जोधपुर, 12 नवंबर
बहुचर्चित आनन्दपाल एनकाउंटर मामले में शामिल पुलिस अधिकारियों को जोधपुर जिला एवं सत्र न्यायालय से बड़ी राहत मिली है.
डिस्ट्रिक्ट एवं सेशन जज अजय कुमार शर्मा की अदालत ने CBI कोर्ट द्वारा अधिकारियों के खिलाफ लिए गए प्रसंज्ञान आदेश को निरस्त कर दिया है.
डीजे कोर्ट ने एसीजेएम CBI कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें पुलिस अधिकारियों के खिलाफ हत्या के आरोप में मुकदमा चलाने का आदेश दिया गया था।
24 जुलाई 2024 को एसीजेएम CBI कोर्ट ने आनंदपाल की पत्नी द्वारा दायर आवेदन को मंजूर करते हुए CBI की क्लोजर रिपोर्ट खारिज कर दी थी.
साथ ही, कोर्ट ने चूरू के तत्कालीन एसपी राहुल बारहठ, एएसपी विद्या प्रकाश चौधरी सहित अन्य अधिकारियों के खिलाफ धारा 302 (हत्या) के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया था.
इस आदेश के खिलाफ अधिकारियों की ओर से डीजे कोर्ट में रिवीजन पिटीशन दायर की गई थी.
चूरू में हुआ था एनकाउंटर
24 जून 2017 की रात करीब 10 बजे, चूरू जिले के मालासर गांव में राजस्थान पुलिस की एसओजी टीम ने 5 लाख रुपये के इनामी कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल सिंह का एनकाउंटर किया था.
पुलिस को सूचना मिली थी कि आनंदपाल अपने साथियों के साथ श्रवण सिंह के घर में छिपा हुआ है.
तत्कालीन SP राहुल बारहठ ने उसे आत्मसमर्पण का मौका दिया, लेकिन छत से तेज फायरिंग शुरू हो गई.
जवाबी कार्रवाई में कमांडो सोहन सिंह और इंस्पेक्टर सूर्यवीर सिंह घायल हुए और एनकाउंटर के दौरान आनंदपाल की मौत हो गई.
मौके से दो AK-47 राइफलें, एक .22 राइफल और बड़ी मात्रा में कारतूस बरामद किए गए थे.
CBI जांच और ACJM कोर्ट का आदेश
राज्य सरकार ने 2017 में मामले की जांच CBI को सौंपी, CBI ने विस्तृत जांच के बाद एनकाउंटर को वास्तविक मुठभेड़ बताया और क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की.
हालांकि, आनंदपाल की पत्नी राज कंवर ने प्रोटेस्ट पिटीशन दायर की, जिस पर एसीजेएम युवराज सिंह की कोर्ट ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया और 7 पुलिस अधिकारियों के खिलाफ धारा 302 (हत्या) सहित अन्य धाराओं में मुकदमा चलाने का आदेश दिया था.
आदेश तथ्यात्मक और कानूनी रूप से गलत
इन अधिकारियों ने सेशन कोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन दायर की। सुनवाई के बाद डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज अजय शर्मा ने एसीजेएम कोर्ट के आदेश को तथ्यात्मक और कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण पाया.
कोर्ट ने कहा कि आनंदपाल के भाई रूपेंद्र पाल ने 2018 में CBI को दिए बयान में खुद को चश्मदीद गवाह नहीं बताया था, लेकिन छह साल बाद कोर्ट में अचानक ऐसा दावा किया — जो सामान्य मानवीय व्यवहार के विपरीत है.
फोरेंसिक और बैलिस्टिक साक्ष्य की अनदेखी
कोर्ट ने पाया कि बैलिस्टिक रिपोर्ट के अनुसार 32 गोलियां आनंदपाल की AK-47 से चली थीं, और सोहन सिंह की रीढ़ से निकली गोली भी उसी राइफल की थी.
आनंदपाल की राइफल “रैपिड फायर मोड” में पाई गई थी और उसके हैंडवॉश में नाइट्रेट मिला, जो यह साबित करता है कि उसने फायरिंग की थी.
कोर्ट ने कहा कि ACJM ने वैज्ञानिक साक्ष्यों की अनदेखी की और “रिकोशे” (गोलियों के टकराकर लगने की संभावना) को बिना ठोस कारण खारिज कर दिया.
ड्यूटी निभाते हुए की गई आत्मरक्षा
कोर्ट ने माना कि पुलिस टीम 41 गंभीर मामलों में वांछित अपराधी को पकड़ने गई थी। जब आनंदपाल ने पुलिस पर गोलियां चलाईं और टीम के सदस्य घायल हुए, तब आत्मरक्षा में की गई जवाबी फायरिंग को आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा माना जाएगा.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
जज अजय शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के ओमप्रकाश बनाम झारखंड राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई पुलिस अधिकारी कर्तव्य निभाते हुए सीमाओं से थोड़ा आगे बढ़ भी जाए, तब भी जब तक उसका कार्य आधिकारिक कर्तव्य से जुड़ा हुआ है, उसे धारा 197 CrPC के तहत संरक्षण प्राप्त है.
सेशन कोर्ट ने कहा कि एसीजेएम कोर्ट ने मेडिकल, FSL और बैलिस्टिक रिपोर्ट को नजरअंदाज किया, और बिना ठोस साक्ष्यों के हत्या का निष्कर्ष निकाला.
कोर्ट ने कहा-
“ड्यूटी निभाते हुए आत्मरक्षा में कार्रवाई करने वाले पुलिस कर्मियों को आपराधिक मुकदमे का शिकार नहीं बनाया जा सकता।”
सुनवाई के बाद डिस्ट्रिक्ट एवं सेशन जज अजय कुमार शर्मा की अदालत ने एसीजेएम सीबीआई का आदेश रद्द करते हुए बड़ी राहत दी है।
कोर्ट ने माना कि पुलिस अधिकारी ड्यूटी के दौरान आत्मरक्षा में कार्य कर रहे थे, और इस प्रकार की कार्रवाई अपराध की श्रेणी में नहीं आती.
जिला अदालत ने प्रसंज्ञान आदेश को रद्द करते हुए कहा कि एनकाउंटर के दौरान पुलिसकर्मी ड्यूटी पर तैनात थे और उन्होंने आत्मरक्षा में गोली चलाने की कार्रवाई की थी.
अदालत ने कहा कि जब कोई अधिकारी अपने सरकारी कर्तव्य का निर्वहन करते हुए ऐसी स्थिति में कार्रवाई करता है, तो वह अपराध की श्रेणी में नहीं आता.
अदालत ने कहा कि जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि आनन्दपाल को ड्यूटी के दौरान हुई मुठभेड़ में गोली लगी थी, और पुलिसकर्मियों ने कानूनी सीमाओं के भीतर रहकर कार्य किया.
इस आदेश के साथ ही वर्षों से चले आ रहे इस हाई-प्रोफाइल मामले में पुलिस अधिकारियों को बड़ी राहत मिली है.