकार है।

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करने की अनुमति देता है।

वहीं अनुच्छेद 22(1) स्पष्ट रूप से यह अनिवार्य करता है कि गिरफ्तार व्यक्ति को जल्द से जल्द उसकी गिरफ्तारी के कारण बताए जाएं। बचाव पक्ष ने कहा कि यह केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आरोपी के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि BNSS की धारा 47 पुलिस अधिकारी पर यह बाध्यता डालती है कि बिना वारंट गिरफ्तारी की स्थिति में आरोपी को गिरफ्तारी के आधार तत्काल बताए जाएं।

लेकिन इस मामले में न तो लिखित Grounds of Arrest दिए गए और न ही यह रिकॉर्ड में दिखता है कि आरोपी को उसकी समझ की भाषा में गिरफ्तारी के कारण उपलब्ध कराए गए हों।

याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया गया। इनमें Pankaj Bansal v. Union of India, Prabir Purkayastha v. State (NCT of Delhi), Vihaan Kumar v. State of Haryana तथा Mihir Rajesh Shah v. State of Maharashtra शामिल थे।

बचाव पक्ष ने कहा कि

सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देना अनिवार्य है और ऐसा नहीं होने पर गिरफ्तारी तथा बाद की रिमांड प्रक्रिया अवैध हो जाती है।

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार नहीं मिलने से वह प्रभावी तरीके से कानूनी सहायता प्राप्त नहीं कर पाया और न ही वह रिमांड का प्रभावी विरोध कर सका।

इसलिए पूरी गिरफ्तारी प्रक्रिया संविधान के विपरीत है और आरोपी की निरंतर हिरासत गैरकानूनी मानी जानी चाहिए।

बचाव पक्ष ने अदालत के सामने यह भी रखा कि पुलिस केस डायरी में केवल यह उल्लेख है कि आरोपी को गिरफ्तारी की जानकारी दी गई थी, लेकिन कहीं भी यह दर्ज नहीं है कि लिखित Grounds of Arrest उपलब्ध कराए गए। इस प्रकार सुप्रीम Court द्वारा तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

राज्य सरकार और पुलिस का जवाब

राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया।

राज्य सरकार ने कहा कि आरोपी पर अत्यंत गंभीर आरोप हैं, जो सीधे देश की संप्रभुता, सुरक्षा और सैन्य गोपनीयता से जुड़े हुए हैं।

सरकार ने कहा कि जांच एजेंसी के अनुसार आरोपी पाकिस्तान के हैंडलर्स से व्हाट्सऐप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से संपर्क में था तथा उसने सैन्य प्रतिष्ठानों से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां साझा की थीं।

राज्य ने कहा कि जांच के दौरान पर्याप्त सामग्री सामने आई है, जिससे आरोपी की गतिविधियां संदिग्ध प्रतीत होती हैं।

सरकार ने कहा कि

यह कोई साधारण आपराधिक मामला नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा संवेदनशील मामला है, जिसमें आरोपी को राहत देने से जांच प्रभावित हो सकती है।

लोक अभियोजक ने यह भी तर्क दिया कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी गिरफ्तारी मेमो के माध्यम से दी गई थी।

सरकार का कहना था कि रिमांड के दौरान मजिस्ट्रेट ने भी यह दर्ज किया था कि आरोपी को गिरफ्तारी के कारणों से अवगत कराया गया था।

राज्य सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि आरोपी ने गिरफ्तारी के तुरंत बाद या प्रारंभिक रिमांड कार्यवाही के दौरान Grounds of Arrest नहीं दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं उठाई। इसलिए बाद में उठाया गया यह तर्क विलंबित और असंगत है।

सरकार ने अदालत में यह भी कहा कि आरोपी यह साबित नहीं कर पाया कि कथित प्रक्रियागत कमी से उसे वास्तविक नुकसान या prejudice हुआ हो।

राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के Kasireddy Upender Reddy v. State of Andhra Pradesh तथा State of Karnataka v. Sri Darshan मामलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल लिखित Grounds of Arrest नहीं दिए जाने से गिरफ्तारी स्वतः अवैध नहीं हो जाती, जब तक आरोपी यह न दिखा दे कि उसे इससे गंभीर नुकसान पहुंचा है।

राज्य ने यह भी तर्क दिया कि आरोपी गिरफ्तारी के तुरंत बाद से ही कानूनी प्रतिनिधित्व प्राप्त कर रहा था, उसने जमानत आवेदन भी दायर किया और उसे आरोपों की जानकारी थी।

इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपी को गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी नहीं थी।

हाईकोर्ट का फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस प्रवीर भटनागर ने अपने विस्तृत फैसले में गिरफ्तारी और रिमांड प्रक्रिया को लेकर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार है और पुलिस या जांच एजेंसी उसे केवल कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही सीमित कर सकती है।

कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 और 22(1) स्पष्ट रूप से यह सुनिश्चित करते हैं कि गिरफ्तार व्यक्ति को जल्द से जल्द गिरफ्तारी के कारण बताए जाएं।

कोर्ट ने कहा कि

BNSS की धारा 47 भी पुलिस अधिकारी पर यह बाध्यता डालती है कि वह बिना वारंट गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार तुरंत बताए।

अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि आरोपी के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा का अहम हिस्सा है।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अब यह विधिक स्थिति पूरी तरह स्थापित हो चुकी है कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में दिए जाना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने Pankaj Bansal केस का उल्लेख करते हुए कहा कि गिरफ्तारी के आधारों की “effective and meaningful communication” आवश्यक है और लिखित Grounds of Arrest अब एक मानक प्रक्रिया बन चुकी है।

कोर्ट ने Prabir Purkayastha फैसले का हवाला देते हुए कहा कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देना आरोपी को कानूनी सहायता लेने, रिमांड का विरोध करने और जमानत जैसे वैधानिक उपाय अपनाने का अवसर देता है। इसलिए यह केवल प्रक्रियागत नहीं, बल्कि substantive safeguard है।

इसके बाद अदालत ने Vihaan Kumar फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि यदि गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए जाते, तो गिरफ्तारी अवैध हो जाती है।

कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट का भी यह दायित्व है कि वह रिमांड सुनवाई के समय यह सुनिश्चित करे कि संविधान और कानून के तहत आवश्यक प्रक्रिया का पालन हुआ है।

“Mihir Rajesh Shah फैसला अब बाध्यकारी कानून”

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ द्वारा दिए गए Mihir Rajesh Shah v. State of Maharashtra फैसले को विस्तार से उद्धृत किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि गिरफ्तारी के आधार आरोपी की समझ की भाषा में लिखित रूप में दिए जाने चाहिए।

यदि किसी विशेष परिस्थिति में तुरंत लिखित Grounds देना संभव न हो, तो भी आरोपी को मौखिक रूप से कारण बताए जाएं और लिखित Grounds कम से कम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी से दो घंटे पहले तक दे दिए जाएं।

कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से यह घोषित किया है कि यदि यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो गिरफ्तारी और रिमांड दोनों अवैध माने जाएंगे और आरोपी को रिहा किया जाना होगा।

केस डायरी और रिकॉर्ड पर कोर्ट की टिप्पणी

राजस्थान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद कहा कि केस डायरी से यह तो स्पष्ट होता है कि आरोपी को गिरफ्तारी की जानकारी दी गई थी, लेकिन कहीं भी यह नहीं दिखता कि लिखित Grounds of Arrest आरोपी को उपलब्ध कराए गए।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय अनिवार्य प्रक्रिया का उल्लंघन है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि जब आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और पुलिस रिमांड मांगी गई, तब न तो लोक अभियोजक और न ही मजिस्ट्रेट ने यह सुनिश्चित किया कि आरोपी को लिखित Grounds of Arrest दिए गए हैं या नहीं। अदालत ने इसे गंभीर प्रक्रियागत विफलता माना।

“सिर्फ आरोप बताना पर्याप्त नहीं”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल आरोपों का मौखिक उल्लेख या गिरफ्तारी मेमो में सामान्य जानकारी देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि आरोपी को लिखित Grounds of Arrest देना आवश्यक है और यही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का वास्तविक उद्देश्य है।

“राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में और ज्यादा सतर्कता जरूरी”

कोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला साधारण अपराध का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनशील सैन्य सूचनाओं से जुड़ा है।

ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों को संवैधानिक और वैधानिक प्रक्रियाओं का और अधिक सख्ती से पालन करना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि जांच एजेंसी ने उचित सावधानी बरती होती, तो गिरफ्तारी की वैधता पर सवाल ही खड़े नहीं होते।

“कोर्ट के पास जमानत देने के अलावा विकल्प नहीं”

जस्टिस प्रवीर भटनागर ने कहा कि रिकॉर्ड में यह नहीं दिखता कि आरोपी को लिखित Grounds of Arrest दिए गए थे।

इसलिए आरोपी की निरंतर हिरासत कानून की नजर में टिक नहीं सकती।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में आरोपी को जमानत देना ही एकमात्र विकल्प बचता है।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार कानून के अनुसार दोबारा गिरफ्तारी की कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगी, यदि आवश्यक हो।

जांच अधिकारी, PP और मजिस्ट्रेट पर सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने इस मामले में केवल पुलिस को ही नहीं, बल्कि लोक अभियोजक और रिमांड देने वाले मजिस्ट्रेट को भी जिम्मेदार माना।

अदालत ने कहा कि रिमांड के समय यह सुनिश्चित करना मजिस्ट्रेट और अभियोजन दोनों का कर्तव्य था कि आरोपी को लिखित Grounds of Arrest दिए गए हैं या नहीं। लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

फैसले के अंत में राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि Mihir Rajesh Shah फैसले में निर्धारित प्रक्रिया का पालन सभी जांच एजेंसियों और अदालतों के लिए अनिवार्य है।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि भविष्य में रिमांड सुनवाई के दौरान मजिस्ट्रेट विशेष रूप से यह सुनिश्चित करें कि आरोपी को कानून के अनुसार Grounds of Arrest उपलब्ध कराए गए हैं।

सबसे अहम टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने आदेश की प्रति DGP राजस्थान और निदेशक अभियोजन को भेजने के निर्देश दिए ताकि जांच अधिकारी और संबंधित लोक अभियोजक के खिलाफ उचित कार्रवाई पर विचार किया जा सके।

साथ ही रिमांड प्रक्रिया संचालित करने वाले संबंधित ACJM के मामले को भी मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने के निर्देश दिए गए।

जमानत के साथ कड़ी शर्तें

हाईकोर्ट ने आरोपी को 50 हजार रुपए के निजी मुचलके और 25-25 हजार रुपए की दो जमानतों पर रिहा करने का आदेश दिया।

साथ ही हर महीने की 25 तारीख को पुलिस थाने में हाजिरी लगाने, पासपोर्ट जमा कराने और बिना अनुमति देश छोड़कर नहीं जाने की शर्त लगाई गई।

कोर्ट का बड़ा संदेश

फैसले के अंत में हाईकोर्ट ने पूरे राज्य की अधीनस्थ अदालतों को निर्देश दिए कि भविष्य में किसी भी रिमांड आवेदन पर सुनवाई करते समय यह विशेष रूप से जांचा जाए कि आरोपी को कानून के मुताबिक गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध कराए गए हैं या नहीं।

कोर्ट ने DGP राजस्थान और निदेशक अभियोजन को संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर विचार करने को भी कहा।

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